आज समय बदल गया है। संध्या-समय लोग टी.वी. के सामने बैठ कर सिनेमा या हमारी सभ्यता को प्रदूषित करने वाले कार्यक्रम देखते रहते हैं। सामान्यतः, लोग एक ही दिशा में विचार करते हैं कि अधिक से अधिक धन-उपार्जन कैसे किया जाये-फिर चाहे उसके लिए घूस या अन्य अधार्मिक, दुराचारी कर्मों का सहारा क्यों न लेना पडे। इन सब को तो वे अपनी दक्षता का चिन्ह समझते हैं। और क्या कहें! पैसे के लिए अपनी माँ की हत्या करने तक में हिचकते नहीं। आज जगत की यह स्थिति है!

परन्तु शांति कहाँ है? कहीं नहीं! आजकल ड्रग्स, मदिरा, नींद की गोलियां! – हे भगवान्! कितना कुछ है, बहुत से लोग इनके बिना रह नहीं जी पाते, इनके दास बन कर वे अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं, इतना ही नहीं दूसरों को भी हानि पहुँचाने में झिझकते नहीं। जो बच्चे 3वर्ष के भी नहीं हुए, वे राजनीतिक पार्टी के लिए नारे लगाते हैं। राजनीति के नाम पर लोग एक-दूजे को नष्ट कर डालते हैं। इस वैर-विरोध की राजनीति का भाग स्कूली बच्चे भी बन जाते हैं। युवा लोग शराब, व्यभिचार के दासत्व द्वारा अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

बुढापे में जब पिता रोगी हो शय्या पर हो तो पुत्र का कर्तव्य हो जाता है कि वह उसकी देखभाल करे, किन्तु वह चिल्ला कर कहता है “संपत्ति का बँटवारा करो और मुझे मेरा हिस्सा दो” या ऐसी अन्य मांग करता है, वह चाकू-छुरी द्वारा पिता की हत्या भी कर सकता है… थोडी सी संपत्ति के लिए पिता की हत्या?

और श्रीराम जैसे पुत्र ने हमें क्या शिक्षा दी? पिता के वचन-पालन हेतु वह राजपाट त्यागने को तैयार हो गए। यद्यपि दशरथ के लिए स्वयं को राम से अलग रखना अति दुखमय था, तब भी वह भी सत्य के मार्ग पर डटे रहे। उन्होंने अपनी पत्नी कैकेयी को उसके बलिदान के बदले में वर देने के वचन को निभाया।

युद्ध-क्षेत्र में अपना जीवन दाँव पर लगा कर कैकेयी ने दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। इस कारण दशरथ को अपनी पत्नी प्रिय थी, न कि अपने लावण्य अथवा प्रेम की बाह्य-अभिव्यक्ति के लिए। उस समय दिए हुए अपने वचन को राजा ने भंग नहीं किया और पुत्र राम ने भी पिता के वचनों को बिना किसी प्रतीकार के स्वीकार किया।
और सीता? जब राम वनगमन के लिए तैयार हो गए तो क्या वह क्रोधित हुई या कोई तमाशा खडा किया? सीता ने नहीं कहा कि “तुम्हें वनवास को नहीं जाना चाहिए। राज्य तुम्हारा है, येन-केन-प्रकारेण तुम्हे राज्य का अधिग्रहण कर लेना चाहिए”। पति ने वनकी ओर प्रस्थान किया तो पत्नी चुपचाप साथ हो ली, साथ ही भाई लक्ष्मण भी हो लिए।

भरत से हमें क्या शिक्षा मिलती है? उन्होंने ऐसा नहीं सोचा कि “भ्राताश्री तो गए, अब मैं राज्य करता हूं”। उन्होंने बडे भाई से वन में जाकर भेंट की, उनकी पादुकाओं को लाकर सिंहासन पर पधराया और उनका सेवक बन कर राज्य किया। ऐसी थी तब की रहनी और यही हमारे लिए भी जीवन का आदर्श है। किन्तु किसे परवाह है? कौन इन आदर्शों पर चलता है? उन लोगों ने हमें जीवन के सिद्धांतों से अवगत कराया। और हम न तो इस सबकी परवाह करते हैं, न ही इस विषय में सोचते हैं। हम केवल कमियाँ ढूंढते हैं।
क्रमशः

