बच्चो, हम सदा से सुनते आ रहे हैं कि स्त्री निर्बल है। इसका क्या महत्व है? दूसरी जो बात हम प्राचीन काल से सुनते आ रहे हैं वो यह – क्योंकि स्त्री निर्बल है, अतः उसे सदा एक रक्षक की ज़रुरत होती है। सदियों से समाज ने रक्षक की यह भूमिका पुरुष को सौंपी है। फिर भी, हर युग में ऐसी साहसी स्त्रियाँ रही हैं जो स्वयं पर थोपे गए पिंजरों को तोड़ कर बाहर आईं और क्रान्ति का प्रारम्भ हुआ। रानी पद्मिनी, हाथी रानी, मीराबाई तथा झांसी की रानी – इनमें से कोई भी स्त्री निर्बल नहीं थी। वे तो वीरता, साहस तथा पावित्र्य की मूर्ति थीं। स्त्रीत्व के ऐसे ही रत्न अन्य देशों में भी हुए हैं; जैसे फ्लोरेंस नाइटिंगेल, जोन-ऑफ़-आर्क तथा हैरियट टबमैन।


वास्तव में, पुरुषों को चाहिए कि वो स्वयं को न तो स्त्री के रक्षक के स्थान पर रखे और न ही ताड़क बने। पुरुष को स्त्री के साथ मिल-जुल कर रहना चाहिए तथा स्त्री को समाज की मुख्यधारा में नेतृत्व की भूमिका हेतु उदारता तथा तत्परता सहित आने देना चाहिए।
बहुत से लोग प्रश्न करते हैं कि आखिर यह पुरुष का अहम् आया कहाँ से? वेदान्त के अनुसार मूल कारण ‘माया’ हो सकता है परन्तु एक और उद्गम भी हो सकता है। प्राचीन काल में, मानव वनों, गुफाओं अथवा पेड़ों पर घर बना कर रहता था। क्योंकि शारीरिक रूप से पुरुष स्त्री की बजाय अधिक बलवान होता है, अतः शिकार करने तथा वन्य-जीव-जंतुओं से परिवार की रक्षा करना उसका दायित्व होता था। स्त्रियाँ घर पर रह कर घर का काम-काज व बच्चों का दायित्व संभालती थी। क्योंकि पुरुष भोजन तथा वस्त्र हेतु जानवरों की खाल घर ले कर आता था, संभवतः इसलिए उसने यह सोच लिया कि स्त्री उस पर आजीविका के लिए आश्रित है, वो स्वामी एवं स्त्री दासी है। इस प्रकार, स्त्री ने भी पुरुष को रक्षक का स्थान दे दिया होगा। कदाचित यहाँ से अहम् की निर्मिती हुई।
स्त्री निर्बल नहीं है और ऐसा सोचना भी उचित नहीं है परन्तु उसमें स्वाभाविक रूप से जो करुणा, सहानुभूति है, उसका प्रायः गलत अर्थ लगाया जाता है – निर्बलता। यदि स्त्री अपनी शक्ति को खींच कर भीतर संजो ले तो कदाचित पुरुष से भी बढ़ कर हो सकती है। पुरुष वर्ग को चाहिए कि स्त्री की उसकी गुप्त शक्ति के बोध एवं स्वीकृति में सच्ची सहायता करे। यदि हम उस भीतरी शक्ति के साथ स्वयं को मिला दें तो यह विश्व स्वर्ग बन जाए। कहना आवश्यक नहीं कि प्रेम एवं करुणा जीवन के आवश्यक अंग बन जायेंगे।


