कल्पना करो कि हम जन-समूह में हैं और एक पत्थर आ कर लगता है और हमें चोट लग जाती है। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम मारने वाले को पकड़ने की बजाय पहले अपने घाव पर ध्यान दें, उसकी मरहम-पट्टी करें। किन्तु यदि हम मारने वाले के पीछे दौड़ेंगे तो अपने घाव को धूल तथा जीवाणुओं के लिए खुला छोड़ देंगे, जिससे उसे भरने में बहुत समय लग जायेगा। इसके अतिरिक्त, हम किसी को पकड़ कर गाली-गलौज कर लें, पिटाई कर डालें और बाद में मालूम हो कि हमने तो किसी गलत व्यक्ति की धुलाई कर दी तो? ऐसा भी तो सम्भव है कि पत्थर हमें दुर्घटनावश आ लगा। और यदि हमारी पकड़ में सही व्यक्ति भी आ गया तो उसकी पिटाई करने से हमारा घाव तो भर नहीं जायेगा या पीड़ा दूर नहीं होगी। क्रोध की स्थिति भी घाव जैसी ही होती है। हमारी अविलम्ब प्रतिक्रिया होनी चाहिए कि हम इसे शाँत करें, अतः उस समय हमें साक्षी-भाव से रहना चाहिए। यदि हम नकारात्मक विचारों से तादात्म्य कर लें और उनमें फंस कर रह जाएँ तो हम शीघ्र ही उन्हें वचन तथा कर्म में परिणत होते पाएंगे, जोकि आगे चल कर दुखदायी ही होने वाला है। हमने क्रोध के सामने घुटने टेक दिए तो शीघ्र ही जान जायेंगे कि यह हमारे लिए कहीं अधिक हानिकर है बजाय उस व्यक्ति के जो इसका कारण है।

अम्मा को यहाँ एक बस-कंडक्टर की कथा याद आती है। एक दिन उसे अपने एक स्टॉप पर एक हट्टा-कट्टा, सात-फुट लम्बा नया व्यक्ति दिखाई दिया। वो बस पर चढ़ा और एक सीट पर बैठ गया। जब कंडक्टर ने किराया माँगा तो उसने उत्तर में कहा कि, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। दुबले से कंडक्टर ने गौर से उसे देखा और ड़र के मारे दोबारा नहीं माँगा। वो कोई गैंग-लीडर जान पड़ता था, अतः बिना कुछ और बोले कंडक्टर वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया। अगले दिन भी यही घटनाक्रम रहा। वो व्यक्ति उसी बस-स्टॉप से चढ़ा और टिकिट खरीदने के लिए उसका वही उत्तर था कि, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। भीतर ही भीतर कंडक्टर क्रोध से उबल रहा था। वह उस गुंडे को सबक सिखाना चाहता था! उसे अब कुछ और सूझता ही न था। उसकी मनःशान्ति कहीं खो गई थी। और वो व्यक्ति प्रतिदिन बस पर चढ़ता, बिना टिकिट सफ़र करता और उतर जाता और कंडक्टर महाशय का क्रोध प्रतिदिन सातवाँ आसमान छूता। उसका मन इतना अशांत था कि वह अपने पत्नी-बच्चों के साथ भी बात नहीं कर पाया। आखिर उसने सोचा कि बहुत हो गया, अब कुछ करना ही पड़ेगा। परन्तु समस्या थी कि वह स्वयं तो इतना छोटा, दुर्बल सा था। अतः उसने एक कराटे-टीचर से सहायता लेने का निर्णय किया। अब उसके जीवन का केंद्र-बिंदु कराटे बन गया, जिसमें निपुणता पाने के लिए वह छुट्टी पर भी रहने लगा। वो कराटे तथा मार्शल-आर्ट्स सीखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता था। सब सीखने के पश्चात् जब वह काम पर वापस लौटा तो विश्वस्त हो गया कि अब वह सात-फुटे बदमाश से निपट सकता है। पहले ही दिन वो भारी-भरकम व्यक्ति स्टॉप पर मिल गया। हमेशा की तरह, आज भी कंडक्टर टिकिट देने लगा तो चिर-परिचित उत्तर सुनाई दिया, ‘‘केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं’’। ‘‘परन्तु आज…’’ कंडक्टर ने आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, ‘‘नहीं, यह सब नहीं चलेगा! टिकिट तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा। तुम नहीं लोगे तो बस यहाँ से एक इंच भी आगे नहीं चलेगी!’’