वर्तमान समय में धर्म का पतन तथा गृहस्थाश्रम का धर्म पुराने समय में “भौतिक” तथा “आध्यात्मिक”-दो भिन्न विभाग नहीं थे। परमात्मा की प्राप्ति प्रत्येक का लक्ष्य था। गृहस्थ जीवन व आध्यात्मिक जीवन की प्रगति साथ-साथ होती थी। जन्म के तुरंत पश्चात, माता-पिता बच्चों के कानों में प्रभु के नाम का उच्चारण करते थे, इस प्रकार परमात्मा का नाम सुनते, बोलते बच्चे बडे होते थे।

तत्पश्चात उन्हें गुरुकुल भेज दिया जाता था, जहाँ ब्रह्मचारी व्रत का पालन तथा तपश्चर्या करते हुए वे गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों का अध्ययन करते। परिणामतः बच्चे जगत के विषय में तथा इसमें रहते हुए विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हुए जीवन जीने की कला भी सीख जाते और विवेकी, प्रसन्निचत्त तथा दृढ-संकल्पवान होते थे। मृत्यु के भय से रहित, वे सत्य हेतु अपना जीवन बलिदान करने को तत्पर रहते थे। उनके शरीर बलवान, सुगठित, सिंह-शावक के समान प्रभावशाली होते थे और उम्र लम्बी!
फिर वे उसी प्रकार से पली-बढी लडकियों से विवाह कर धार्मिक, सदाचारी गृहस्थ जीवन का निर्वाह करते। वे दूसरों की निष्काम सेवा करते व भूखों को भरपेट भोजन करा कर उनके चरण पूजते। वंश-वृद्धि हेतु केवल एक संतान उत्पन्न करते थे। गर्भ-धारण के बाद माँ तप-पूर्ण जीवन व्यतीत करती थी जिसके फलस्वरूप उत्तम, बुद्धिमान संतान उत्पन्न होती थी जो जगत के लिए उपयोगी सिद्ध होती। गर्भावस्था में माता के विचारों की तरंगें बालक के चरित्र को प्रभावित करती हैं। गर्भावस्था के दौरान जो माँ परमात्म-विचार करती है, उसका बालक अवश्य ही भक्त होता है।

पुरुष का अपना ही अस्तित्व पत्नी के गर्भ से बालक रूप में प्रकट होता है अतः बालक के जन्मोपरांत पति अपनी पत्नी को माता-भाव से देखता है। बालक के वयस्क हो जाने व घर-बार सँभालने योग्य हो जाने पर, माता-पिता तप हेतु वन-गमन करते थे।
उस समय में लोगों को यह विचार कभी नहीं आता था कि दूसरों को कैसे लूटें। कोई सिनेमा आदि नहीं थे। सुबह और शाम, संध्या-समय लोग तेल के दिए जलाते और भगवान का नामोच्चारण करते, तत्पश्चात दिन भर में किये कर्मों को याद करते व गलतियों के लिए पश्चाताप करते थे, जिससे उन्हें शांति प्राप्त होती थी।
क्रमशः

पत्नी का ऐसा ही सम्बन्ध पति के साथ होना चाहिए। जब पति दफ्तर से घर लौटे तो उसका मुस्कुरा कर स्वागत करे। उस समय जो कुछ कर रही हो उसे छोड कर, चेहरे पर मुस्कान लिए लपक कर दरवाजे पर जाना चाहिए। फिर प्रेम सहित उसके लिए कुछ पेय ले आये व उसके साथ बैठ कर कुछ देर गपशप करें। इस प्रकार थोडी देर हल्का-फुल्का वातावरण बन जाने के बाद ही घर और बच्चों से सम्बंधित समस्यायों की बात छेडे।

