कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या ईश्वर को आँखों से देखा जा सकता है? वे कहते हैं कि यदि यह संभव नहीं है तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं किया जा सकता। मानव सीमित है। वे लोग यह नहीं समझते कि दृष्टि, श्रवणशक्ति, सभी सीमित हैं। उनसे एक प्रश्न पूछना चाहिए कि बिजली की तार में बिजली को देखा नहीं जा सकता परन्तु इस कारण से यह तो कहा नहीं जा सकता कि बिजली नहीं है। छूने से झटका लगता है। वह अनुभव है।

एक पक्षी आकाश की ऊँचाईयों में उडता जाता है। इतना ऊँचा उडता है की दृष्टि से ओझल हो जाती है। क्या इसपर यह कहा जा सकता है कि चूँकि वह दृष्टिगोचर नहीं है उसका अस्तित्व नहीं है? ऐसा कहना कि मैं तो केवल उसी में विश्वास करूँगा जो मैं देख सकता हूँ, बिल्कुल युक्तिहीन है। मानो किसी व्यक्ति की हत्या हो गई। हजारों लाखों लोगों ने यह हादसा अपनी आँखों से देखा नहीं परन्तु न्यायाधीश को इनके कथन से कुछ लेना देना नहीं है। उनका फैसला तो एक चश्मदीद गवाह के बयान पर निर्भर है। उसी प्रकार जितने ही लोग बोलें कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, पर प्रमाण तो ईश्वरसिद्ध ऋषि-मुनियों के वचनों को ही माना जाएगा।

एक व्यक्ति जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारता रहता था एक दिन किसी के घर गया। वहाँ भूगोल के एक छोटे प्रतिरूप को देख कर उसने पूछा, “ओह, कितना सुन्दर है! किसने बनाया है?” यह सुनकर उसके आस्तिक मित्र ने कहा, “यदि कृत्रिम भूगोल बनाने के लिए किसी की आवश्यकता है तो यथार्थ भूमि का भी तो कोई स्रष्टा रहा होगा?”