इस पर सात-फुटे ने कहा, ‘‘क्षमा चाहता हूँ, केशव को टिकिट की ज़रुरत नहीं है। मेरे पास फ्री-पास है’’। और उसने जेब से फ्री-पास निकाला और परिवहन-विभाग के एक उच्च-अधिकारी के रूप में अपना परिचय दिया, जिस पद पर यात्रा हेतु फ्री-पास का विशेषाधिकार दिया जाता है।

तो यहाँ किसकी हार हुई? कंडक्टर ने कितने दिन गँवा दिए? उसने कराटे सीखने के लिए, व्यर्थ ही कितना समय तथा धन बर्बाद किया? कितना तनाव-ग्रस्त रहा? और फिर, घर की शान्ति भी नष्ट हुई। इस सब में उसे क्या मिला? कुछ भी तो नहीं!

क्रोध में ऐसा ही होता है। आदमी खोता ही है, प्राप्त कुछ नहीं होता। हमें यह सदा याद रखना चाहिए। जब क्रोध आने लगे तो उसे दबाना नहीं, अन्यथा आखिर एक दिन फट पड़ेगा। परन्तु तत्काल प्रतिक्रिया से भी बचें। जितना हो सके, मन को शाँत करने का, मौन करने का प्रयास करें। फिर बुद्धिमत्ता सहित स्थिति को आँकें। यदि हम ऐसा कर सकें तो जीवन में क्रोध से उत्पन्न होने वाली कितनी ही विपदाओं से बच सकते हैं!

जब हम किसी से प्रश्न करते हैं कि जीवन कैसा चल रहा है तो केवल दुःख भरी कथाएं ही सुनने को मिलती हैं। इसका कारण क्या है? बिना सोची-समझी आसक्ति ही हमारे जीवन में दुःख को निमंत्रित करती है। हमें इससे कुछ सार्थक भी प्राप्त होता है? अपने परिवार के सदस्यों के प्रति हमारी अनवरत चिंता, किसी प्रकार से उन्हें या हमें लाभ पहुँचाती है? वस्तुतः, समय की बर्बादी के सिवा इससे कुछ और प्राप्त नहीं होता।

वास्तव में, हम सदा अकेले ही हैं, सबके बीच रह कर भी अकेले हैं, फिर जब अकेले होते हैं तब तो अकेले होते ही हैं। कभी ऐसा भी होता है जब ऐसा न हो? नहीं, फिर भी हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। आज हमारा जीवन दूसरों की एक मुस्कान पर आश्रित है! कोई हमारी ओर देखे, मुस्काए तो हम प्रसन्न, अन्यथा निराश हो जाते हैं। इससे हममें या तो आत्महत्या करने की अथवा दूसरे की हत्या कर देने की इच्छा होने लगती है। कितने ही लोगों का सम्पूर्ण जीवन उन अनेकों अत्याचारों, अन्यायों का बदला लेने के लिए समर्पित होता है – जो उन्हें लगता है उनके साथ हुए हैं। इस प्रकार, हम कभी स्वयं हो कर नहीं रहते और अपने जीवन के लक्ष्य से चूक जाते हैं। एक क्षण के लिए भी अपने साथ नहीं रहते। अतः, हमें चाहिए कि अपने कर्मों में सजग हों, जागृत हो कर रहें। इसका सरलतम उपाय है ध्यान।