अम्मा ने एक अफ्रीकन देश में युद्ध के विषय में एक घटना सुनी थी। इस युद्ध में असंख्य पुरुष मारे गए। यद्यपि स्त्रियों की 70% जनसँख्या थी, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे एकजुट हुईं। वैयक्तिक अथवा सामूहिक रूप से छोटे-मोटे व्यापार में लग गईं। वे अपने बच्चों तथा अनाथ बच्चों का भी लालन-पालन करने लगीं। शीघ्र ही स्त्रियों ने स्वयं को अद्भुत रूप से सशक्त पाया तथा उनकी स्थिति में मौलिक सुधार आया। इससे सिद्ध होता है कि चाहें तो स्त्रियाँ अपनी विनाश की स्थिति से ऊपर उठ कर एक गम्भीर शक्ति के रूप में उभर सकती हैं।

ऐसी ही घटनाओं के कारण, लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि, “यदि कोई स्त्री राज्य करे तो अनेकों दंगों तथा युद्धों से बचा जा सकता है। आख़िरकार, एक स्त्री बहुत सोच-समझ कर ही अपने बच्चों को मरने-मारने के लिए युद्ध के मैदान में उतारेगी। एक माँ ही बच्चा खोने वाली दूसरी माँ की पीड़ा समझ सकती है। ”
यदि स्त्रियाँ एकजुट हो कर साथ खडी हो जाएँ तो समाज में बहुत से वांछित परिवर्तन ला सकती हैं। किन्तु पुरुष को भी उन्हें इस ओर प्रोत्साहित करना होगा। अम्मा का कहना है कि समाज तथा आगामी पीढ़ियों को विपदा से बचाने के लिए, स्त्रियों तथा पुरुषों को मिल कर आगे आना होगा। इससे समाज एवं विश्व का उत्थान होगा। हम सबको इस लक्ष्य की ओर करबद्ध होना होगा।

अर्जुन एवं कृष्ण गाढ़ मित्रों की भाँति साथ-साथ खेलते-कूदते बड़े हुए। उस समय भगवान् गीतोपदेश नहीं देते थे। परन्तु कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन पूर्णतः उद्विग्न हो गया और उसके भीतर का शिष्य जाग उठा, तब अर्जुन ने अपने सारथी-सखा कृष्ण को गुरु रूप में स्वीकार किया। अर्जुन के भीतर शिष्यत्व के जागने पर ही कृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया। इसमें हम सबके लिए एक शिक्षा छिपी है। हमें अपने भीतर एक शिष्य का भाव जागृत करना है। शिष्य-भाव से अभिप्राय है – पूर्ण समर्पण। वास्तव में, यदि हम यह कर सकें तो हम सहसा पाएंगे कि विश्व की प्रत्येक वस्तु हमारी गुरु हो गई है। प्रत्येक अनुभव हमें शिक्षा देने के लिए आता है। इसके विपरीत, इस भाव के अभाव में हम कुछ नहीं सीख पाएंगे, भले कुछ भी हो जाए।

अम्मा को ज्ञात है कि आप सबको ढेरों चिंताएं हैं। परन्तु स्मरण रहे कि कटे हुए हाथ को देख-देख कर रोने से कुछ नहीं होगा। घाव की मरहम-पट्टी की आवश्यकता है ताकि संक्रमण न हो। परन्तु सोच में पड़े रहना, चिंता करते रहना हमारा स्वभाव ही हो गया है। तनाव हमारे मन को ही नहीं अपितु शरीर पर भी प्रभाव डालता है, बहुत से रोग लगा देता है। तनावग्रस्त लोगों को दैहिक रोग अधिक सताते हैं।

समर्पण तनाव-मुक्ति का एकमात्र साधन है। सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर देने से हमारा बोझ कम हो जाता है। सच तो यही है कि होनी हमारे वश में नहीं-अगली साँस तक हमारे वश के बाहर की बात है। इस ज्ञान के साथ हम अपने सभी कर्म कर, उन्हें ईश्वर को अर्पित कर दें, परन्तु कर्तृत्व न लें। हमारा भाव यह रहे कि हम सब कर्म उसकी कृपा से कर रहे हैं। कर्म को पूजा मान कर करें। यही समर्पण का भाव हमें विकसित करना होगा।

