अमृत गंगा 30

अमृत गंगा की तीसवीं कड़ी… अम्मा यहाँ बता रही हैं कि मन विचित्र है! हम पुरानी चीज़ों से ऊब कर, नई खोजते रहते हैं। यहाँ तक कि अपने सम्बन्धों से भी ऊब जाते हैं। बस…नहीं ऊबते तो अपने विचारों से! कई लोगों को तो अपने बचपन की फ़िज़ूल की चीज़ें तक याद रहती हैं। दूसरों ने उनसे क्या कहा,उनके साथ क्या किया..वे इससे आगे बढ़ ही नहीं पाते। लेकिन ऐसा कोई नहीं, जिससे कभी कोई गलती न हुई हो। अम्मा कहती हैं, हम सब से गलतियां होती हैं, इसलिए हमें भुलाना और क्षमा करना आना चाहिए।

इस कड़ी में, अम्मा की मेलबॉर्न, ऑस्ट्रेलिया की यात्रा जारी है। अम्मा भजन भी गा रही हैं..मुरली मनोहर माधवा…

अमृत गंगा 29

अमृत गंगा की उनतीसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि हम उन समस्याओं से चिपके रहते हैं, जिनका अस्तित्व है ही नहीं और फिर शिकायत करते हैं कि हमसे यह बोझ ढोया नहीं जाता। बोझा उठाने से पहले ही हम शिकायत करने लगते हैं कि बड़ा भारी है! चिंता करने की कोई बात न हो, तब भी हम सोचते रहते हैं..कुछ बुरा होने वाला है। पति को घर आने में देरी हो जाये तो पत्नी चिंता करने लगती है। सोचती है, कहीं एक्सीडेंट न हो गया हो, कहीं हार्ट अटैक तो नहीं हो गया या किसी और बड़ी मुसीबत में तो नहीं पड़ गए! यही सोच-सोच कर वो tension में आ जाती है। इस प्रकार, भय हमें कमज़ोर बना कर मानसिक समस्याएं खड़े कर देता है।

इस कड़ी में, हम अम्मा की मेलबॉर्न, ऑस्ट्रेलिया की यात्रा देखेंगे और अंत में, अम्मा गा रही हैं एक मधुर, मनोहर भजन.. शेर पे सवार..

अमृत गंगा 28

अमृत गंगा की प्रस्तुत अट्ठाईसवीं कड़ी में, हम अम्मा के शब्दों में ही अम्मा की, एक महान व्यक्ति की परिभाषा को देखें तो वो कुछ इस तरह है कि जो व्यक्ति अपने विचारों, वचनों और कर्मों के माध्यम से दूसरे कितने लोगों के जीवन पर गहरी और सुन्दर छाप छोड़ पाया है। अपने प्रेम और करुणा जैसी सुन्दर भावनाओं से, उसने कितनों के जीवन को खूबसूरत बनाया है! यही गुण हमारा सारतत्त्व हैं। लेकिन हमने अपने सत्स्वरूप को स्वार्थ से ढक रखा है। हम वस्तुओं के दास बन कर रह गए हैं..हमारी प्राथमिकताएं उलट गई हैं।

इस कड़ी में, हम अम्मा की, सिडनी..ऑस्ट्रेलिया की यात्रा और साथ ही अम्मा के गाये भजन, ‘भाव फुलांची..’ का आनन्द लेंगे।

अमृत गंगा 27

अमृत गंगा की सत्ताईसवीं कड़ी में, अम्मा फिर से तनाव और चिंता की बात कर रही हैं। अम्मा कह रही हैं कि चिंता एक चोर जैसी है जो हमारा समय और विश्वास..दोनों चुरा लेती है। चिंता का कोई कारण न भी हो तो हम सोचते हैं कि कुछ बुरा हो जायेगा। पीछे मुड़ कर देखने पर हमें एहसास हो जाता है कि हम यूँ ही चिंता किये जा रहे थे। ऐसी कई चीज़ों की हमने कल्पना की थी, जो कभी नहीं हुईं। कुछ बुरा हो भी जाये तो चिंता से तो किसी समस्या का समाधान नहीं होता। इससे कुछ होने वाला नहीं। इससे देह और मन दोनों कमज़ोर हो जायेंगे। यह उस वायरस जैसी है जो हम उन सबको फ़ैला देते हैं, जिन-जिनके सम्पर्क में आते हैं। हमें अपनी समस्याओं के मूल कारण को ढूंढना होगा। वर्ना, विचार हमें आमरण सतायेंगे।

इस कड़ी में, हम अम्मा की जापान-यात्रा का दर्शन करेंगे और अम्मा के गाये भजन.. हरि नारायण..को सुन कर धन्य होंगे।

अमृत गंगा 26

अमृत गंगा की छब्बीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि उपदेश पाने के बाद भी, हम उस पर ध्यान नहीं देते। हम नाहक ही मुसीबतें खड़ी करके, उनमें फंस जाते हैं। तनाव और चिंता मुफ़्त मिलते हैं इसलिए हम उन्हें जी भर ले लेते हैं। इसके फलस्वरूप कई बीमारियाँ हो सकती हैं, लेकिन हम उस कीमत के प्रति जागरूक नहीं रहते। इस तरह, हमारा जीवन बर्बाद हो सकता है। कोई भी समस्याओं से मुक्त नहीं है। आध्यात्मिकता हमें ऐसी परिस्थितियों से निपटने या स्वीकार करने योग्य उचित मनोभाव विकसित करने में सहायता करती है।

इस कड़ी में, अम्मा की कैनेडा के टोरोंटो की यात्रा जारी है और साथ ही अम्मा का गाया भजन सुनिए…जिनकी करुणा है अपार..!