बच्चो, सदा याद रखो कि ध्यान स्वर्ण-समान अनमोल है। यह सांसारिक समृद्धि, मुक्ति तथा मनःशान्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। कहते हैं कि, ध्यान, जप से दस लाख गुणा बढ़ कर है। अर्थात् ध्यान में लगाया गया थोड़ा सा समय लाखों की संख्या में किये मन्त्र-जप के समान होता है।

आँखें मूँद कर, फ़र्श पर आलती-पलती लगा कर बैठ जाने का नाम ही ध्यान नहीं होता। अपने कर्मों, विचारों तथा वचनों में सजगता विकसित करना ही सच्चा ध्यान है।

विचार पानी की छोटी-छोटी बूंदों के समान हैं, एकत्रित हो जाएँ तो वचनों तथा कर्मों की विशाल नदी बन जाएँ। एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पनप कर, एक विशाल नदी बन कर बाहर बह निकलता है और फिर हमारे वश से बाहर हो जाता है। प्रारम्भ होती हुई एक नदी को रोक देना कठिन नहीं है, एक ईंट भी इसके प्रवाह को मोड़ देने के लिए पर्याप्त है। किन्तु बड़ी होने पर यह हमारे वश की बात नहीं रहती। अतः मेरे बच्चो, हमें अपने विचारों के प्रति बहुत सजग रहना चाहिए। क्योंकि विचार वचन का रूप लेते हैं और फिर वचन कर्म का। फिर इसके प्रवाह की दिशा में परिवर्तन अत्यन्त कठिन हो जाता है। इसीलिये अम्मा कहती है कि मेरे बच्चों को अपने विचारों, वचन तथा कर्म को ले कर अति सजग रहना चाहिए।

यदि सांचा ही बिगड़ जाए तो उसमें डाला गया कोई भी पदार्थ ठीक नहीं बनेगा। उसी प्रकार, यदि हम अपने मन का निर्देशन भलीभांति नहीं करते तो इसमें से जो भी आएगा-विचार अथवा वचन-अनुचित होगा। अतः, सर्वप्रथम अपने मन को संयमित करो और उसका एकमात्र उपाय ध्यान है। ध्यान के माध्यम से हमारा अपने भीतरी मौन से आमना-सामना होता है। बच्चो, इसका अभ्यास अवश्य करना। अम्मा कहती है, ध्यान जीवन का महत्पूर्ण भाग है। इससे हमारे मन-वचन तथा कर्म में पावित्र्य आता है। भौतिक समृद्धि पीछे-पीछे पने-आप आ जाती है।

प्रतिदिन थोड़ा सा समय ध्यान के लिया अवश्य रखना चाहिए। इससे मेरे बच्चों को मनः शान्ति तथा परमात्म-कृपा- दोनों की प्राप्ति होगी। बच्चो, स्मरण रहे कि ध्यान से सम्पूर्ण विश्व को लाभ होता है।

एक बार एक व्यक्ति बहुत समय से बेरोजगार था। फिर एक दिन, उसे एक नौकरी के लिए इंटरव्यू हेतु बुलाया गया। अन्त में, उसे यह नौकरी नहीं मिली। हताश-निराश हो कर वह एकान्त-स्थान पर बैठ कर, अपनी ठुड्डी को हथेलियों पर टिकाये सोच में डूब गया। तभी किसी ने उसका कन्धा थपथपाया। पलट कर देखा तो उसने धूप का चश्मा पहने, एक बच्चे को देखा। यद्यपि वह इस एकान्त के भंग होने पर झल्लाया, परन्तु छिपा गया। उसने इतना ही पूछा कि क्या बात है? बच्चे ने उसे एक मुरझाया हुआ फूल देते हुए कहा, ‘इस सुन्दर फूल को देखो।’