इसी प्रकार, मेरे दूसरे बच्चों-पतियों को भी कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहियें। वे घर में आने के बाद दफ्तर जैसा व्यवहार न करें। घर का वातावरण प्रेम तथा स्वतंत्रता-पूर्ण होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप एक पुलिस-अफसर हैं तो दफ्तर में आप अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ गंभीर रहते होंगे किन्तु उस भाव को घर पर नहीं लाना चाहिए। अपनी पत्नी के साथ इस प्रकार से पेश न आयें – ”यह लाओ“, ”वो ले जाओ“, ”यह क्यों नहीं किया?“, ”इसे ऐसे क्यों नहीं किया?“ आदि…
घर आने के बाद पत्नी से बातचीत करो, हालचाल पूछो। बच्चों के साथ कुछ समय बिताओ। पत्नी से घर के बारे में बात करो कि क्या चल रहा है या कुछ समस्या तो नहीं है? उसकी बात धैर्यपूर्वक सुनो। इस प्रकार प्रेमपूर्वक रहो।
पत्नी को कभी भी केवल वासना-पूर्ति के साधन की दृष्टि से न देखो। आज स्त्रियाँ, बहुधा, शिकायत करती हैं क्योंकि हृदय में व्यथा है। उनका कहना है कि पति उनकी समस्यायों की परवाह नहीं करते अतः पत्नियों का जीवन कष्टपूर्ण व्यतीत होता है और अंततः वे अपनी समस्यायों के समाधान के लिए दूसरे पुरुषों का सहारा लेती हैं।

पुरुषों को अपनी पत्नियों के जीवन में उतर कर झांकना चाहिए, उन्हें यूँ ही निर्बल और आश्रित कह कर टाल नहीं देना चाहिए। ऐसा कहना कहाँ तक उचित है कि मुर्गी को मुर्गे जैसा होना चाहिए? स्त्रियों का अपना विशेष स्वभाव होता है। पुरुषों को कुछ समय निकाल कर उनके जीवन की समस्याओं को सुनना व उनके मन के बोझ को जानना चाहिए अन्यथा उनके प्रति बहुत क्रूरता हो जायेगी। प्रायः देखा जाता है कि बहुत से लोग अपनी पत्नियों को जीती जागती मशीन समझते हैं। कितने ही पति शराब के नशे में धुत घर लौटते हैं और प्यार तो दूर की बात, वे पत्नी के साथ झगडा करते हैं। दिन पर दिन पत्नी का जीवन दुःख व कष्टपूर्ण होते-होते असह्य हो जाता है। पति से पूछो तो कहेगा ”मैं उससे प्रेम करता हूं“ किन्तु ज्यों ही दोनों सामने आते हैं, झगडा शुरू हो जाता है। आखिर पत्थरों में छिपे मधु से क्या लाभ?

प्रेम की अभिव्यक्ति होना आवश्यक है। प्रेम परमात्मा है। वही तो हमारा धन है। जिसे हम भोजन व नींद का त्याग करके अर्जित करते हैं, वो सच्चा धन नहीं है, अंत-समय यह हमारे साथ नहीं जायेगा। जिसमें प्रेम का भाव हो, कोई करुणापूर्ण कर्म, मुस्कुराता हुआ चेहरा और मीठे वचन हों – ऐसा व्यक्ति अवश्य ही परमात्मा की कृपा का भागी होगा। प्रेम व त्याग पारिवारिक जीवन के वो दो पंख हैं जो आनंद तथा संतोष के आकाश में उडान भरने में हमारी सहायता करते हैं।
क्रमशः

