मेरे बच्चो, अपने अन्दर प्रेम का दीप जला कर आगे बढ़ चलो। हम हर क़दम सुविचार और मुस्कुराते चेहरे के साथ उठाएँगे तो साधुता स्वयं आ कर हमारे अस्तित्व को भर देगी। फिर भला परमात्मा हमसे दूर रह ही कहाँ पाएँगे! वो आ कर हमें अपने अंक में भर लेंगे। हमारे जीवन का कोई क्षण फिर सुख-शान्ति से रहित नहीं होगा। – अम्मा

बच्चो, नवरात्रि एक अवसर है सकल जगत-कारिणी, पराशक्ति की पूजा-उपासना करने का! इन नौ दिनों की पूर्णाहूति होती है विजयदशमी के दिन। ये नौ दिन व्रत-उपवास आदि साधना-उपासना के लिए होते हैं। आलस्य, काम-क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या-द्वेष, अधीरता व अविश्वास – ये सब दुर्गुण साधना के मार्ग में बाधाएं हैं। तप के माध्यम से इन पर विजय पा कर आध्यात्मिक पूर्णता को प्राप्त करना नवरात्रि का उद्देश्य है। हमें शिक्षा मिलती है कि जप-तप से हमें शक्ति, मांगल्य तथा ज्ञान की प्राप्ति होती है।

स्वरूप से जगत ब्रह्म है, जिसमें जगत के बनने से भी कभी कोई विकार नहीं आता। जगत की सृष्टिकर्त्री को हम ‘देवी’ कहते हैं। ब्रह्म और देवी में कोई भेद नहीं है, बल्कि एक ही सत्य-वस्तु है, जैसे सूर्य और उसका प्रकाश पृथक नहीं, मधु और उसकी मिठास या शब्द और उसका अर्थ बिलग नहीं होते। सनातन धर्म में हमें परमात्मा को किसी भी मनचाहे रूप में पूजने की छूट है। हम उसकी उपासना चाहे माँ के रूप में करें, पिता के रूप में, गुरु-रूप में, मित्र, भगवान के रूप में, यहाँ तक कि अपने बच्चे के रूप में भी। बस, हमारी भक्ति निष्काम हो और उसका आधार अध्यात्म होवे।

सांसारिक सम्बन्धों में, माँ-बच्चे का सम्बन्ध सबसे पवित्र होता है। बच्चे को माँ के साथ पूर्ण-स्वतंत्रता का अनुभव होता है। वो जो चाहे, रो कर, ज़िद कर के मांग लेता है। चाहे उसकी पिटाई भी क्यों न हो रही हो, बच्चा माँ को कस कर चिपका रहता है। उसका भाव होता है, “मेरी माँ के सिवा, मेरा कोई और ठिकाना नहीं है!” बच्चे की परेशानी का कारण जो भी हो, उसे आराम माँ की गोद में आ कर ही मिलता है। हमारा भी परमात्मा के प्रति ऐसा ही भाव होना चाहिए। और माँ तो धैर्य की मूरत होती ही है। उसका बच्चा कितनी भी गलतियां क्यों न करता रहे, वो माफ़ करती रहती है और अपना वात्सल्य बरसाती रहती है। सभी माताओं का अपने बच्चों के प्रति ऐसा ही वात्सल्य-भाव होता है। देवी-माँ भी अपने सब प्राणियों पर समान रूप से प्रेम की वर्षा करती हुई, मानव को अध्यात्म की ओर लिए चलती है।