परमात्मा हम सबके भीतर आत्मा के रूप में वास करता है। प्रतिक्षण वो हमें सरल, मधुर शब्दों द्वारा राह दिखलाता है। परन्तु दुर्भाग्य! कि हम में सुनने का धैर्य ही नहीं, हम उसकी कही बात को सुनते ही नहीं। तभी तो हम बारम्बार गलतियों को दोहराते रहते हैं और फिर दुःख पाते हैं। हमें शिष्यत्व के एक आवश्यक गुण – आज्ञा पालन – को विकसित करना चाहिए। जब यह भाव जागृत हो जाता है, जब हम ध्यान से सुनने को, श्रद्धा तथा विनम्रतापूर्वक उसके शरणागत होते हैं तब ही वो गुरु बन कर हमारा मार्गदर्शन करने का दायित्व लेता है। जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ।

समर्पण की बात चले तो मन में राधा का विचार आता है। जब कृष्ण वृन्दावन छोड़ कर मथुरा गए तो वो राधा अथवा किसी गोपी को साथ नहीं ले गए थे। अतः वे सब अति-निराश हो गईं। एक बार जब उद्धव मथुरा से आये तो राधा से मिल कर बोले कि, “सभी गोपियों ने कृष्ण के लिए अपने सन्देश में पूछा है कि अब वो मथुरावासी ही हो जायेंगे अथवा उन्हें भी वहां बुला लेंगे? तुमने मुझे कृष्ण के लिए ऐसा कोई सन्देश क्यों नहीं दिया?”

राधा ने उत्तर दिया, “जब घर का स्वामी बाहर जाता है तो या तो वो दास को साथ ले जाता है या नहीं ले जाता। यदि न ले जाए तो इसमें दास क्या करता है? घर की चाकरी करते हुए स्वामी के लौट आने की प्रतीक्षा करता है। मैन कृष्ण की दासी हूँ, अतः उन्हें अधिकार है कि मुझे साथ ले जाएँ अथवा यहाँ छोड़ जाएँ। वो मुझे साथ ले जाते तो मेरे लिए इससे बढ़ कर कोई सुख न होता। परन्तु वो मुझे साथ नहीं ले गए, इसका मुझे कोई दुःख भी नहीं। मेरे हृदय में जो उनके प्रेम की ज्योति है, मैं उसे दुःख से मन्द नहीं पड़ने दूँगी। मैं उनकी प्रतीक्षा करूंगी, मंदिर को बुहारूंगी और अपने प्रेम की ज्योति से प्रकाशित रखूंगी। दासी होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है। इसीलिये मेरा कृष्ण के लिए कोई विशेष सन्देश नहीं है।”

हमारा भी परमात्मा के प्रति इस प्रकार का राधा-भाव होना चाहिए। यही एक सच्चे भक्त का, दास का भाव है! इसी भाव से हम आत्मबोध की प्राप्ति कर सकते हैं।

बच्चों, भगवद्गीता वेदों का सार है। गीता का संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए है। जिस समय प्रतिकूल परिस्थितियों में अर्जुन अपना कर्तव्य निश्चित न कर पाने के कारण अवसाद ग्रस्त हो गया था, उस समय श्रीभगवान् ने भगवद्गीता के माध्यम से पूरे विश्व को सन्देश दिया था। इसमें भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग और कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं व आध्यात्मिक सिद्धांत समाहित हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव मानव-मात्र को, चाहे उसका सम्बन्ध किसी भी वर्ण-जाति अथवा संस्कृति से हो, अध्यात्म के शिखर तक उठाने के लिए हुआ था। रेस्टोरेंट में यदि एक ही तरह के व्यंजन परोसे जाएं तो कौन वहां जाना चाहेगा! तरह-तरह के स्वाद ही सब को आकर्षित करते हैं। यदि सभी कपड़े एक ही नाप के हों तो सबको पूरे नहीं आएंगे। अलग-अलग नाप के कपड़ों में से ही सब लोग अपने पहनने लायक कपड़े ले सकेंगे। इसी तरह जीवन में भी, कैसी भी परिस्थिति हो गीता हरेक को आत्मसाक्षात्कार का उत्कृष्ट रास्ता दिखाती है।