“बच्चों, हमारे पास कितनी भी संपत्ति हो, यदि हमें परिवार व समाज में इसके स्थान या इसके उचित प्रयोग की जानकारी न हो, तो प्रसन्नता हमसे दूर ही रहती है। असीम संपत्ति से भी प्राप्त सुख अनित्य होता है, नित्य नहीं।
कंस और हिरण्यकशिपु क्या अतुल्य संपत्ति के स्वामी नहीं थे? रावण के पास सब कुछ था परन्तु क्या वह सुखी था? इन्होंने सच्चे धन का मार्ग छोड कर अहंकारपूर्ण जीवन की राह चुनी और फलस्वरूप सुख, शांति उनके जीवन से जाते रहे।

अम्मा ऐसा नहीं कहतीं कि धन-संपत्ति को त्याग दो। यदि हम धन का प्रयोग विवेकपूर्वक करें तो सुख-शांति हमारी सच्ची दौलत होगी। आप भले हर प्रकार की सम्पदा अर्जित कर लें, किन्तु उसके सही उपयोग की कला अध्यात्म ही सिखाता है। हम असंख्य बाण छोडें, किन्तु यदि हमें निशाना लगाना नहीं आता तो सब बाण व्यर्थ चले जायेंगे। अतः पहले निशाना साधना सीखो, फिर बाण चलाओ।
उसी प्रकार, एक बार आध्यात्मिक सिद्धांतों को भली-भाँति समझ लेने के पश्चात आप कितना भी धन क्यों न कमाओ, वह आफ व समाज के लिए हितकारी ही होगा। अतः पहले इन सिद्धांतों, नियमों का ज्ञान प्राप्त करो, तत्पश्चात समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करो।”

प्रश्न— सद्‌गरु, बुद्धि की तुलना में हृदय को ज़्यादा महत्व देते हैं। पर क्या बुद्धि ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है? बुद्धि के बिना लक्ष्य प्राप्ति कैसे होगी?

अम्मा— बुद्धि आवश्यक है। अम्मा ने यह कभी नहीं कहा कि बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जब एक भला कार्य करने का अवसर आता है, तब बुद्धि साथ नहीं देती। विवेक बुद्धि के बजाय, स्वार्थ आगे आ जाता है। हृदय और बुद्धि दो अलग चीज़ें नहीं है। जब तुममे विवेक बुद्धि होगी, तब स्वाभाविक तौर पर तुम अधिक उदार और विशाल हृदय होगे। उस विशालता से निश्छलता, सहयोगिता, विनम्रता और सहभागिता अपने आप पैदा होगी।

हृदय शब्द ही उदारता का, विशालता का सूचक है। हृदय शब्द से ही हमें सुखद कोमलता का अहसास होता है। परन्तु अधिकांश लोगों में, हम स्वार्थ बुद्धि ही पाते हैं, विवेकपूर्ण बुद्धि नहीं। वास्तव मे वह बुद्धि नहीं, अहंकार है। और जैसे जैसे अहंकार बढ़ता है, व्यक्ति संकुचित व स्वार्थी होता जाता है। सहभागिता की भावना लुप्त होती जाती है। अंततः इससे व्यक्ति व समाज का अहित होता है। हमें स्मरण रहना चाहिये कि उदारता एवं विशाल हृदय के बिना काम नहीं चल सकता, न आध्यात्मिक जीवन में और न ही संसार में।

बेटा, अम्मा तुमसे कुछ पूछना चाहती है। मानो कि तुम अपने परिवार में कुछ नियम लागू करना चाहते हो — कि ‘मेरी पत्नी को इस तरह रहना चाहिये, इस तरह बात करनी चाहिये, ऐसा व्यवहार करना चाहिये, क्योंकि वह मेरी पत्नी है।’ अगर तुम इन नियमों को लागू करने की ज़िद्द करोगे, तो क्या घर में शांति रहेगी? नहीं। इसी तरह मानो कि तुम ऑफिस से घर आते हो और किसी से बात किये बिना, सीधे अपने कमरे में जाकर ऑफिस का काम करने लगते हो, जैसे कि घर मे भी तुम ऑफिसर ही हो। तो क्या तुम्हारा परिवार खुश होगा? अगर तुम कहो कि, ‘मेरा तो यही तरीका है।’ तो क्या वे लोग मान जायेंगे? क्या घर मे शांति रहेगी?