कई लोग प्रश्न करते हैं कि, “देवी को माया क्यों कहते हैं? माया तो हमें मोह, दुःख और बन्धन में डालती है। तो यदि देवी माया है तो फिर उसकी पूजा-अर्चना क्यों करें?” बच्चो, यह जगत देवी का व्यक्त-रूप है। देवी की सृजनात्मक शक्ति अपनी समस्त सृष्टि में व्याप्त है। वो शक्ति जो एकमेव शुद्ध, अनन्त चेतन शक्ति को नाम-रूप के सीमित संसार में अभिव्यक्त होने देती है, उसका नाम है माया। तो, इस मायाशक्ति के माध्यम से ही ईश्वर हमें अपने कर्मफल के भोग के योग्य बनाता है। इसी शक्ति के चलते ईश्वर हमारे सामने परमात्मा को इस प्रकार से प्रस्तुत करता है कि हमारी समझ में आ सके और हम मुक्ति पा सकें। जब हम देवी की उपासना माया के रूप में करते हैं तो हम इस सत्य को स्वीकार कर, उसे सविनय प्रणाम करते हैं। वास्तव में, माया का बँधनात्मक पहलू हमारा मन ही है, कोई बाहरी वस्तु या शक्ति नहीं। माया इस मन का मूल रूप है, जो बन्धन का भी कारण है और मोक्ष का भी।

एक बार एक आदमी को डकैतों ने लूट कर पेड़ के साथ बांध दिया और फिर कुँए में फेंक दिया। इस आदमी ने सहायता के लिए पुकारा तो कोई राहगीर दौड़ कर आया और कुएँ में रस्सी फेंकी, जिसे पकड़ कर वो बाहर आ गया। तो यहाँ देखो, एक रस्सी ने उसे बंधन में डाला तो दूसरी रस्सी ने उसकी रक्षा की। इसी प्रकार, हमारे बंधन और मोक्ष का कारण बनता है। जब सांसारिक वस्तुओं में रम जाता है तो बन्धन का कारण बनता है और जब हम अपने शुद्ध-बुद्ध स्वरूप के प्रति जागृत हो उठते हैं तो मोक्ष का। तो मन के द्वारा ही मन पर विजय पानी है। मान लो, हमारे पाँव में काँटा चुभ जाये तो क्या हम उसे बाहर निकालने के लिए दूसरे कांटे का सहारा नहीं लेते? और फिर दोनों काँटों को फेंक देते हैं। इसी प्रकार, हमें अपने मन के द्वारा ही राग-द्वेष से परे जाना है और सद्गुणों व ज्ञान का विकास करना है। इस तरह मन द्वारा ही हमें मानसिक शुद्धि प्राप्त करनी है और फिर अपने सत्स्वरूप को जान कर मन की सीमा के पार चले जाना है।

बच्चो, समस्त सृष्टि को परमात्म-स्वरुप जान कर, उसकी सेवा करो। इससे हम परमात्मा के कृपापात्र बन जायेंगे। यह ज़रा कठिन हो सकता है लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमसे जितना बन पड़े, उतना करें। छोटी-छोटी सी चीज़ें जैसे मीठी सी मुस्कान, दूसरों की गलतियों को माफ़ कर देना…सहायक सिद्ध होती हैं। ये सद्गुण किसी टॉर्च की तरह हमारी राह को रोशन कर देंगे। और हमारी राह जब पूरी तरह से रोशन हो जाएगी तो फिर हमें रस्सी में साँप का और साँप में रस्सी का भ्रम नहीं होगा। फिर हम जो चीज़ जैसी है, उसे वैसा ही देख पाएंगे और दुःख से मुक्त हो जायेंगे।

नवरात्रि का त्यौहार मेरे सभी बच्चों में सद्गुणों जगाये! तुम सब पर ईश्वर कृपा करें!

-अम्मा, श्री माता अमृतानन्दमयी देवी

दिनांक 18 सितंबर को प्रसिद्ध योगगुरु श्रीरामदेवजी बाबा अमृतपुरी में अम्मा के दर्शनार्थ आये थे। माता अमृतानन्दमयी मठ की ओर से स्वामी तुरियामृतानन्द पुरी ने पूर्णकुंभ देकर उनका पारंपारिक रीति से स्वागत किया।