बीज में ही वृक्ष निहित है पर बीज को देखने से या उसे काट खोलने पर वृक्ष की उपस्थिति का भान नहीं होता। उस बीज को बो दो, सिचाई करो। श्रम करो। तो उसमें से अंकुर फूटेगा, पौधा उगेगा। केवल वाद-विवाद करने से कोई लाभ नहीं है, परिश्रम आवश्यक है। तब अनुभूति होगी। एक भौतिकवादी शास्त्रज्ञ को भी किए जाने वाले परीक्षण में विश्वास होता है। हालाँकि बहुत से परीक्षण असफल भी हो जाते हैं तब भी वे प्रयत्न जारी रखते हैं। उनमें विश्वास होता है कि वे अगले परीक्षण में सफलता पाएँगे। एक डॉक्टर बनने में या इंजिनीयर बनने में कितने वर्ष लग जाते हैं? कोई नहीं कहता कि इतने वर्ष प्रतीक्षा करना उनके लिए संभव नहीं है। इतने साल के निरन्तर प्रयास के फलस्वरूप ही वे डॉक्टर या इंजिनीयर बन पाते हैं। ईश्वर दृष्टिगोचर व्यक्ति नहीं है। वे सब के कारण हैं। यदि कोई पूछे कि आम का पेड या गुठली – इनमें से क्या पहले हुआ तो क्या उत्तर देंगे? आम के पेड के होने के लिए गुठली की आवश्यकता है। गुठली के होने के लिए आम के पेड का होना अनिवार्य है। अतः दोनो के होने के लिए अन्य किसी कारण की आवश्यकता है। वह है ईश्वर! वे सभी के मूल कारण हैं, स्रष्टा हैं। वे सर्वस्व हैं। उन्हें जानने का एकमात्रा उपाय है हममें ईश्वरीय गुणों की वृद्धि; अपने अहंकार को ईश्वर में समर्पित करना। तब हम भी ईश्वरत्व का अनुभव कर पाएँगे। प्रह्लाद सर्वोत्तम भक्ति के उदाहरण हैं। प्रह्लाद की भाँति समर्पित भक्त को पाना कठिन है। यदि हम कोई कार्य करने के लिए उद्यत होते हैं परन्तु हमें उस कार्य में असफलता मिलती है तो हम किसी न किसी को दोष देकर लौट आते हैं। समस्याओं के उठने पर हम विश्वास खो बैठते हैं, ईश्वर को कोसते हैं। पर प्रह्लाद को देखो – उन्हें पानी में डुबो कर मार डालने का श्रम किया गया; उबलते तेल में डाला गया, ऊँचे पहाड पर से नीचे खाई में धकेल दिया गया; आग में फेंक दिया गया। उन्हें मार डालने के अनेक श्रम किए गए परन्तु इन परिस्थितियों में भी प्रह्लाद विचलित नहीं हुए, उनकी भक्ति में अल्प मात्र भी कमी न आई। उस अडिग विश्वास के कारण वे सुरक्षित भी रहे। संकटों का सामना करते हुए भी वे ‘नारायण, नारायण’ जपते रहे। अन्ततः उनकी भक्ति को नष्ट करने के श्रम में उन्हें उल्टा-सीधा पाठ पढाने का श्रम किया गया। उनसे कहा गया, “श्रीहरि चोर है, ईश्वर नहीं। ईश्वर का तो अस्तित्व ही नहीं है।” प्रह्लाद इस सब के बीच सदैव भक्ति से मंत्रजप करते रहे। अब हम अपनी ओर एक नजर डालें – किसी के बारे में कुछ सुनते नहीं कि हमारा उनपर से विश्वास उठ जाता है। जीवन में कोई दुःख आता है तो हमारा विश्वास उठ जाता है। हम सभी की भक्ति पार्ट टाईम (अल्प कालिक) भक्ति है। जब कुछ आवश्यकता होती है तो हम भगवान का स्मरण करते हैं अन्यथा उन्हें याद तक नहीं करते। यदि हमारी इच्छा की पूर्ति न हो तो? तब हमारा विश्वास उठ जाता है। यह है हमारी स्थिति। परन्तु सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी प्रह्लाद अविचलित रहे। प्रत्येक प्रतिसंधि से गुजरते हुए उनका विश्वास दृढ होता गया। संकटों के बढने के अनुसार वे भी भगवद् चरणों को और कसकर पकड लेते। प्रह्लाद में उतना समर्पण था। फलतः वे विश्वभर के लिए प्रकाश प्रसारते दीप बन गए। प्रह्लाद की भक्ति और उनकी कथाएँ आज भी हजारों के हृदयों में प्रकाश प्रसारते हैं।

भक्ति व अद्वैत भाव में प्रह्लाद उत्कृष्ट थे। प्रह्लादसम समर्पण वाला व्यक्ति जो कुछ स्पर्श करता है वह स्वर्ण बन जाता है। प्रह्लाद की भक्ति ही पिता हिरण्यकशिपु की मुक्ति का कारण भी बनी। ईश्वर के करों से मृत्यु प्राप्त करना मुक्ति ही है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने हिरण्यकशिपु को शरीर से तादात्म्य से विलग करके आत्मबोध प्रदान किया। भगवान ने अनुभव के माध्यम से हिरण्यकशिपु में बोध जगाया कि शरीर नश्वर है और केवल आत्मा ही शाश्वत है।

निस्सार मानव अपनी बुद्धि और काबलियत पर गर्व करता ईश्वर को तक दोष देता है। ईश्वरतत्त्व बुद्धि से परे है। ऋषीश्वरों ने ईश्वर को जानने हेतु ही विग्रहाराधना व अन्य आध्यात्मिक साधना का मार्ग दर्शाया है।

प्रश्नः यदि ईश्वर सर्वव्यापी हैं तो मंदिरों की क्या आवश्यकता है?