भगवान् का कथन इतना समर्थ है कि हरेक व्यक्ति को, वह किसी भी परिस्थिति में हो, उसका हाथ पकड़ कर उठा कर खड़ा कर दे। गुरु और उनका मार्गदर्शन एक दूसरे से भिन्न नहीं होते। इसी तरह भगवान् और गीता में दिया संदेश दो नहीं हैं। गीता धरती पर भगवान् के जीवन की व्याख्या है और भगवान् का जीवन गीता की ही व्याख्या है। भगवान् का जीवन शीतल पवन का वह झौंका है जिसका प्रेमपूर्ण स्पर्श सभी को जागृत करता है। इस तरह गीता अनूठी है। कल्पतरू की तरह सांसारिक जीवन के दुखों से सन्तप्त लोगों को अपनी छाया देती है। वेदों के ज्ञान-सागर को मथ कर भगवान् ने हमें गीता रुपी अमृत प्रदान किया है। अनादि-अनन्त परमात्मा की ही भाँति, भगवद्गीता की कृपा भी समस्त विश्व पर सदैव बनी रहेगी।

भगवद्गीता के पाठ का उद्देश्य स्वयं श्रीकृष्ण बनने से व रामायण का पाठ श्रीराम बनने का है।

– अम्मा, श्री माता अमृतानन्दमयी देवी

सभी जीवों में एक भाव सामान्य है, वो है प्रेम। इस मार्ग द्वारा स्त्री-पुरुष परस्पर तथा दोनों प्रकृति को और प्रकृति विश्व को प्राप्त कर सकते हैं। और जो प्रेम सब सीमाओं को तोड़ कर बाहर बह निकलता है वो है – विश्व-मातृत्व ।

इस धरा पर यदि कोई उत्तम पुष्प खिल सकता है तो वो है प्रेम का पुष्प। एक खूबसूरत, सुगन्धित फ़ूल किसी छोटे से पौधे पर भी खिल सकता है। उसी प्रकार, प्रेम मानव-हृदय में प्रस्फुटित होता और फलता-फूलता है। स्त्री-पुरुष दोनों को इसे भीतर से विकसित होने देना चाहिए। दो प्रेमी हृदयों के सौन्दर्य व शक्ति से बढ़ कर कुछ गूढ़ नहीं है। प्रेम में पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसी शीतलता तथा सूर्य की किरणों जैसी चमचमाती दीप्ति है। परन्तु अनुमति बिना प्रेम हमारे हृदय में प्रविष्ट नहीं हो सकता। स्त्रियों व पुरुषों को अपने भीतर इसी प्रतीक्षारत प्रेम का आह्वान करने को समान रूप से तत्पर होना चाहिए। केवल और केवल प्रेम ही मानसिकता में स्थाई परिवर्तन ला सकता है। यदि पति-पत्नी परस्पर सूझ-बूझ के साथ रहते हैं तो उनके बीच अलगाव की स्थिति कम होती जाएगी। किसी सीमा तक, इससे सामाजिक समस्याएं भी कम होंगी। आजकल दूसरों को दिखाने के लिए, कोई दम्पति यह दावा कर सकता है कि, “हम परस्पर प्रेम व विश्वास के साथ रहते हैं।” यह सिर्फ दावा ही है। प्रेम कोई कल्पना अथवा दिखावे की वस्तु तो है नहीं, यह तो जीने की राह अथवा यूँ कहें कि स्वयं जीवन ही है।

दिखावा करना अर्थात् मुखौटा पहनना, इसे हटाना ही होगा। अन्यथा समय इसे उतार फेंकेगा। अंतर है तो मात्र इतना कि अपनी-अपनी भूमिका की अवधि के आधार पर किसी का मुखौटा पहले उतारा जायेगा, किसी का बाद में।