अम्मा के दर्शन के पश्चात वे अम्मा के साथ भजन हॉल में आये। अम्मा ने उन्हें आश्रमवासियों को संबोधित करने का अनुरोध किया।
इस अवसर पर अपने प्रबोधन में वे बोले, ‘‘मैं पहली बार माँ के दर्शन के लिये आया हूँ और एक दिव्य माँ का सान्निध्य, स्पर्श, करुणा, और आचरण कैसा होता है, यह अभी मैंने कुछ ही पलों में अनुभव किया। मैंने माँ के बारे में बहुत सुना था कि माँ बहुत करुणामय हैं, वो बहुत सेवाकार्य कर रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सेवा, स्वास्थ्य क्षेत्र में सेवा, अन्य धर्मार्थ सेवाकार्य अम्मा यहाँ कर रही हैं। बहुत करुणा वाली हैं। बहुत सेवावाली हैं और मैंने यहाँ और एक बात देखी कि माँ बहुत करुणामय तो हैं ही, साथ ही माँ का आध्यात्मिक ज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान भी बहुत उँचा है।

माताजी जोे जीती हैं, वो वेदान्त है।
‘‘माँ मुझसे बायोकेमिस्ट्री के बारे में बोल रही थी। विटामिन बी, विटामिन डी, कैंसर क्या है और उसका उपचार क्या है, आदि। यह मेरे लिये बड़ा आश्चर्य था। पर्यावरण के बारे में मैंने माँ के विचार सुने। मैंने शास्त्र में पढा था कि भगवान के दो रूप है। एक मूर्त और दूसरा अमूर्त। मैंने सुना है, माँ ने वेदशास्त्र का अध्ययन गुरु-शिष्य परंपरा से नहीं किया है, लेकिन माताजी जोे जीती हैं, वो वेदान्त है। माता ने मुझे बताया कि यह सब विश्व भगवान की जीवंत अभिव्यक्ति है। सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग नहीं है। इसमें अभेद है। यही अद्वैत है। यही एकत्व है। यही अद्वैत तत्त्वज्ञान है। सृष्टि और सृष्टिकर्ता अलग नहीं है। और वैसा माता स्वयं जीती भी हैं। सारी सृष्टि भगवान का स्वरूप मानकर सेवा करती हैं तो मुझे लगा कि आत्मज्ञानी, आत्मवेत्ता ऋषि कैसे होते थे – तो माताजी जैसै होते थे।

अध्यात्म में तीन मूल्ये बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। 1)एकत्व 2)सहअस्तित्व, 3)बंधुत्व, प्रेम व करुणा. माताजी इन तीनों मूल्यों को जीने वाली हैं, इसलिये माताजी धर्म का, वेदान्त का साक्षात स्वरूप है। मैं गुरुकुल में पढा। महर्षि दयानंद जी के संस्कार मिले तो बुद्धि से बहुत काम लेता था। माँ के बारे में सुना था कि माँ बहुत प्यार करनेवाली है, तो मैंने कहा कि ठीक है, हमारी भी माँ हमको बहुत प्यार करती है। लेकिन माँ का प्यार भगवान के प्यार जैसा है। माँ में ज्ञान की पराकाष्ठा है, भक्ति की भी पराकाष्ठा है और कर्म-सेवा की भी पराकाष्ठा है। माँ में त्रिवेणी संगम है। यह मैं माँ की प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ। लेकिन मैंने यहाँ कुछ ही देर माँ को जो अनुभव किया वह कह रहा हूँ।

हम माँ के भक्त तभी कहलाऐंगे, माँ के बच्चे तभी कलहाऐंगे, जब माँ जैसे खुद बन जायेंगे। भक्ति यही है कि जिसकी हम भक्ति करते हैं, वैसा हम खुद बन जायँ। यही श्रद्धा है, यही भक्ति है। यही प्रियाचरण है। यही शिष्यत्व है। भगवान हम सबको ऐसी शक्ति दे कि हम माँ जैसे बन जाएँ।
माँ बोलती बहुत थोडा है, जीती है समग्रता को, सत्य को, धर्म को। आजकल लोग बोलते बहुत हैं और करते बहुत कम हैं, यह बहुत बड़ी समस्या है। मैंने माँ से पूछा कि माँ मुझे भी आदेश दे दो, मैं भी आपकी दिव्य संतान हूँ, आपका पुत्र हूँ। मुझे क्या करना चाहिये। तो माँ बोलती है, मैं जो चाहती हूँ वो तुम अपने आप ही कर रहे हो।