अब उसे थोड़ा और क्रोध आया परन्तु इस बार भी उसने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं किया। इतना ही कहा, ‘हाँ, सुन्दर है’।
बच्चे ने कहा, ‘यह सिर्फ देखने में ही सुन्दर नहीं, इसकी सुगंध भी बहुत अच्छी है’।

अब तो इस व्यक्ति को सचमुच क्रोध आ गया। उसने सोचा, यह बच्चा पागल तो नहीं? इस बासी फूल को ले कर यह क्यों मेरे पीछे पड़ा है? उसने तंग आ कर कहा, ‘हाँ, तुम ठीक कहते हो। यह सुन्दर व सुगन्धित फूल है’।

बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मैं इसे आप ही के लिए लाया हूँ। ले लीजिये। परमात्मा आप पर कृपा करें!’

अब इस व्यक्ति को थोड़ा बेहतर लगा, शान्ति का अनुभव हुआ। बच्चे का धन्यवाद करके वह क्षितिज में ताकने लगा। तभी उसने धरती पर कुछ थपथपाहट होती महसूस की। मुड़ कर देखा तो वही बच्चा एक छड़ी ले कर खड़ा था। अचानक उसे बोध हुआ कि बच्चा अँधा है। उस क्षण उसे अनुभव हुआ कि उसने हाथ में जो फूल पकड़ा था, वो वास्तव में विश्व का सबसे सुन्दर और सुगन्धमय फूल था। वह बच्चे के पीछे दौड़ा और जा कर उसे गले से लगा लिया। अश्रुपात करते हुए वह बोला, ‘यह कोई सामान्य फूल नहीं। यह वो फूल है जो तुम्हारे हृदय में खिला है’। अब जिस सौन्दर्य व निर्मलता पर इस व्यक्ति की दृष्टि पड़ी थी, वो उस बच्चे की थी जो फूल में प्रतिबिम्बित हो रही थी।

वो व्यक्ति अभिभूत हो गया था। नौकरी न मिलने के कारण वो इतना निराश, हताश था कि उसके मन में जीवन का अन्त करने का विचार भी आया। और यहाँ यह बच्चा दोनों आँखें खो कर भी, न केवल खुश था अपितु दूसरों में भी खुशी बाँट रहा था।

जब हम दूसरों के साथ परमात्मा की कृपा की बात करें तो हममें योग्यता होनी चाहिए कि उनके भीतर ऐसी भावनाओं को जगा सकें। दूसरों की समस्याओं की तुलना में हमारी समस्याएं, प्रायः तुच्छ होती हैं, अतः हमें अपने वर्तमान को स्वीकारते हुए खुशी-खुशी जीवन बिताना चाहिए। वास्तव में, देखा जाए तो हमारे विचार ही तो हमारी खुशी की राह में बाधा बन कर रोड़ा अटकाते हैं, हमें स्वयं को भुला कर दूसरों के सहायक होने से रोकते हैं। प्रत्येक वस्तु पर अपनी सत्ता जमाने की इच्छा द्वारा हम इतने अभिभूत हुए रहते हैं कि – यह/वो मेरे पास होना ही चाहिए! जब तक मन ऐसी वासनाओं से भरा है तब तक खुशी क्या है – हम जान भी नहीं पाएंगे। ह्रदय में प्रेम हो तो एक अँधा व्यक्ति भी नेता हो सकता है, परन्तु जिसका हृदय ही अँधा हो चुका हो, उसे राह दिखलाना बहुत कठिन कार्य है। अहंकार का अंधत्व, मानो हमें एक तहखाने में कैद कर देता है। अज्ञान वश हम जागते हुए भी सोये हैं। इस अहंकार पर विजय पा लें तो हम स्वाभाविक ही विश्व के लिए अर्पित हो जायेंगे। जिनकी दृष्टि में अहंकार का मोतियाबिंद का रोग हो गया है, उनके लिए इस विश्व के सौन्दर्य के दर्शन करना असम्भव है।

