अमृत गंगा S3-05

अमृत गँगा, सीज़न ३ की पांचवी कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि हम सबका अपना-अपना दृष्टिकोण होता है! हम अपनी-अपनी मानसिकता के अनुसार देखते और आकलन करते हैं। कोई शिल्पी ही एक पत्थर में से सुन्दर मूर्ति गढ़ सकता है। कोई इसे भवन-निर्माण में इस्तेमाल कर सकता है तो कोई भले इससे चक्की बना ले! पर उसी पत्थर में शिल्पकार को मूरत के दर्शन होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अगर कहीं कुछ बदलने की ज़रूरत है तो वो है अपना दृष्टिकोण!

इस कड़ी में अम्मा की भारत यात्रा में आप देखेंगे मैंगलोर! साथ ही रसास्वादन कीजिये, ‘अम्बा भवानी जय जगदम्बे’

अमृत गंगा S3-04

अमृत गँगा, सीज़न ३ की ५वीं कड़ी में, अम्मा उस राजा की कहानी सुना रही हैं जिसका मंत्री और कवि, दोनों अधार्मिक और धोखेबाज़ थे, फिर भी उसके मन को श्रीराम से अपनी तुलना भाती थी। जब ऐसे लोगों की संगति हो तो उसका राज्य रामराज्य-तुल्य कैसे कहा जा सकता था? आदर्श राज्य पूजा-उपासना जैसा होता है, जहाँ राजा अपनी प्रजा के प्रति समर्पित होता है। आदर्श राज्य में दरिद्रता नहीं होती, प्रजा परिश्रमी होती है, और वे वही लेते हैं जो उन्होंने अर्जित किया हो।

इस कड़ी में अम्मा अपनी भारत यात्रा पर वडकरा में हैं। उत्तरी केरल की यात्रा कर रही अम्मा हिन्दी भजन गा रही हैं, ‘गोवर्धनधर गोकुल नंदन…’

अमृत गंगा S3-03

अमृत गँगा, सीज़न ३ की चौथी कड़ी में अम्मा बता रही हैं कि श्रीराम जैसे अवतार को भी सामान्य मनुष्य के स्तर पर उतरना पड़ता है ताकि हम उनसे प्रेरणा पा सकें। ईश्वर हमने यह दिखाने के लिए मनुष्य-देह धारण करता है कि कैसे मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की ओर जाएँ! मानव देह धारण कर, ईश्वर हमें यह सिखाते हैं कि कैसे जीवात्मा पूर्णत्व को प्राप्त हो सकता है!

उत्तरी केरल की यात्रा कर रही अम्मा हिन्दी भजन गा रही हैं, ‘किसकी खोज में..’

अमृत गंगा S3-02

अमृत गँगा सीज़न ३ की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है!

इस कड़ी में अम्मा बता रही हैं कि जब जीवन में विघ्न-बाधाएं आएं तो, हमें श्रीराम की तरह साहस सहित उनका सामना करना चाहिए। हमें निरुत्साहित हो कर भाग नहीं खड़े होना चाहिए। श्रीराम का पथ काँटों-कंकड़ों से भरा था किन्तु सब बाधाओं और कष्टों के बावजूद अंततः वो विजयी हुए! श्रीराम स्वीकृति-भाव के आदर्श हैं।

इस कड़ी में अम्मा जो भजन गा रही हैं, वो है,’मोर मुकुट वाले ‘

अमृत गंगा S3-01

अमृत गँगा सीज़न 3 में आपका स्वागत है!

इसकी पहली कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि अक्सर सत्ता लोगों के सर पर चढ़ कर बोलती है। वे मानो पगला से जाते हैं। लेकिन जब श्रीराम ने राज्य का भार भरत के कन्धों पर डाला तो भरत का मन ज़रा भी दूषित नहीं हुआ। चूँकि सत्ता भरत को छू तक नहीं पाई,इसीलिये वो बढ़िया राज्य कर पाए और प्रजा को शांतिपूर्ण जीवन दे पाए। अच्छा राजा वही है जो अपनी प्रजा की रक्षा कर सके।

‘हनुमत बल दो..’ – इस कड़ी में, अम्मा ने यह भजन गाया है!