माँ चाहती हैं कि भारतीय नस्ल की गायें बहुत हो, उनकी पूजा हो। उनके द्वारा मनुष्यों की सेवा हो। इस धरती का कल्याण हो। भारतीय नस्ल की गाय जो इधर 2-3 किलो दूध देती है, पतंजलि में वो 30 किलो प्रतिदिन दूध देती है। माताजी बहुत खुश हुई कि 30 लिटर दूध देती है गाय? वो भी भारतीय नस्ल की! वो कुछ गाय मैं यहाँ दान में भेजूँगा जो 25-30 लिटर दूध देती है।

माताजी को मैंने पूछा, धर्म की प्रतिष्ठा कैसी होगी? तो माँ ने कहा, बच्चों को बचपन में ही मॉडर्न एज्युकेशन के साथ, सायन्स के साथ अध्यात्म का, योग, ध्यान, आदि अध्यात्म मूलक धर्म का संस्कार देना होगा। माँ के आशीर्वाद से मैं स्वयं कम से कम 50 साल तो और जीने वाला हूँ। इस 50 साल में जैसा माँ चाहती है, वैसे बच्चे भारत माता को देकर जाना चाहता हूँ।

सायन्स और अध्यात्म को माताजी एकसाथ देखना चाहती है और यही हम सबको मिलकर करना है। माताजी ने बोला अनुसन्धान होने चाहिए। तो हम माताजी के आशीर्वाद से दुनियाँ का सबसे बडा आयुर्वेद रिसर्च सेंटर बना चुके हैं। और उसको आगे बढ़ायेंगे। माँ हमारी बहुत बडी प्रेरणा है। परम प्रेरणा और परम आदर्श। अम्मा एक व्यक्ति मात्र नहीं है। अम्मा इस धरती पर शाश्वत का, उस भगवती जगदंबा का मूर्त रूप है। भगवती माँ की अनंत करुणा, अनंत प्रेम, अनंत दिव्यता, अम्मा में अमृत बनकर बरसती है इसलिये उनका नाम ही अमृतानंदमयी माँ है।

माताजी मुझसे एक बात कह रही थी। जो योगी है, आध्यात्मिक व्यक्तित्व है, ऋषियों के जो उत्तराधिकारी हैं, उन योगी आत्माओं को समाज जीवन में दिव्यत्व लाने के कर्म करना चाहिये और माताजी वैसी करती है इसलिये मैं उनका अभिनंदन भी करता हूँ। आजकल भारत के संतों को लेकर कई प्रश्न उठाये जाते है। लेकिन भारत का संत कैसा होता है, भारत के ऋषि कैसै होते हैं, तो हमारे अम्मा जैसे होते हैं और आज मैं एक बात कहना चाहता हूँ।

पतन तो समाज के हर जीवनक्षेत्र में हो रहा है। लेकिन एक बात मैं आपको कहता हूँ। भारत की करोडो वर्ष पुरानी संस्कृति है। और इसी ऋषि संस्कृति का कभी भी अंत नही होने वाला है। मैं जो कुछ कर रहा हूँ, पूज्य माताजी जो कुछ कर रही हैं, यह हम उसी ऋषि परंपरा को गौरव देने केलिये ही कर रहे हैं। और इस संस्कृति को मिटने का तो प्रश्न ही नहीं, इस संस्कृति को दुनियाँ के शिखर पर ले के जायँगे और भारत माता को परम वैभवशाली जगद्गुरु विश्वगुरु बनायेंगे। और भारत माता का मतलब एक कोई ज़मीन का टुकडा नहीं है। भारत माता का अर्थ है, यह धरती माता। इस धरती पर भारत माता में विशेष पुण्य आत्माओं का जन्म हुआ इसलिये इस भारत माता को हम विशेष गौरव देते हैं, सृष्टि के आदि कालसे। पूरा विश्व ही मेरी अम्मा का परिवार है।