अम्माः यह सनातन धर्म की विशेषता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के तल तक जाकर उनका उद्धार करता है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न संस्कारों के होते हैं, सभी का एक ही स्तर नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति का उनके संस्कार के अनुरूप ही मार्गदर्शन किया जा सकता है। दूध पीते बच्चे को माँस खिलाएँ तो वह पचेगा नहीं। उसे तो उसकी स्थिति के अनुरूप उचित आहार ही देना चाहिए। कुछ रुग्णों को इंजेक्शन से अलर्जी होती है उन्हें दवा टिकिया के रूप में दी जाती है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को उनके शारीरिक व मानसिक गठन के अनुरूप मार्ग का उपदेश दिया जाना चाहिए। इस तथ्य के आधार पर ही विभिन्न संप्रदायों का उद्भव हुआ। सगुण व निर्गुण का संकल्प, भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सभी का उद्भव इसी आधार पर है। इन सभी मार्गों का आधारभूत तथ्य नित्यानित्य विवेक ही है। अर्चना, पूजा, भजन – सभी का लक्ष्य यही है। दृष्टिहीन बच्चे को ब्रेल अक्षरों को स्पर्श करवाकर अक्षरों का ज्ञान दिया जाता है। बधिरों को संकेतों की भाषा में सिखाना पडता है। सभी को उनके तल के अनुसार ही ज्ञान दिया जा सकता है। साधारण लोगों के उद्धार के लिए मंदिरों की आवश्यकता है। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता, मंदिरों की आवश्यकता का निषेध नहीं हो सकता।

हालाँकि वायु सर्वत्र व्याप्त है तब भी क्या पंखे के नीचे बैठने में कोई विशेषता नहीं है? वृक्ष की छाँव में अन्य स्थलों पर न पाई जानेवाली एक शीतलता होती है। वहाँ एक खास ठंडक व सुख का अनुभव होता है। इसी प्रकार जब उपाधि के माध्यम से ईश्वर की पूजा की जाती है तो उनका सान्निध्य अधिक अनुभव हो पाता है। हालाँकि सूर्यप्रकाश सर्वत्र है तब भी बन्द कमरे में प्रकाश पाने के लिए दीया जलाना पडता है। हालाँकि गाय में दूध है उसके कानों को पकडकर निचोडने से कोई फायदा नहीं है। दूध तो थन से ही मिलेगा। ईश्वर सर्वव्यापी हैं तो भी मंदिरों में विश्वास रखनेवालों को सहज ही उनका सान्निध्य अनुभव हो पाता है। परन्तु उसके लिए विश्वास का होना भी आवश्यक है। विश्वास का अर्थ है मन का ट्यूनिग, या ईश्वर के सुर से मन का सुर मिलाना। हालाँकि मंदिरों में ईश्वर सान्निध्य है तो भी अविश्वासियों को उसकी अनुभूति नहीं होगी। विश्वास से ही अनुभूति होती है।

एक बार अम्मा और यहाँ के बच्चे नृत्य का कार्यक्रम देख रहे थे। एक विदेशी दंपत्ति विदेशी नृत्य कर रहे थे। उनका हाथों में हाथ लिए यूँ नृत्य करना एक बेटी को पसन्द न आया। उस बेटी ने पूछा, “छी, यह कैसा नृत्य है? स्त्री-पुरुष साथ-साथ नृत्य कर रहे हैं!” इसपर अम्मा ने प्रश्न किया, “क्या शिव-पार्वती एक साथ नृत्य करेंगे तो तुम्हें देखते हुए लज्जा अनुभव होगी?” चूँकि हम उसे दिव्य मानते हैं, हमें उसमें कोई बुराई न दिखेगी। जब हम शिव-पार्वती कहते हैं तो उसमें एक दिव्यता आ जाती है। अतः हम उसे श्रेष्ठ मानते हैं। यह विश्वास पर ही आधारित है। चूँकि हम उस स्त्री-पुरुष में दिव्यता देख नहीं पाते हमें उनका नृत्य बुरा लगता है। अर्थात मनोभाव ही प्रधान है। विश्वास में दृढ प्रतिष्ठित रहते हुए हम यदि अग्रसर हों तो यकीनन हमें ईश्वरानुभूति होगी। विश्वास ही नींव है।