विभिन्न परिवारों में जन्मे लोगों के विभिन्न अनुभव होते हैं किन्तु मृत्यु एक ऐसा अनुभव है जिसका अनुभव सबको होता है। फिर भी अम्मा को एक बात कहनी है – जिस व्यक्ति ने अहम् पर विजय पा ली, उसने मानो मृत्यु पर भी विजय पा ली। जब तक जगत् है तब तक ऐसा व्यक्ति अपने कर्मों के कारण स्मरणीय रहेगा। जिन्होंने अहम् को जीत लिया, जिनके हृदय प्रेम के रस से लबालब भरे हैं, उनका सम्पूर्ण जीवन विश्व-हिताय समर्पित होता है। उनके दुनियाँ से चले जाने के बाद बहुत काल तक उनके कर्मों को याद किया जायेगा। प्रत्येक कदम पर हमें इस सत्य के प्रति सजग रहना है।

बच्चो, हम सदा से सुनते आ रहे हैं कि स्त्री निर्बल है। इसका क्या महत्व है? दूसरी जो बात हम प्राचीन काल से सुनते आ रहे हैं वो यह – क्योंकि स्त्री निर्बल है, अतः उसे सदा एक रक्षक की ज़रुरत होती है। सदियों से समाज ने रक्षक की यह भूमिका पुरुष को सौंपी है। फिर भी, हर युग में ऐसी साहसी स्त्रियाँ रही हैं जो स्वयं पर थोपे गए पिंजरों को तोड़ कर बाहर आईं और क्रान्ति का प्रारम्भ हुआ। रानी पद्मिनी, हाथी रानी, मीराबाई तथा झांसी की रानी – इनमें से कोई भी स्त्री निर्बल नहीं थी। वे तो वीरता, साहस तथा पावित्र्य की मूर्ति थीं। स्त्रीत्व के ऐसे ही रत्न अन्य देशों में भी हुए हैं; जैसे फ्लोरेंस नाइटिंगेल, जोन-ऑफ़-आर्क तथा हैरियट टबमैन।


वास्तव में, पुरुषों को चाहिए कि वो स्वयं को न तो स्त्री के रक्षक के स्थान पर रखे और न ही ताड़क बने। पुरुष को स्त्री के साथ मिल-जुल कर रहना चाहिए तथा स्त्री को समाज की मुख्यधारा में नेतृत्व की भूमिका हेतु उदारता तथा तत्परता सहित आने देना चाहिए।
बहुत से लोग प्रश्न करते हैं कि आखिर यह पुरुष का अहम् आया कहाँ से? वेदान्त के अनुसार मूल कारण ‘माया’ हो सकता है परन्तु एक और उद्गम भी हो सकता है। प्राचीन काल में, मानव वनों, गुफाओं अथवा पेड़ों पर घर बना कर रहता था। क्योंकि शारीरिक रूप से पुरुष स्त्री की बजाय अधिक बलवान होता है, अतः शिकार करने तथा वन्य-जीव-जंतुओं से परिवार की रक्षा करना उसका दायित्व होता था। स्त्रियाँ घर पर रह कर घर का काम-काज व बच्चों का दायित्व संभालती थी। क्योंकि पुरुष भोजन तथा वस्त्र हेतु जानवरों की खाल घर ले कर आता था, संभवतः इसलिए उसने यह सोच लिया कि स्त्री उस पर आजीविका के लिए आश्रित है, वो स्वामी एवं स्त्री दासी है। इस प्रकार, स्त्री ने भी पुरुष को रक्षक का स्थान दे दिया होगा। कदाचित यहाँ से अहम् की निर्मिती हुई।
स्त्री निर्बल नहीं है और ऐसा सोचना भी उचित नहीं है परन्तु उसमें स्वाभाविक रूप से जो करुणा, सहानुभूति है, उसका प्रायः गलत अर्थ लगाया जाता है – निर्बलता। यदि स्त्री अपनी शक्ति को खींच कर भीतर संजो ले तो कदाचित पुरुष से भी बढ़ कर हो सकती है। पुरुष वर्ग को चाहिए कि स्त्री की उसकी गुप्त शक्ति के बोध एवं स्वीकृति में सच्ची सहायता करे। यदि हम उस भीतरी शक्ति के साथ स्वयं को मिला दें तो यह विश्व स्वर्ग बन जाए। कहना आवश्यक नहीं कि प्रेम एवं करुणा जीवन के आवश्यक अंग बन जायेंगे।