अम्मा से जब मैं मिला अभी सत्संग से पहले तो माँ ने कहा- लोग कहते हैं कि भारत के धर्म में करुणा सिखायी नहीं जाती। तो माँ बोलती हैं, करुणा सिखानी की चीज नही है। जब आप एकत्व में जीते हो, तो करुणा के आप स्वयं अवतार हो जाते हो। आपका जीवन पूरा ही करुणामय हो जाता है, क्योंकि आपको सृष्टि के कर्ता और सृष्टि में भेद ही नहीं दिखाई देता। सेवा में आप धन्यता अनुभव करते हो। यही सबसे बडी करुणा है।

पूरा विश्व ही अम्मा का परिवार है। यहाँ सभी हैं। भाषा की सीमा नहीं, धर्म की सीमा नहीं, जाति की सीमा नहीं, देश की सीमा नहीं। यहाँ केवल एकत्व ही है। अपना शरीर देखे। पांच तत्त्व सभी जगह एक जैसे है, पंचभूतात्मक ज्ञानेंद्रिये, कर्मेंद्रिये एक जैसे है, अपना आत्मा भी एक ही है। और परमात्मा भी एक ही है। फिर भेद कहाँ है? इसलिये एकत्व ही अंतिम सत्य है। जो इस एकत्व को अनुभव नही कर पाते या तो वे मूर्ख है, या तो वे अंधे हैं। माताजी ने अंधों को आँखें दी हैं। और मंदबुद्धियों को, बुद्धुओं को बुद्धि दी है।

अम्मा का स्कूल डिग्रीवाला नहीं है, डिविनिटी वाला है। और मुझे जहाँ तक पता है, अम्मा ने डिग्री नहीं ली है, वो तो डिविनीटी है। और मैं आपसे भी कहता हूँ- यह बात सीखने जैसी है- दिव्यता बाहर से नही सिखी जाती। वो अंदर से उतरती है। जैसे माँ के रूप में वो दिव्यता अवतरित हुई है। और यही भारतीय संस्कृति का सबसे बडा सिद्धांत है।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। हम सबके भीतर पूर्णता है। हम अपने भीतर अपूर्णता, न्यूनता, अल्पता अनुभव करते है, तभी तो हम दुःखी होते है, स्त्री सोचती है, मैं पुरुष से और पुरुष सोचता है मैं स्त्री से पूर्ण हो जायेंगे यह सही नहीं हैं। स्त्री भी पूर्ण है। पुरुष भी पूर्ण है। सृष्टि भी पूर्ण है और सृष्टिकर्ता भी पूर्ण है। जब सबकुछ पूर्ण है तो अपूर्णता कैसी? आदमी सोचता है मेरे पास पैसा कम है। मैं गरीब आदमी हूँ। पैसे से मैं पूरा हो जाऊँगा। सत्ता नहीं है, सत्ता से पूरा हो जाऊँगा। संपत्ति से पूरा हो जाऊँगा। यही सोच विनाशक सोच है। यही सोच दुःख देने वाली सोच है। इसलिये बाहर की सत्ता संपत्ति, ऐश्वर्य, उपलब्धियाँ, सफलताऐं यह हमें पूरा नहीं करेंगी, जबतक हम खुद भीतर से हमारी पूर्णता को अनुभव नही करेंगे। कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठता होगा, जब सबकुछ पूरा है तो कुछ भी क्यों करना? तो फिर कुछ भी मत करो। तो क्या निष्क्रिय बनकर रह जाये? यही धर्म है? यही जीवन है? यह धर्म नहीं, यह तो अधर्म है। वेद कहता है, जो कर्म नहीं करते वे तो राक्षस है।