जिस मंदिर या आराधनालय में अनेक व्यक्ति एकमन हो प्रार्थना करते हैं वहाँ का वातावरण अन्य स्थलों के वातावरण से भिन्न होगा। एक मयखाने में एक ऑफीस का सा वातावरण नहीं होता। मंदिर का वातावरण मयखाने के वातावरण से भिन्न होता है। जबकि मयखाने में हम मनोबल खो बैठते हैं, एक मंदिर में हम मनोबल पाते हैं, मनोबल का विकास होता है। आराधनालय सद्विचारों के तरंगों से व्याप्त होते हैं। उस वातावरण में विचलित मन को भी कुछ शान्ति की अनुभूति हो पाती है। अतर के कारखाने की एक खासियत होती है, वहाँ का वातारण ही सुगंधित होता है। दूसरी ओर रसायन बनाने वाले कारखाने का अंतरिक्ष भिन्न होता है। मंदिरों का भक्तिभावसिक्त वातावरण, वहाँ के पावन दृश्य, सभी मन की एकाग्रता पाने में व हममें भक्तिभाव को जगाने में सहायक होते हैं। मंदिर दर्पण की तरह हैं। निर्मल दर्पण में हम अपने मुख पर लगे मैल को स्पष्ट देख पाते हैं और अतः उसे साफ भी कर पाते हैं। हमारे हृदयमालिन्यों के निवारण में मंदिर सहायक हैं।

प्रश्न- क्या ईश्वर ही, हमसे सब कुछ नहीं करा रहे हैं?
अम्मा- हाँ, लेकिन ईश्वर ने हमें बुद्धि भी दी है ताकि हम विवेकपूर्वक कार्य कर सकें। हमें सभी कार्य विचारशीलता से, विवेकपूर्वक करना चाहिये। भगवान ने तो जहर भी बनाया है, पर कोई अकारण ज़हर नहीं खाता तब हम अपने विवेक का उपयोग करते हैं। इसी तरह हमें अपने हर कार्य की जाँच परख विवेकपूर्वक करते रहना जरूरी है।

प्रश्न- अम्मा, जो लोग एक सद्गुरु को समर्पण कर देते हैं, क्या वे मानसिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं?
अम्मा- बेटा, एक बटन के दबने से छाता खुल जाता है। इसी तरह एक सद्गुरु के समक्ष सिर झुकाने से तुम्हारा मन, खुलकर विश्वमानस में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी आज्ञाकारिता तथा विनम्रता, कमज़ोरी नहीं है। एक पानी के फिल्टर की तरह, सद्गुरु तुम्हारा अहंकार हटाकर तुम्हारा मन निर्मल बना देते हैं। अन्यथा सामान्य लोग तो सदा, अपने अहंकार के गुलाम बने रहते हैं। वे अपनी विवेक बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाते।

एक रात एक घर में चोर घुस गया। परन्तु जैसे ही वह घुसा, लोग जाग गये और वह जान बचाकर भागा। लोग उसके पीछे-पीछे चिल्लाते हुए भागने लगे- ‘पकडो चोर, पकडो चोर!’ जैसे ही थोड़ी भीड़ बढ़ी, चोर भी भीड़ में शामिल हो गया और वह भी चिल्लाने लगा- ‘पकडो चोर, पकडो चोर’। उस चोर की तरह, अहंकार भी हमारा साथी बन गया है। ईश्वर हमें अहंकार छोड़ने के अवसर प्रदान करते हैं, परंतु तब भी हम अपने अहंकार का ही पोषण करते हैं और उसे अपना दोस्त बना लेते हैं। शायद ही कभी हम विनम्रता अपनाकर, अहंकार त्यागने की कोशिश करते हैं।

अनु्शासन के बिना, मन तुम्हारे नियंत्रण में नहीं आ सकता। इसलिए तुम्हें सद्गुरु के निर्देश अनुसार, संयमपूर्वक रहना ज़रूरी है। एक बार मन पर काबू पा लेने के पश्चात, तुम्हें किसी का ड़र नहीं रहेगा, क्यों कि तब तुम्हारे अंदर विवेक शक्ति जागृत हो जायेगी जो तुम्हारा प्रदर्शन करेगी।

प्रश्न— मेरी समझ में नही्‌ आता कि र्ईश्वर की बनाई वस्तुओं के उपभोग से आनंद लेने में क्या आपत्ति है? ईश्वर ने हमें इन्द्रियाँ क्या इसीलिये नही दी हैं कि हम वस्तुओं का आनंद ले सकें?