और इसके बजाय, अगर तुम घर में घुसते ही पत्नी से भली प्रकार हालचाल पूछो और बच्चों के साथ कुछ समय बिताओ, अर्थात्‌ केवल स्वयं में सीमित न रहो और दूसरों को भी कुछ अपनापन दे सको, तो सभी ख़ुश होंगे। जब हम एक दूसरे की कमियाँ व दोष स्वीकार करेंगे और उन्हें क्षमा करेंगे, तभी घर में सुख शांति रहेगी। प्रेम के कारण ही तुम अपने जीवनसाथी की गलतियाँ नज़रअंदाज़ कर पाते हो। प्रिय व्यक्ति गलतियाँ करे तो भी तुम उससे प्रेम करते हो। इस मामले में क्या तुम दिल को ज़्यादा महत्व नहीं देते? क्या तुम दोनों को नहीं लगता कि हमारे दिल एक हैं? और इसी कारण तुम साथ—साथ जीवन बिता पाते हो। इसी दृष्टि को अम्मा ‘हृदय’ कहती है।

एक सूची बनाकर उसके अनुसार बच्चों पर नियम चलाना, क्या व्यावहारिक होगा? और क्या बच्चे इसे मानेंगे? नहीं! हमारे प्यार के कारण ही हम उनकी गलतियाँ सहन करते हैं और उनका पालन पोष्ण ठीक से करते हैं। यहाँ भी बुद्धि के बजाय, हृदय का ही ज़्यादा महत्व है — है ना? जब ऐसा होता है, तो बच्चों के साथ बिताया हर क्षण आनंददायक होता है। परिवार में जब लोगो के दिल, एक दूसरे के प्रति खुले होते हैं, तभी पारिवारिक जीवन में आनंद आता है। यदि बुद्धि को हृदय पर हावी होने दिया जाये तो जीवन में कोई आनंद शेष नहीं रह जायेगा। हम बु्द्धि का उपयोग बाज़ार या कार्यस्थल पर कर सकते हैं क्योंकि वहाँ इसकी ज़रूरत होती है। परन्तु परिवार में ऐसा नहीं चलेगा। कार्यालय में भी कुछ खुलापन और कुछ समझौता आवश्यक है, नहीं तो वहाँ भी केवल मनमुटाव और कड़वाहट ही रह जायेगी।

जब हम अपने जीवन में, हृदय को पहला स्थान देते हैं तो जीवन में एक लचीलापन, एक सहभागिता की दृष्टि पैदा हो जाती है। विवेक बुद्धि के साथ, खुलापन, सहभागिता व निभाने का भाव, स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। परंतु आज लोगों की बुद्धि बिल्कुल ही स्वार्थपरक एवं आत्मकेन्द्रित हो गई है एवं विवेक शक्ति सो गई है।

लोगों के जीवन में यह एक भारी कमी है। परस्पर सहयोग के बिना समाज का विकास संभव नहीं है। सहभागिता की भावना से समाज में शांति आती है। जैसे एक जंग खाई मशीन को चलाने के लिये, ग्रीस की ज़्ररूरत होती है, वैसे ही जीवन में उन्नति के लिये विनम्रता और सहभागिता ज़रूरी है। पर ये गुण हममें तभी पैदा होंगे जब हम हृदय का विकास करेंगे। ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जहाँ बुद्धि आवश्यक है, परन्तु इसे वहीं तक सीमित रखा जाना चाहिये। दूसरी और, जहाँ हृदय को प्राथमिकता देना ज़रूरी हो, वहाँ हमें चूकना नहीं चाहिये।

