श्री माता अमृतानन्दमयी देवी(अम्मा), सारे विश्व में अपने निःस्वार्थ प्रेम और करुणा के लिये जानी जाती हैं। उन्होंने अपना जीवन गरीबों तथा पीड़ितों की सेवा व जन साधारण के आध्यात्मिक उद्धार के लिये समर्पित कर दिया है। अपने निःस्वार्थ प्रेमपूर्ण आश्लेष से, गहन आध्यात्मिक सारसिक्त वचनों से तथा संसार में व्याप्त अपनी सेवा संस्थाओं के माध्यम से अम्मा मानव का उत्थान कर रही हैं, उन्हें प्रेरणा दे रही हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला रही हैं।

अम्मा का जन्म 1953 में केरल प्रदेश के एक छोटे से ग्राम में, एक साधारण मछुआरे परिवार में हुआ। उनके छुटपन में भी उनका समुद्र के किनारे बैठकर गहन ध्यान में डूब जाना लोगों का ध्यान आकर्षित करता था। बचपन में ही वे भक्ति गीत लिखने और उन्हें भावपूर्वक गाने लगी थीं। उन गीतों में भी उनकी गहरी समझ झलकती है।

अम्मा जब नौ वर्ष की थीं, उनकी माताजी बीमार रहने लगीं। तब घर के कामकाज और सात भाई बहनों की देखभाल के लिये अम्मा को स्कूल से हटा लिया गया। अम्मा घर की गायों के लिये चारा तथा अन्य आहार लेने जब गाँव के घरों में जाती थीं तब अम्मा उनकी घोर गरीबी एवं पीड़ा देखकर व्याकुल हो जाती और अपने जन्मजात करुणामय स्वभाव के अनुसार अम्मा उनकी यथासंभव सहायता करती थीं।

वे उन असहाय गरीब वृद्धों को अपने घर भी लातीं तथा उन्हें नहलातीं। उन्हें भोजन करातीं तथा वस्त्र देतीं। अम्मा का परिवार इतना संपन्न तो था नहीं, अतः इस सहानुभूति के लिये अम्मा को डाँट पड़ती और मार भी खानी पड़ती। परंतु इसके बावजूद अम्मा ने गरीबों की सहायता जारी रखी।

बचपन से ही अम्मा, दुखी लोगों को गले लगाती थीं। एक 14 वर्षीय लड़की को तो पुरुषों को स्पर्श करना भी मना था, परंतु अम्मा अपने हृदय की बात सुनती रहीं। अम्मा ने बाद में स्पष्ट किया- “मैं स्त्री-पुरुष का भेद नहीं देखती थी। मैं किसी को भी अपने से अलग नहीं देखती थी। सारी प्रकृति के लिये मेरे हृदय में प्रेम उमड़ता रहता था। यह मेरा स्वभाव था। जैसे एक डॉक्टर का कर्तव्य है कि वह रोगी का इलाज करे, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, वैसे ही दुखियों को सांत्वना देना मेरा धर्म है।”

अम्मा स्वयं महात्मा होने का कोई दावा नहीं करतीं। वे कहती हैं – “मैं बहुत पहले से अपना जीवन संसार की सेवा में अर्पित कर चुकी हूँ। जब तुम्हारा जीवन ही अर्पित हो चुका तब फिर भला तुम कोई दावा कैसे कर सकते हो? ”

जब लोगों ने अम्मा से भक्तों द्वारा उनकी ही पूजा करने के विषय पर प्रश्न किया
तो अम्मा ने कहा- “वास्तव में मैं सब की पूजा करती हूँ। मुझे ऐसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है जो ऊपर आसमान में कहीं सिंहासन पर विराजमान हैं। सभी प्राणी मेरे ईश्वर हैं। उनसे प्रेम करना व उनकी सेवा करना ही मेरी पूजा है।”

Being one with the other

सनातन धर्म में निर्गुण निराकार ब्रह्म को आधार माना जाता है। इसे समझाने के लिये अम्मा कहती हैं कि सोने के सब आभूषण अलग-अलग रूप-आकार के दिखते हैं पर मूल रूप में सभी सोना हैं। इसी प्रकार एक ही परब्रह्म विभिन्न नामरूपों में जगत बनकर भासित हो रहा है। जब किसी को इस सत्य का ज्ञान हो जाता है तब वह परमज्ञान, उसके विचारों और व्यवहार में निःस्वार्थ प्रेम एवं करुणा के रूप में प्रकट होता है।