कुर्वेन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेद् शतगुम् समाः यह सिद्धांत है, अपने कर्म को धर्म मानकर भगवान की सेवा करो।
देखो, यह सूर्य अपना कर्म करता है, चंद्र अपना कर्म करता है। धरती माँ अपना कर्म करती है। और यह भगवती अम्मा अपना कर्म करती है। तो सब अपना अपना कर्म करें तो यही धर्म है, यही जीवन है, यही सृष्टि का विधान है। यही वेद का विधान और यही सनातन सिद्धांत। तो सदा अपने भीतर पूर्णता अनुभव करते हुये, पूर्ण कृतज्ञता के साथ जैसे संसार की सारी वस्तुएं अपने अपने कर्तव्य में लगी हुई है। हम भी अपने कर्तव्यों को श्रद्धापूर्वक निभाएँ तो हमारा जीवन भगवान की आराधना, पूजा बन जाता है। ऐसी पूर्णता हम सबको मिलें, ऐसा अम्मा हम सबको आशीर्वाद दें।

अम्मा को भजन बहुत प्रिय है इसलिये एक-दो भजन की लाईन गाता हूँ।

प्रभुजी इतनी सी दया कर दो, हमें भी तुम्हारा प्यार मिले।
कुछ और भले मिले ना मिले । प्रभु दर्शन का अधिकार मिले।
कुछ और भले मिले ना मिले। हम जनम् जनम् के प्यासे हैं
और तुम करुणा के सागर हो। करुणानिधि से करुणारस की
एक बूँद हमें एक बार मिलें। प्रभु मन मंदिर में दातार मिलें।
प्रभु दर्शन का अधिकार मिलें। हमको भी तुम्हारा प्यार मिलें।

बच्चो, ऐसा नहीं लगता कि विश्व में आज जहाँ देखो, वहीं समस्याएं हैं? भारत के नगरों में बम्ब फटने का, आतंकवादी हमलों का भय है। अम्मा को ज्ञात है कि हम सब इनके तथा अन्य खतरों के विषय में चिंतित हैं। विश्व-भर की समस्याओं का एकमात्र उत्तर है – करुणा।

सब धर्मों का मूलभूत सिद्धान्त दूसरों के प्रति करुणापूर्ण व्यवहार है। धर्मगुरुओं को अपने जीवन में इसका आचरण कर, दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। आज विश्व में ऐसे अनुकरणीय व्यक्तियों का विशेष अभाव है। धर्मगुरुओं को इस अभाव की पूर्ति करने का साहस कर दिखाना चाहिए।

उन्हें विश्व-एकता तथा प्रेम के गीत को गाने की पहल करनी चाहिए, विश्व हेतु दर्पण-सदृश बनना चाहिए। दर्पण को साफ़ उसकी सफ़ाई के लिए नहीं किया जाता अपितु उन लोगों के लिए किया जाता है जो उसमें अपना मुख देखते हैं ताकि वे अपने मुखमंडल को बेहतर साफ़ कर सकें। धर्म के इन दूतों को अनुकरणीय बनना होगा क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण का सीधा प्रभाव, उनके अनुयायियों के वचनों तथा कर्मों की शुद्धि पर पड़ता है। जब सदाचारी लोग स्वयं आदर्शों का आचरण करते हैं, तभी उनके अनुयायी भी उसी उत्साह से श्रेष्ठ-आचरण हेतु प्रेरित होते हैं।

एक सीमा तक, प्रत्येक व्यक्ति को अनुकरणीय बनना चाहिए क्योंकि कोई न कोई हमसे अवश्य प्रेरित होता है। अतः हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम उनके लिए अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करें। अनुकरणीय लोगों के उस विश्व में, फिर न युद्ध होंगे और न शस्त्र, वे भूतकाल के एक दुस्वप्न की भाँति हो जायेंगे। हथियार संग्राहलयों के लिए कलाकृति-मात्र हो कर रह जायेंगे-भूतकाल की उन स्मृतियों के रूप में, जब मनुष्य अपने लक्ष्य के पथ से भटक गया था।

हमारी भूल यह है कि हम धर्म की उथली बातों में फंस कर रह गए हैं, इसे हमें सुधारना होगा। आइये, हम मिल-जुल कर धर्म के ह्रदय-प्रेम, ह्रदय की पवित्रता तथा सर्वत्र एकत्व के दर्शन-को स्पर्श करें। आज का युग वो युग है जहाँ सम्पूर्ण विश्व सिमट कर एक छोटा सा गाँव बनता जा रहा है। ऐसे में हमें धार्मिक-सहिष्णुता की ही नहीं अपितु गहन परस्पर-तालमेल की ज़रुरत है। अविश्वास तथा गलतफहमियों को पीछे छोड़ना होगा। आओ, हम प्रतिद्वंद्विता के अंधकारमय युग को अलविदा कहें तथा सृजनात्मक, अंतर्धार्मिक-सहयोग के नए युग का श्रीगणेश करें!