अम्मा— जैसा अम्मा ने अभी कहा, कि हर वस्तु की नियम और सीमाएँ है और हमें उन नियमों के अंतर्गत जीना चाहिये। हरवस्तु की एक अंतर्निहित प्रकृति होती है। ईश्वर ने हमें केवल इन्द्रियाँ ही नहीं दी हैं, वरन्‌ विवेक—बुद्धि भी दी है। जो व्यक्ति उसका उपयोग न कर, इन्द्रिय सुखों के पीछे भागते रहते हैं, उन्हें कभी सुख शान्ति नहीं मिल सकती। उनका अंत हमेशा दुःखद ही होगा।

एक यात्री एक बार विदेश गया। उस देश में वह पहली बार गया था। वहाँ के लोग उसके लिये अजनबी थे। उसे वहाँ की भाषा नहीं आती थी, न उनके रीतिरिवाज मालूम थे, न खान—पान की आदतें ज्ञात थी। वह घूमते—घामते, बाजार में पहुँच गया, जहाँ खरीददारों की बहुत भीड़ थी। वहाँ तरह—तरह के फल थे, जो उसने पहले नहीं देखे थे। उसने देखा कि बहुत से लोग एक विशिष्ट फल खरीद रहे थे। उसने सोचा कि ये फल ज़रुर स्वादिष्ट होगा और एक थैला भर खरीद लिया। एक झाड़ के नीचे बैठकर, उसने एक फल चखा। फल जरा भी मीठा नहीं था — उसका मुँह जलने लगा।

उसने फल का मध्यभाग चखा— वह भी तीखा था। फल का दूसरा सिरा भी बहुत तीखा निकला। उसने दूसरा फल चखा, वह भी तीखा निकला। उसने सोचा कोई फल तो मीठा होगा— उसने एक—एक करके सभी फल चखे। तीखे स्वाद के फलों से उसका मुँह जलता रहा,आँसू बहने लगे, पर वह ज़िद्दपूर्वक, एक के बाद एक फल खाता ही गया। बेचारा बहुत पीड़ा में था। मीठे स्वादिष्ट फल की तलाश में, उसे मिले— केवल मुँह जलाने वाले, तीखे स्वाद के फल।

जिन्हें वह मीठे फल समझा था— वह थी पकी लाल मिर्च! हर मिर्च चखकर कष्ट उठाना आवश्यक नहीं था। परंतु इस झूठी आशा में कि कोई फल तो मीठा होगा— वह अंतिम मिर्च तक खाता ही चला गया। मिर्च का तो स्वभाव है— तीखापन! एक मात्र सुख जो उसे मिला, वह था मिर्च की सुंदरता देखने का सुख।

इसी प्रकार हम भी बार—बार उन्हीं चीज़ों में सुख ढूँढते हैं, जिनमें सुख है ही नखीं। सुख की खोज में हम एक वस्तु से, दूसरी और फिर तीसरी पर जाते रहते हैं। यह केवल मन का भ्रम ही है कि हम बाहरी वस्तुओं से सु्ख पा सकते हैं।

सत्य यही है कि बाहरी किसी वस्तु में सुख है ही नहीं। जो सुख तुम खोज रहे हो वह तुम्हारे अंदर ही है। ईश्वर ने हमें शरीर, मन व बुद्धि दी है ताकि हम यह पाठ पढ़ सकें व सच्चे सुख का उद्‌गम खोज सकें। अविवेकपूर्ण इन्द्रिय भोग से तो सुख के बजाय दुःख ही हाथ आयेगा।

शरीर व इन्द्रियों का उपयोग हम दो प्रकार से कर सकते हैं। पहला— यदि हम ईश्वर को जानने का प्रयत्न करें तो हम अनंत सुख पा सकते हैं। परंतु यदि इन्द्रिय सुखों के पीछे ही भागते रहें, तो मिर्च में मिठास ढूँढने वाले मूर्ख यात्री के समान दुःख ही पाते रहेंगे। इन्द्रिय सुखों की मूल प्रकृति ही दु:ख देने की है, यह समझे बिना उनके पीछे दौड़ने से दुःख ही हासिल होगा। अगर हम बाहरी वस्तुओं की मूल प्रकृति समझ लें, तो उनसे उत्पन्न दुःख, हमें कमजोर नहीं बना सकेगा।