अम्मा ने एक अफ्रीकन देश में युद्ध के विषय में एक घटना सुनी थी। इस युद्ध में असंख्य पुरुष मारे गए। यद्यपि स्त्रियों की 70% जनसँख्या थी, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे एकजुट हुईं। वैयक्तिक अथवा सामूहिक रूप से छोटे-मोटे व्यापार में लग गईं। वे अपने बच्चों तथा अनाथ बच्चों का भी लालन-पालन करने लगीं। शीघ्र ही स्त्रियों ने स्वयं को अद्भुत रूप से सशक्त पाया तथा उनकी स्थिति में मौलिक सुधार आया। इससे सिद्ध होता है कि चाहें तो स्त्रियाँ अपनी विनाश की स्थिति से ऊपर उठ कर एक गम्भीर शक्ति के रूप में उभर सकती हैं।

ऐसी ही घटनाओं के कारण, लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि, “यदि कोई स्त्री राज्य करे तो अनेकों दंगों तथा युद्धों से बचा जा सकता है। आख़िरकार, एक स्त्री बहुत सोच-समझ कर ही अपने बच्चों को मरने-मारने के लिए युद्ध के मैदान में उतारेगी। एक माँ ही बच्चा खोने वाली दूसरी माँ की पीड़ा समझ सकती है। “
यदि स्त्रियाँ एकजुट हो कर साथ खडी हो जाएँ तो समाज में बहुत से वांछित परिवर्तन ला सकती हैं। किन्तु पुरुष को भी उन्हें इस ओर प्रोत्साहित करना होगा। अम्मा का कहना है कि समाज तथा आगामी पीढ़ियों को विपदा से बचाने के लिए, स्त्रियों तथा पुरुषों को मिल कर आगे आना होगा। इससे समाज एवं विश्व का उत्थान होगा। हम सबको इस लक्ष्य की ओर करबद्ध होना होगा।

अर्जुन एवं कृष्ण गाढ़ मित्रों की भाँति साथ-साथ खेलते-कूदते बड़े हुए। उस समय भगवान् गीतोपदेश नहीं देते थे। परन्तु कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन पूर्णतः उद्विग्न हो गया और उसके भीतर का शिष्य जाग उठा, तब अर्जुन ने अपने सारथी-सखा कृष्ण को गुरु रूप में स्वीकार किया। अर्जुन के भीतर शिष्यत्व के जागने पर ही कृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया। इसमें हम सबके लिए एक शिक्षा छिपी है। हमें अपने भीतर एक शिष्य का भाव जागृत करना है। शिष्य-भाव से अभिप्राय है – पूर्ण समर्पण। वास्तव में, यदि हम यह कर सकें तो हम सहसा पाएंगे कि विश्व की प्रत्येक वस्तु हमारी गुरु हो गई है। प्रत्येक अनुभव हमें शिक्षा देने के लिए आता है। इसके विपरीत, इस भाव के अभाव में हम कुछ नहीं सीख पाएंगे, भले कुछ भी हो जाए।