अंतर्धार्मिक-सहयोग को प्रोत्साहन देने के लिए, प्रत्येक धर्म को वहाँ अपने केन्द्रों की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ अन्य धर्मों का गहनतापूर्वक अध्ययन हो रहा हो। इसका उद्देश्य अति विशाल होना चाहिए, न कि स्वार्थपूर्ण।

जिस प्रकार सूर्य को मोमबत्ती के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार परमात्मा को भी हमसे कोई अपेक्षा नहीं है। गरीबों की सहायता ही हमारी सच्ची प्रार्थना है। करुणा के अभाव में हमारे सब प्रयास व्यर्थ होंगे-मानो हम गंदे बर्तन में दूध उँडेल रहे हों। सब धर्मों को दीन-दुखियों, गरीबों की करुणा से प्रेरित सेवा के महत्व पर बल देना चाहिए।

आओ, हम आनंदमय कल के प्रार्थना व प्रयास करें, जहाँ संघर्ष-विरोध का नामोनिशाँ न हो, जहाँ विभिन्न धर्म मिल-जुल कर सुख-शान्ति तथा प्रेमपूर्वक कार्यरत हों! हमारा जीवन रुपी वृक्ष प्रेम की माटी में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहे! सत्कर्म उस वृक्ष के पर्ण हों; करुणापूर्ण शब्द इसके पुष्प हों तथा शान्ति इसका फ़ल। हम एक ही कुटुंब के सदस्यों की भाँति प्रेमसहित फलें, फूलें ताकि हम शान्ति एवं संतोष से अभिभूत विश्व में अपनी एकता का आनंदोत्सव मना सकें।

कल्पना करो कि हम जन-समूह में हैं और एक पत्थर आ कर लगता है और हमें चोट लग जाती है। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम मारने वाले को पकड़ने की बजाय पहले अपने घाव पर ध्यान दें, उसकी मरहम-पट्टी करें। किन्तु यदि हम मारने वाले के पीछे दौड़ेंगे तो अपने घाव को धूल तथा जीवाणुओं के लिए खुला छोड़ देंगे, जिससे उसे भरने में बहुत समय लग जायेगा। इसके अतिरिक्त, हम किसी को पकड़ कर गाली-गलौज कर लें, पिटाई कर डालें और बाद में मालूम हो कि हमने तो किसी गलत व्यक्ति की धुलाई कर दी तो? ऐसा भी तो सम्भव है कि पत्थर हमें दुर्घटनावश आ लगा। और यदि हमारी पकड़ में सही व्यक्ति भी आ गया तो उसकी पिटाई करने से हमारा घाव तो भर नहीं जायेगा या पीड़ा दूर नहीं होगी। क्रोध की स्थिति भी घाव जैसी ही होती है। हमारी अविलम्ब प्रतिक्रिया होनी चाहिए कि हम इसे शाँत करें, अतः उस समय हमें साक्षी-भाव से रहना चाहिए। यदि हम नकारात्मक विचारों से तादात्म्य कर लें और उनमें फंस कर रह जाएँ तो हम शीघ्र ही उन्हें वचन तथा कर्म में परिणत होते पाएंगे, जोकि आगे चल कर दुखदायी ही होने वाला है। हमने क्रोध के सामने घुटने टेक दिए तो शीघ्र ही जान जायेंगे कि यह हमारे लिए कहीं अधिक हानिकर है बजाय उस व्यक्ति के जो इसका कारण है।