सागर में लहरें उठती हैं, परंतु अगले ही शण तट पर गिर कर चूर हो जाती हैं। वे ऊपर रुक नहीं सकती, गिरना उनकी नियति है। जो व्यक्ति सुख पाने की आशामें बाहरी वस्तुओं की ओर लपकता है, वह भी इसी तरह गिरकर दुःखी होता है। इससे हमें यह समझ लेना चाहिये कि सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं है। लोगों की आंतरिक अशांति व दु:ख का कारण यही भ्रम है। इससे केवल व्यक्ति नहीं, पूरा समाज प्रभावित हो रहा है। बाहरी वस्तुओं में सुख की खोज के कारण ही सच्चा प्रेम लुप्त हो गया है। पारिवारिक जीवन की खुशी व शांति नष्ट हो गई है। लोगों ने खुले दिल से प्रेम व सेवा करने की शमता खो दी है। पति पराई स्त्रियों की कामना करते हैं और स्त्रियाँ पराये मर्दों की। भोग की लालसा इस हद तक बढ़ चुकी है कि कुछ ऐसे पिता भी हैं, जो भूल जाते कि वह उनकी अपनी बेटी है। भार्ई बहन के रिश्तों में भी दरार पड़ रही है। अनगिनत बच्चों की हत्या की जा रही है। इस सारी दुष्टता का कारण यह भ्रामक अवधारणा है कि सुख बाहर पाया जा सकता है। अम्मा यह नहीं कह रही है कि तुम भौतिक सु्खों से वंचित रहो। परंतु तुम्हें उनकी मूल प्रकृति से अवगत रहना चाहिये। अति से बचना चाहिये। धर्म पकड़े रहो और अधर्म से बचो।

जो लोग केवल अपने लिये सुख खोजते फिर रहे हैं तथा असंयमित जीवन जी रहे हैं, उनका अंत दु:खदायी ही होगा? यह स्वाभाविक है कि कामनाएँ और भावनाएँ मन में पैदा हों— लेकिन कुछ संयम बरतना आवश्यक है। भूख लगना स्वाभाविक है— परंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, खाने योग्य दिेखे तो हम उस पर टूट पड़ें। ऐसा करेंगे, तो बीमार पड़ जायँगे। अधिक भोग से दु:ख ही पैदा होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते।

इन्द्रिय सुख भी वास्तव में अंदर से ही प्राप्त होता है। परंतु लोग सुखों का बाहर, पागलों की तरह, तब तक पीछा करते हैं, जब तक कि वे हार कर, निराश हो कर गिर न पड़ें। वे उठकर फिर भागते हैं और फिर गिरते हैं। यदि तुम सुखों को बाहर ही खोजते रहोगे, तो जीवन में कभी शांति नहीं पा सकोगे। तुम्हें अंदर देखना सीखना होगा, वहां तुम्हें सच्चा सुख मिलेगा। जब तक तुम्हारा मन बाहरी कूद—फाँद बंद कर के, शांत नहीं हो जाता, तब तक तुम सच्चा सुख अनुभव नहीं कर सकते। सागर की गहराई में बेचैनी की कोई लहरें नहीं हैं। जब तुम मन की गहराइयों में उतरोगे, तो मन स्वतः शांत हो जायेगा। वहाँ तुम केवल आनंद पाओगे।

प्रश्न – मंदिरों में भोग चढ़ाने की जरूरत क्या है?

अम्मा – भगवान को हमसे किसी चीज की जरूरत नहीं है। समस्त सृष्टि के नाथ – उस त्रिलोकीनाथ को किस चीज की कमी है? सूरज को मोमबत्ती की क्या आवश्यकता है?