मनुष्य की सहज प्रकृति, प्रेम, मुखौटा कैसे बन गई? समझौते तथा विनम्रता को छोड़ कर, जब कोई स्वयं को गर्त में गिरा देता है तो प्रेम एक दिखावा बन कर रह जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम नदी-किनारे खड़े रह कर केवल देखते रहें तो क्या हमारी प्यास बुझेगी? प्यास बुझाने के लिए तो हमें झुक कर पानी पीना होगा। परन्तु यदि हम सीधे तन कर खड़े रहेंगे और नदी को भला-बुरा कहेंगे तो उससे क्या लाभ होगा? इसी प्रकार, यदि हमें स्वयं को प्रेम के निर्मल जल से भरना है तो समर्पण करें।

आज के स्त्री-पुरुष किसी गुप्त-पुलिस विभाग के समान हैं। वे जो कुछ देखते-सुनते हैं, उसे सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे सन्देही स्वभाव के कारण उनकी आयुष्य तथा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होता है। यह स्वयं में एक गम्भीर रोग है। जिसे लग गया वो दूसरों की समस्या को समानुभूति सहित सुनने की क्षमता खो बैठता है।

यद्यपि अनेकों सम्बन्ध खतरे में हैं फिर भी प्रेम पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो गया। यदि प्रेम मर गया तो विश्व समाप्त हो जायेगा। प्रेम की कभी न बुझने वाली चिंगारी, हम सबके भीतर उपस्थित है। हमें केवल इसे थोड़ी सी हवा देनी है और फिर देखियेगा-कैसे यह लपटों में बदल जाएगी।

आज हम अधिकाधिक पशु-प्रजातियों को लुप्तप्राय होता देख रहे हैं। क्या हम प्रेम को भी इसी भाँति लुप्त होने देंगे? नहीं, इसे लुप्त होने से रोकने के लिए हमें फिर से ईश्वर(किसी भी रूप में) में श्रद्धा कर, उसकी पूजा-उपासना की ओर लौटना होगा। वो ईश्वर बाहर कहीं नहीं, अपितु भीतर है – करना है तो केवल इतना कि अपनी दृष्टि को सुधार लें। जैसे पुस्तक पढ़ते समय हम अपनी दृष्टि को शब्दों पर जमाते हैं न कि उस कागज़ पर जिस पर वे शब्द छपे हैं। कागज़ तो वह अधिष्ठान है जिस पर वे शब्द स्पष्ट किये गए हैं।

कुछ लोगों के साथ यह प्रयोग कर के देखिये। एक बड़े से बोर्ड को सफ़ेद कागज़ से ढक दीजिये। इस सफ़ेद कागज़ के बीचोंबीच एक छोटा सा काला धब्बा लगा दें। फिर उनसे पूछिए, “आपको क्या दिखाई दे रहा है?” अधिकाँश लोगों का उत्तर होगा, “मुझे एक छोटा सा काला धब्बा दिखाई दे रहा है।” बहुत कम लोग कहेंगे कि, “मुझे एक बड़े से सफ़ेद कागज़ के बीचोबीच एक काला धब्बा दिखाई दे रहा है।”

आज मानवता की ऐसी दशा हो गई है! स्त्री-पुरुष में जीवन के आधार-मात्र, प्रेम, के मूल्य को आंकने की क्षमता नहीं रही। जब हम पढ़ें तो ज़रूरी है कि अक्षरों को देख पायें। परन्तु पढ़ते समय यह ज्ञान भी बना रहे कि कागज़ अधिष्ठान है। इसी प्रकार, मेरे बच्चे यह समझें कि प्रेम जीवन का आधार है। फिर सब शोक दूर हो जायेंगे तथा सब सुखी होंगे।