जब तुम एक मकान बनाते हो, तो नींव जितनी गहरी होगी, उतना ही अधिक ऊँचा मकान बना सकते हो। हमारे हृदय की विशालता और विनम्रता, हमारी उन्नति की नींव के समान है। जब हम जीवन में हृदय को प्राथमिकता देते हैं, हमारे भीतर विनम्रता और सहभागिता विकसित होती है। हमारे संबंध सकारात्मक और शांतिमय बन जाते हैं।

आध्यात्मिक लक्ष्य पाने के लिये, हृदय का विकास ज़रूरी है। विशाल हृदय वाले ही प्रभु को पा सकते हैं। आत्मा, तर्क और बुद्धि के परे है। कितनी ही शक्कर खाओ, पर तुम इसकी मिठास, उसे नहीं समझा सकते जिसने कभी शक्कर नहीं खाई हो। अनंत प्रकाश को शब्द परिभाषित नहीं कर सकते, एक फूल की सुगंध नापी नहीं जा सकती। इसी प्रकार आत्मज्ञान शब्दों से परे है— वह एक अनुभव है। बुद्धि के परे, हृदय में उतरे बिना, तुम आत्मज्ञान का स्वाद नहीं पा सकोगे।

एक गरीब किसान की कहानी है। वह अपनी झोंपड़ी के बाहर खड़ा था कि कुछ लोग वहाँ से गुज़रे। उसने पूछा तो ज्ञात हुआ कि वे भगवद्‌गीता पर तीन दिवसीय प्रवचन सुनने जा रहे हैं। किसान भी प्रवचन सुनना चाहता था, वह भी साथ हो लिया। जब वह स्थल पर पहुँचा, तो वहाँ भारी भीड़ थी।

वहाँ आने वाले लोग संपन्न थे, महंगे सुंदर वस्त्र धारण किये हुए थे। गरीब किसान के फटे पुराने वस्त्रों के कारण उसे सभागृह में प्रवेश नहीं मिला। उसने प्रार्थना की, ‘हे भगवान, मैं यहाँ आपकी कथा सुनने आया था, पर लोग मुझे अंदर नहीं जाने दे रहे हैं। क्या मैं इतना गया—बीता हूँ कि आपकी कथा सुनने योग्य भी नहीं हूँ? प्रभु आपकी यही इच्छा है तो यही सही। मैं बाहर बैठकर ही कथा सुनूँगा’। और वह एक आम के वृक्ष के नीचे बैठकर कथा सुनने लगा, जो स्पीकर के जरिये सुनाई दे रही थी। पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया, क्योंकि कथा संस्कृत में हो रही थी। किसान का दिल टूट गया। वह बोला— ‘हे भगवान मैं तो तुम्हारी भाषा भी नहीं समझ सकता। क्या मैं इतना पापी हूँ?’ उसी वक्त उसकी नज़र एक बड़े पोस्टर पर पड़ी जो हॉल के बाहर लगा हुआ था। चित्र में कृष्ण एक हाथ में रथकी लगाम थामे बैठे अर्जुन की ओर मुख करके, भगवत्‌गीता का उपदेश दे रहे थे। किसान एक टक प्रभु का मुख मंडल निहारता रहा। उसकी आँखों में आँसू भर आये। उसे पता ही नहीं चला, कि वह कब तक चित्र देखता रहा। जब प्रवचन समाप्त हुआ, लोग जाने लगे, तब वह भी घर लौट गया। दूसरे दिन वह फिर वहाँ आया — वह प्रभु का चेहरा भूल नहीं पा रहा था। उसे एक ही लगन थी कि वहाँ बैठा रहे और चित्र निहारता रहे। तीसरे दिन वह फिर आया और वृक्ष के नीचे बैठकर एकटक चित्र देखता रहा। उसकी आँखो से आँसु झरते रहे। उसे प्रभु का रूप अपने अंदर चमकता हुआ अनुभव हुआ। वह आँखे बंद किये हुए, प्रभु में लीन, आत्मविस्मरण अवस्था में बैठा रहा।