वास्तविक चढ़ावा तो सही जीवन तत्त्व को जान समझकर, उसके अनुसार जीवन यापन करना है। आवश्यकता अनुसार  खाना, आवश्यकता अनुसार सोना, आवश्यकता अनुसार बोलना, दूसरों को ठेस पहुचाने वाले शब्द न बोलना, बेकार समय व्यर्थ न करना, बुजुर्गों की सेवा करना, उनसे मीठे शब्द कहना, बच्चों को पढाई में मदद करना, कोई खास काम न हो तो कोई व्यवसाय सीख कर घर पर ही कर्म करना और उससे जो पैसे बनें उससे गरीबों की सेवा करना – यह सब ईश्वर से प्रार्थना करना है, सभी ईश्वर आराधना ही है।

 

विचार, वाणी और कर्म में सही ज्ञान के समावेश से हमारा जीवन ही पूजा बन जाता है। यही वास्तविक चढ़ावा है। किन्तु शास्त्रों का सही अध्ययन न करने के कारण हम इन बातों को ठीक से समझ नहीं पाते। आज सनातन धर्म को सही अर्थ में समझने के अवसर भी कम मिलते हैं।

आज मंदिर अनेक हैं। उनके माध्यम से अनेक लोगों को रोजी रोटी भी मिलती है। परन्तु इसके साथ-साथ लोगों को अध्यात्म का ज्ञान भी देने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि ऐसा हो पाता तो लोगों को बहुत फायदा होता। आज समाज में इसकी कमी का स्पष्ट अहसास हो रहा है।

चाहे किसी भी ध्येय से हो, ईश्वर से रोते हुए प्रार्थना करना अच्छा ही है। वह हमें भलाई की ओर ले चलेगी। बच्चा अपने पिता को ‘बप्पू’ पुकारे या ‘पापू’ पिता उसका जवाब देंगे। पिता जानते हैं कि बच्चा ठीक उच्चारण न जानने के कारण ऐसा पुकारता है। ईश्वर केवल तुम्हारे हृदय को देखते हैं। वे हृदय से उमडती प्रार्थना से मुँह मोड नहीं सकते।

चढ़ावा शब्द सुनने पर हमारे मन में खीर आदि का भोग चढ़ाने की बात उभर आती है। इस विषय में शायद कुछ लोग प्रश्न करें कि जब इतने गरीब लोग भूखे रहते हैं तो ईश्वर को खीर क्यों चढ़ायी जाय? हमने तो किसी देवता को खीर पीते नहीं देखा है। अन्ततः खीर हमीं लोग पीते हैं। मंदिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद हम आपस में बाँटकर खाते हैं। तब आस-पास रहनेवाले गरीब बच्चों को खीर पीने को मिलती है। उनके मन का प्रसाद, उनकी प्रसन्नता ईश्वर की प्रसन्नता के रूप में हम तक पहुँचती है। यद्यपि खीर हमें प्रिय है, उसे अकेले खाये बिना दूसरों के साथ बाँटकर खाने से हमारा मन विशाल होता है। उस विशालता से ही वास्तविक आनन्द की प्राप्ति होती है। वही ईश्वर का आशीर्वाद है।

हम जो कुछ भी करते हैं वह ईश्वर की कृपा पाने के लिये ही करते हैं। अतएव हम जो कुछ भी करें वह प्रभु को समर्पित करते हुए करना चाहिये। किसान खेत में बीज बोने से पहले प्रार्थना करता है। उसके बाद ही वह बोता है। इसका कारण यह है कि पुरुषार्थ की अपनी सीमा होती है। कर्म पूरा करने व उसके फल की प्राप्ति के लिये ईश्वर कृपा का होना अनिवार्य है। धान के बीज बोने के बाद, उसके अंकुरित होकर, उगने, पकने के बाद, फसल के समय यदि बाढ आ जाय तो सब कुछ ध्वस्त हो जायेगा। हम जो भी कर्म करें वह ईश्वर कृपा से ही पूर्ण होता है। इसलिये हर वस्तु को प्रभु को चढ़ाने के बाद ही उसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति – पूर्वजों की दी गई संस्कृति है। भोजन करते समय भी पहला कौर प्रभु को चढ़ाना चाहिये। यह समर्पण और बँटवारे की प्रवृत्ति है। हम उसके जरिये यह ज्ञान कार्यान्वित करते हैं कि जीवन को केवल अपने लिये न मानकर दूसरों के साथ बाँटें। मन जिसमें बंधा रहता है उसे समर्पित करने की प्रविधि भी इसमें शामिल है।