आश्रम में आये एक व्यक्ति ने अम्मा को बताया कि, “शराब का सेवन न केवल महिलाओं के लिए, अपितु सभी के लिए हानिकारक होता है। स्त्रियों अथवा पुरुषों – किसी को भी शराब का सेवन नहीं करना चाहिए।” अम्मा भी यही कहना चाहती है। शराब सजगता एवं विवेक-शक्ति का नाश कर देती है। लोग शराब के नशे में ऐसी हरकतें कर बैठते हैं जोकि होश-हवास में वे कभी नहीं करेंगे।

एक व्यक्ति ऐसे स्थान पर गया जहाँ तीन कमरे थे। पहले कमरे में उसे शराब तथा अन्य नशीली वस्तुएं मिलीं। दूसरे में एक स्त्री थी और तीसरे में स्वर्ण-मुद्राएँ। उसने सोचा, ‘मैं सारी स्वर्ण-मुद्राएँ ले लूँ या दूसरे कमरे में जा कर स्त्री-गमन करूं या तीसरे कमरे में जा कर नशा करूँ।’ फिर सोचा, ‘स्वर्ण-मुद्राएँ लेता हूँ तो यह चोरी होगी। यह ठीक नहीं। स्त्री के पास जाता हूँ तो उसकी अवमानना करता हूँ, वो भी गलत बात है। मेरा विचार है कि मैं थोड़ा नशा कर लूँ तो किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा। यह चोरी या बलात्कार जैसा बुरा कर्म तो नहीं है।’ फिर वो शराब पीने लगा और पीता गया और शीघ्र ही होश खो बैठा। फिर उसने स्वर्ण-मुद्राएँ भी चुरा लीन और स्त्री के साथ बलात्कार भी किया। परिणामस्वरूप, उसने सारा जीवन जेल की कोठरी में बिताया। इस कथा से यह स्पष्ट हो जाता है कि शराब तथा ड्रग्स के सेवन से क्या होता है – हम विवेक-शक्ति खो बैठते हैं और बंधन में पड़ जाते हैं।

शराब के नशे में व्यक्ति मस्त तो हो जाता है परन्तु यह मस्ती समाज में हिंसा को बढ़ाती है। हत्या, लूटपाट तथा मारपीट – ये सब शराब-सेवन के परिणाम हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शराब का सेवन उन्हें और स्नेही बना देता है। ऐसा होता तो इतने पति शराब पी कर अपनी पत्नी तथा बच्चों की पिटाई क्यों करते? एक बात जान लो कि शराब के सेवन का कोई परिणाम अच्छा नहीं होता। इससे स्नेह नहीं, केवल क्रोध ही पैदा होता है। सब आदर्श नष्ट हो जाते हैं। हमें समाज में – अनिवार्यतः स्त्री और पुरुष दोनों के लिए – शराब के सेवन के विनाशकारी पहलुओं को उजागर करना चाहिए। क्योंकि एक माँ, बच्चे की प्रथम गुरु होती है, अतः स्त्रियों का मदिरापान करना तो अधिक विनाशकारी सिद्ध होगा।

अम्मा ने सुना है कि विदेश में किसी ने एक पुस्तक लिखी है जिसमें विभिन्न ड्रग्स के लाभों का वर्णन किया गया है। इसे पढ़ कर बहुत से लोग ड्रग्स के शिकार हो गए हैं। ऐसी पुस्तक का लिखा जाना ही गलत था। हमें अपने साथी भाई-बंधुओं को अच्छी राह पर चलने को प्रोत्साहित करना चाहिए। नशे में किया गया प्यार सच्चा प्यार नहीं होता – आप किसी भी मनोवैज्ञानिक से पूछ लें – वो यही कहेगा।

हम सबको शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन जैसी सामाजिक बुराईयों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने में अपनी भूमिका अवश्य निभानी चाहिए। हमारा युवा-वर्ग ड्रग्स तथा शराब-मुक्त रहे!