कथा समाप्त हो गई, भीड़ अपने घर चली गई। प्रवचन कर्ता विद्वान जब बाहर आये, तो किसान को निश्चल रूप से वृक्ष के नीचे बैठा हुआ देखा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। विद्वान आश्चर्य चकित हो गये! उन्होंने सोचा, ‘प्रवचन समाप्त होने के बाद भी यह व्यक्ति यहाँ क्यों बैठा हुआ है? क्या मेरे प्रवचन का इस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा?’ वह किसान के पास गया। किसान तब भी स्थिर व शांत बैठा था। उसके चेहरे से स्पष्ट था कि वह आनंदातिरेक की अवस्था में है। उसके आस—पास गहन शांति थी। विद्वान ने किसान को हिलाकर पूछा, ‘क्या तुम्हें मेरा प्रवचन इतना अच्छा लगा?’

किसान ने कहा— ‘नहीं, मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आया, मुझे संस्कृत नहीं आती। पर जब मैं भगवान की स्थिति पर विचार करता हूँ, तो मैं दुःख से भर जाता हूँ। क्या भगवान ने इतना सब कुछ, पीछे दे्खते हुए कहा? उनके तो कंधे दुःखने लगे होंगे। इसीलिये मैं रो रहा हूँ।’ कहते हैं जब किसान ने यह कहा— उसी क्षण उसे दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया। करुणामय हृदय और भोलेपन के कारण ही वह किसान, आत्मज्ञान का अधिकारी बना। किसान की बातें सुनते समय विद्वान की भी आंखें भर आर्इं, उसे ऐसी शांति अनुभव हुई, जो पहले कभी नहीं हुई थी।

प्रवचनकारी प्रकांड विद्वान थे, श्रोताग्ण भी काफी पढ़े लिेखे, परंतु वह निर्धन भोला किसान ही था, जो भक्ति की मधुरता का स्वाद पा सका। वह आत्मज्ञान पाने का अधिकारी था। वह निेःस्वार्थ करुणा का मूर्तरूप था। उसका दुःख अपने स्वयं के बारे में नहीं था, वरन्‌ उसे प्रभु का कष्ट अनुभव हो रहा था। लोग जब मंदिर जाते हैं तो वे प्रार्थंना में कहते हैं ‘प्रभु, मुझे यह दो, मुझे वह दो।’ परन्तु किसान की भावना इन बातों से परे थी। उसमें कोई अहंकार नहीं था। साधारणतया अहंकार से मुक्ति पाना बहुत कठिन होता है, पर सरल स्वभाव व भोलेपन में वह अपना पृथक व्यक्तित्व भूल गया। उसे पराभक्ति का अनुभव हुआ जो सर्वर्श्रेष्ठ अवस्था है। वह उसका अधिकारी था क्योंकि जब दूसरे अपनी बुध्धि से काम ले रहे थे, वह अपने हृदय की भावनाओं में डूबा हुआ था। फलस्वरूप वह निष्प्रयास, स्वतःस्फूर्त आनंदावस्था में लीनहो गया और उसके आस—पास शांति की तरंगें प्रवाहित होने लगीं। हमें भी अपने हृदय में ईश्वर को पाने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि वह वहीं शोभायमान हैं।

अम्मा का शब्द प्रवाह ધીमा हुआ व मौन के सागर में विलीन हो गया। उनकी आँखें जो आनंदाश्रु से भरी थी धीरे—धीरे बंद हो गई। करुणामय मुख, आँसुओं से नम हो रहा था । कुछ भक्त आस—पास बैठे थे। सब निस्तब्द्ध थे, मौन थे। मार्क, ध्यान में आँखे बंद किये हुए था। सभी अम्मा के आस—पास मौन होकर बैठ गये। उस दिव्य आनंद के वातावरण में विचार शांत हो गये— मन दिव्य शांति में लीन हो गये।