यदि हम देखें कि आज हमारा मन किससे अधिक बंधा है तो यह स्पष्ट होगा कि वह नब्बे प्रतिशत धन से बंधा हुआ है। पैतृक संपत्ति के बंटवारे के समय यदि हमारे हिस्से में अगर नारियल के दस पेड कम हो जायें तो हम अपनी माँ को तक कचहरी में खडा करने में संकोच नहीं करेंगे। एक कन्या से ब्याह करते समय उसकी पारिवारिक हैसियत ही नहीं, आर्थिक स्थिति का भी जरूर पता लगा लेते हैं। विरले ही लोग इसका अपवाद होंगे। अर्थात मन केवल संपत्ति में ही बंधा रहता है। इस मन को ऐसे बंधन से मुक्त कराना आसान बात नहीं है। किन्तु उसका सरल मार्ग ईश्वर में सब कुछ अर्पित करना है। यदि हम अपने मन को ईश्वर में अर्पित करें तो वह पवित्र हो जायेगा। इस समर्पण के अंग के रूप में ही भगवान को प्रिय वस्तु चढ़ाते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण को खीर प्रिय है। वस्तुतः कृष्ण शब्द अपने में मधुर है। प्रेम नामक माधुर्य से मधुर। किन्तु हमें खीर प्रिय है। पर हमेशा प्रभु को खीर चढ़ाने के कारण हम तो उलटे यह समझ बैठे हैं कि प्रभु को खीर प्रिय है। असल में वह हमारी प्रिय वस्तु भगवान को चढ़ाने की प्रविधि है। भगवान प्रेम हैं। प्रभु हमारे हृदय के खीर – उस प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।

एक भक्त सेव, अंगूर और विविध मिठाइयों के ढेर खरीदकर पूजा भवन में रखने के बाद प्रभु से निवेदन करता है, “हे प्रभु! देखिये मैं आफ लिये क्या-क्या लाया हूँ – सेव, अंगूर, मिठाई – आप को खुशी हुई ना?”

तुरन्त आकाशवाणी सुनाई पडी, “मुझे इन सब से प्रसन्नता नहीं होती।”

“तो भगवन्, बताइये कि आपको संतोष देने वाली वस्तु क्या है। मैं वह खरीद लाऊँगा।” वह व्यक्ति बोला।

“मैं तो मानस पुष्प से ही तृप्त होऊँगा। वही मुझे प्रिय है।” भगवान ने उत्तर दिया।

“मानस पुष्प? यह पुष्प कहाँ मिलता है?” उस व्यक्ति ने पूछा।

“तुम्हारे ही पडोस में।”

भक्त तुरन्त उस पुष्प की खोज में भागा दौडा गया। परन्तु उसके पडोस में कोई भी इस मानस पुष्प के बारे में कुछ नहीं जानता था। वह इस पुष्प की खोज में गाँव के घर-घर गया। परन्तु सभी जगह से उसे वही उत्तर मिला, “हमने न तो ऐसे पुष्प को देखा है और न ही कहीं उसके बारे में सुना है।”

थका माँदा, भक्त अपने घर लौटा। पूजा कक्ष में लौटकर उसने भगवान से कहा, “प्रभु! क्षमा करें। मैं पूरे गाँव में खोजता फिरा परन्तु आपका बताया हुआ मानस पुष्प कहीं नहीं मिला। अब तो मैं अपना हृदय ही आपको अर्पित करता हूँ।”

“वही फूल मैंने माँगा था – वही मानसपुष्प है। तुमने पहले जितनी भी चीजें चढ़ाईं वे तो मेरी ही शक्ति से उत्पन्न हुई हैं। मेरी शक्ति के बिना तुम अपना हाथ तक नहीं उठा सकते। संसार में सभी कुछ मेरी सृष्टि है। परन्तु तुमने भी एक चीज की सृष्टि की है – ‘मैं’ का भाव। वही मुझे चढ़ाना चाहिये। तुम्हारा निश्छल हृदय ही मेरे लिये सबसे प्रिय पुष्प है।” यह था प्रभु का उत्तर।