अम्मा को यहाँ एक बस-कंडक्टर की कथा याद आती है। एक दिन उसे अपने एक स्टॉप पर एक हट्टा-कट्टा, सात-फुट लम्बा नया व्यक्ति दिखाई दिया। वो बस पर चढ़ा और एक सीट पर बैठ गया। जब कंडक्टर ने किराया माँगा तो उसने उत्तर में कहा कि, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। दुबले से कंडक्टर ने गौर से उसे देखा और ड़र के मारे दोबारा नहीं माँगा। वो कोई गैंग-लीडर जान पड़ता था, अतः बिना कुछ और बोले कंडक्टर वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया। अगले दिन भी यही घटनाक्रम रहा। वो व्यक्ति उसी बस-स्टॉप से चढ़ा और टिकिट खरीदने के लिए उसका वही उत्तर था कि, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। भीतर ही भीतर कंडक्टर क्रोध से उबल रहा था। वह उस गुंडे को सबक सिखाना चाहता था! उसे अब कुछ और सूझता ही न था। उसकी मनःशान्ति कहीं खो गई थी। और वो व्यक्ति प्रतिदिन बस पर चढ़ता, बिना टिकिट सफ़र करता और उतर जाता और कंडक्टर महाशय का क्रोध प्रतिदिन सातवाँ आसमान छूता। उसका मन इतना अशांत था कि वह अपने पत्नी-बच्चों के साथ भी बात नहीं कर पाया। आखिर उसने सोचा कि बहुत हो गया, अब कुछ करना ही पड़ेगा। परन्तु समस्या थी कि वह स्वयं तो इतना छोटा, दुर्बल सा था। अतः उसने एक कराटे-टीचर से सहायता लेने का निर्णय किया। अब उसके जीवन का केंद्र-बिंदु कराटे बन गया, जिसमें निपुणता पाने के लिए वह छुट्टी पर भी रहने लगा। वो कराटे तथा मार्शल-आर्ट्स सीखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता था। सब सीखने के पश्चात् जब वह काम पर वापस लौटा तो विश्वस्त हो गया कि अब वह सात-फुटे बदमाश से निपट सकता है। पहले ही दिन वो भारी-भरकम व्यक्ति स्टॉप पर मिल गया। हमेशा की तरह, आज भी कंडक्टर टिकिट देने लगा तो चिर-परिचित उत्तर सुनाई दिया, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। ‘‘परन्तु आज…’’ कंडक्टर ने आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, ‘‘नहीं, यह सब नहीं चलेगा! टिकिट तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा। तुम नहीं लोगे तो बस यहाँ से एक इंच भी आगे नहीं चलेगी!’’

इस पर सात-फुटे ने कहा, ‘‘क्षमा चाहता हूँ, केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं है। मेरे पास फ्री-पास है’’। और उसने जेब से फ्री-पास निकाला और परिवहन-विभाग के एक उच्च-अधिकारी के रूप में अपना परिचय दिया, जिस पद पर यात्रा हेतु फ्री-पास का विशेषाधिकार दिया जाता है।

तो यहाँ किसकी हार हुई? कंडक्टर ने कितने दिन गँवा दिए? उसने कराटे सीखने के लिए, व्यर्थ ही कितना समय तथा धन बर्बाद किया? कितना तनाव-ग्रस्त रहा? और फिर, घर की शान्ति भी नष्ट हुई। इस सब में उसे क्या मिला? कुछ भी तो नहीं!

क्रोध में ऐसा ही होता है। आदमी खोता ही है, प्राप्त कुछ नहीं होता। हमें यह सदा याद रखना चाहिए। जब क्रोध आने लगे तो उसे दबाना नहीं, अन्यथा आखिर एक दिन फट पड़ेगा। परन्तु तत्काल प्रतिक्रिया से भी बचें। जितना हो सके, मन को शाँत करने का, मौन करने का प्रयास करें। फिर बुद्धिमत्ता सहित स्थिति को आँकें। यदि हम ऐसा कर सकें तो जीवन में क्रोध से उत्पन्न होने वाली कितनी ही विपदाओं से बच सकते हैं!