हर वर्ष अधिकाधिक लोग अम्मा के दर्शन के लिये खिंचे चले आते हैं। 1987 में पश्चिमी भक्तों के आमंत्रण पर अम्मा पहली बार विदेश गई थीं। अब अम्मा भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान, श्रीलंका, सिंगापुर, मलेशिया, कॅनाडा, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका भी जाती हैं।

अम्मा ने एक विशाल सेवा संस्था की स्थापना की है जो बिना किसी भेदभाव के मानव मात्र की सेवा में समर्पित है। इस संस्था ने 1998 से अब तक करीब 230 करोड़ रुपये की निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई हैं; बेसहारा लोगों के लिये 40,000 मकान निःशुल्क प्रदान किये हैं तथा वर्तमान में करीब 1,00,000 निराधार गरीबों को आर्थिक सहायता दे रही है। महाराष्ट्र में विदर्भ, आन्ध्र प्रदेश, तमिल नाडु और केरल में गरीब किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती संख्या को देखते हुए उसके प्रतिरोध के लिए अम्मा ने एक बृहद्‌ योजना को रूप दिया – जिसके अंतर्गत अम्मा 1,00,000 पीड़ित गरीब बच्चों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान करेंगी। आश्रम अनाथालय, वृद्धाश्रम, स्कूल व कॉलेज, पर्यावरण संरक्षण योजना, रोज़गार प्रशिक्षण, साक्षरता अभियान इत्यादि, के अलावा तकनीकी अनुसंधान कार्यक्रमों में भी संलग्न है।

दिसंबर 2004 में दक्षिण भारत में आयी सुनामी आपदा के बाद अम्मा ने 6 माह के अंदर ही केरल, तमिल नाडु, अंडमान एवं श्रीलंका के पीड़तों को सुनामी-भूकंप निरोधी मकान बनाकर प्रदान किये थे। गुजरात, कश्मीर, बंगाल, बिहार, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र के अलावा अमेरिका में भी राहत कार्य किये हैं।

अक्तूबर 2009 में कर्णाटक एवं आंध्रप्रदेश में आये भीषण जल प्रकोप से हज़ारों लोग विस्थापित हुए थे। इस प्राकृतिक आपदा के समय अम्मा के आश्रम की ओर से बाढ़पीड़तों के लिये वैद्यकीय सेवा एवं अन्य सेवाएँ प्रदान की गयी। तत्पश्चात् अम्मा ने बाढ़पीड़तों के लिये 50 करोड़ की सहायता राशि की घोषणा की एवं एक साल के अंदर ही कर्णाटक में रायचूर जिले में 350 मकान बनाकर लाभभोक्ताओं को प्रदान किये गये। इस प्रकार जल्द ही 3 गावों का संपूर्ण निर्माण किया जायेगा।

अम्मा अंतराष्ट्रीय स्तर पर जानी जाती हैं। वे संयुक्त राष्ट्रसंघ में कई बार तथा विश्व धर्म संसद में दो बार भाषण दे चुकी हैं। जेनेवा में उन्हें गांधी-किंग पुरस्कार से राष्ट्रसंघ द्वारा सम्मानित किया गया तथा न्यूयार्क में जेम्स पार्क मॉर्टन इंटरफेथ पुरस्कार से।

केरल में अम्मा का जन्म स्थान विश्वव्यापी सेवा संस्थाओं का मुख्यालय बन गया है। आश्रम में करीब 3000 भक्त रहते हैं। वे अम्मा की शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, ध्यान करते हैं और सेवा कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

अम्मा अब तक करीब तीन करोड़ लोगों को गले लगाकर सांत्वना दे चुकी हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि इतना सब करने के लिये आपको ऊर्जा कहाँ से मिलती है? तो वे उत्तर देती हैं – “ जहाँ सच्चा प्रेम है, वहाँ सब कुछ अनायास ही हो जाता है।”