अम्मा को ज्ञात है कि आप सबको ढेरों चिंताएं हैं। परन्तु स्मरण रहे कि कटे हुए हाथ को देख-देख कर रोने से कुछ नहीं होगा। घाव की मरहम-पट्टी की आवश्यकता है ताकि संक्रमण न हो। परन्तु सोच में पड़े रहना, चिंता करते रहना हमारा स्वभाव ही हो गया है। तनाव हमारे मन को ही नहीं अपितु शरीर पर भी प्रभाव डालता है, बहुत से रोग लगा देता है। तनावग्रस्त लोगों को दैहिक रोग अधिक सताते हैं।

समर्पण तनाव-मुक्ति का एकमात्र साधन है। सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर देने से हमारा बोझ कम हो जाता है। सच तो यही है कि होनी हमारे वश में नहीं-अगली साँस तक हमारे वश के बाहर की बात है। इस ज्ञान के साथ हम अपने सभी कर्म कर, उन्हें ईश्वर को अर्पित कर दें, परन्तु कर्तृत्व न लें। हमारा भाव यह रहे कि हम सब कर्म उसकी कृपा से कर रहे हैं। कर्म को पूजा मान कर करें। यही समर्पण का भाव हमें विकसित करना होगा।

परमात्मा हम सबके भीतर आत्मा के रूप में वास करता है। प्रतिक्षण वो हमें सरल, मधुर शब्दों द्वारा राह दिखलाता है। परन्तु दुर्भाग्य! कि हम में सुनने का धैर्य ही नहीं, हम उसकी कही बात को सुनते ही नहीं। तभी तो हम बारम्बार गलतियों को दोहराते रहते हैं और फिर दुःख पाते हैं। हमें शिष्यत्व के एक आवश्यक गुण – आज्ञा पालन – को विकसित करना चाहिए। जब यह भाव जागृत हो जाता है, जब हम ध्यान से सुनने को, श्रद्धा तथा विनम्रतापूर्वक उसके शरणागत होते हैं तब ही वो गुरु बन कर हमारा मार्गदर्शन करने का दायित्व लेता है। जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ।

समर्पण की बात चले तो मन में राधा का विचार आता है। जब कृष्ण वृन्दावन छोड़ कर मथुरा गए तो वो राधा अथवा किसी गोपी को साथ नहीं ले गए थे। अतः वे सब अति-निराश हो गईं। एक बार जब उद्धव मथुरा से आये तो राधा से मिल कर बोले कि, “सभी गोपियों ने कृष्ण के लिए अपने सन्देश में पूछा है कि अब वो मथुरावासी ही हो जायेंगे अथवा उन्हें भी वहां बुला लेंगे? तुमने मुझे कृष्ण के लिए ऐसा कोई सन्देश क्यों नहीं दिया?”

राधा ने उत्तर दिया, “जब घर का स्वामी बाहर जाता है तो या तो वो दास को साथ ले जाता है या नहीं ले जाता। यदि न ले जाए तो इसमें दास क्या करता है? घर की चाकरी करते हुए स्वामी के लौट आने की प्रतीक्षा करता है। मैन कृष्ण की दासी हूँ, अतः उन्हें अधिकार है कि मुझे साथ ले जाएँ अथवा यहाँ छोड़ जाएँ। वो मुझे साथ ले जाते तो मेरे लिए इससे बढ़ कर कोई सुख न होता। परन्तु वो मुझे साथ नहीं ले गए, इसका मुझे कोई दुःख भी नहीं। मेरे हृदय में जो उनके प्रेम की ज्योति है, मैं उसे दुःख से मन्द नहीं पड़ने दूँगी। मैं उनकी प्रतीक्षा करूंगी, मंदिर को बुहारूंगी और अपने प्रेम की ज्योति से प्रकाशित रखूंगी। दासी होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है। इसीलिये मेरा कृष्ण के लिए कोई विशेष सन्देश नहीं है।”

हमारा भी परमात्मा के प्रति इस प्रकार का राधा-भाव होना चाहिए। यही एक सच्चे भक्त का, दास का भाव है! इसी भाव से हम आत्मबोध की प्राप्ति कर सकते हैं।