अमृत गंगा 14

अमृत गंगा की चौदहवीं कड़ी में, अम्मा हमें अपने प्रत्येक वचन और कर्म के प्रति सचेत रहने की याद दिला रही हैं। शब्दों में अर्थ निहित होते हैं, अतः गलत शब्द चोट पहुँचाते हैं। हमारे जीवन में दुःख आते हैं, पूर्वकृत कर्मों के फलस्वरूप! हम पूर्वजन्मों से संचित कर्म ले कर आते हैं। जो अच्छे कर्मों का खाता ले कर आये हैं, वे सुख भोगेंगे और बुरे कर्म-संग्रह वाले दुःख पाएंगे। अतः, अम्मा हमें याद दिलाती हैं कि सत्कर्म करने का प्रयत्न करो।

इस कड़ी में, अम्मा की अमेरिका के सीएटल(वॉशिंगटन) यात्रा को दिखाया गया है। आप अम्मा का भगवान कृष्ण के विट्ठल रूप की स्तुति में, भावपूर्ण गाया भजन ‘विट्ठला हरि विट्ठला’ भी इस कड़ी में सुनेंगे।

अमृत गंगा 13

अमृत गंगा की तेरहवीं कड़ी में, अम्मा हमें निठल्ले न बैठने की याद दिला रही हैं। आलस्य हमारी दुर्वासनाओं को बढ़ाती है और व्यायाम की कमी से शरीर में पित्त और कफ़ में भी वृद्धि होती है। कर्म करते रहें तो स्वास्थ्य और उत्साह बने रहते हैं। अम्मा कहती हैं कि भले ही हम कोई बड़े काम न कर सकें, फिर भी छोटे-छोटे कर्म करके बड़ी उपलब्धि पा सकते हैं।

इस कड़ी में अम्मा का यू एस के सीएटल, वाशिंग्टन की यात्रा और उसके रास्ते में श्रीलंका में पहले पड़ाव को दर्शाया गया है। साथ ही उनका भावपूर्ण गाया हुआ कृष्ण-भजन, ‘रामकृष्ण गोविन्द नारायण हरि!’

अमृत गंगा 12

अमृत गंगा की बारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि प्रेम प्रत्येक वस्तु को नया, तरोताज़ा और अनोखा बना देता है। अम्मा प्रेम की वैश्विक भाषा बोलती हैं। वो कहती हैं कि दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का प्रकाश हमारे जीवन को ताज़गी, शक्ति और उत्साह से भर देता है। घंटों दर्शन देने के बाद भी अम्मा के चेहरे पर मधुर मुस्कान बिखरी रहती है.. थकान का नामोनिशां तक नहीं होता। ‘प्रेम एवं करुणा से उत्पन्न करुणा-भाव’ का, अम्मा जीता-जागता उदाहरण हैं, जैसा कि संत कवि कबीर भी कहते थे! ..वो इस उक्ति को जीवंत करती हैं, “जहाँ प्रेम है वहां थकान नहीं होती!”

इस कड़ी में प्रस्तुत है, अम्मा की डब्लिन, आयरलैंड की यात्रा और उनका प्रगाढ़ भक्तिभाव सहित गाया हुआ गणेश-भजन, करींद्र वदना रवीन्दु नयना…

अमृत गंगा 11

अमृत गंगा की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि अनुभव सच्चा गुरु है। यदि हम अनुभवी लोगों के पदचिन्हों पर चलें तो हम एक ही जीवनकाल में वो पा सकते हैं, जिसे पाने में सामान्यतः सैंकड़ों जन्म लग जाते हैं। प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है और आध्यात्मिक क्षेत्र में यह अनुकूलता है – सद्गुरु का सान्निध्य! सद्गुरु हमें हमारी यात्रा पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं।

इस कड़ी में आगे चल कर, अम्मा की लन्दन-यात्रा और उनका भावपूर्वक गाया हुआ भजन, ललिता ललिता श्रीललिता…प्रस्तुत है।

अमृत गंगा 10

अमृत गंगा की दसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि अपने में परिवर्तन लाने के लिए, हमें राह नहीं देखनी कि पहले दूसरे बदलें। बल्कि, पहले हम बदलें और दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनें। हमारा प्रत्येक सत्कर्म, प्रत्येक सुविचार कई गुणा फल देगा। जब हमारे हृदय में अरुणोदय होगा तो उसका प्रकाश सबको स्पष्ट दिखाई देगा।

इस कड़ी में अम्मा की मिलान(इटली) की यात्रा व कन्नड़ भाषा में उनका गाया हुआ भावपूर्ण भजन, जय जय रामा .. प्रस्तुत है।