प्रश्न – मंदिरों में भोग चढ़ाने की जरूरत क्या है?

अम्मा – भगवान को हमसे किसी चीज की जरूरत नहीं है। समस्त सृष्टि के नाथ – उस त्रिलोकीनाथ को किस चीज की कमी है? सूरज को मोमबत्ती की क्या आवश्यकता है?

वास्तविक चढ़ावा तो सही जीवन तत्त्व को जान समझकर, उसके अनुसार जीवन यापन करना है। आवश्यकता अनुसार  खाना, आवश्यकता अनुसार सोना, आवश्यकता अनुसार बोलना, दूसरों को ठेस पहुचाने वाले शब्द न बोलना, बेकार समय व्यर्थ न करना, बुजुर्गों की सेवा करना, उनसे मीठे शब्द कहना, बच्चों को पढाई में मदद करना, कोई खास काम न हो तो कोई व्यवसाय सीख कर घर पर ही कर्म करना और उससे जो पैसे बनें उससे गरीबों की सेवा करना – यह सब ईश्वर से प्रार्थना करना है, सभी ईश्वर आराधना ही है।

 

विचार, वाणी और कर्म में सही ज्ञान के समावेश से हमारा जीवन ही पूजा बन जाता है। यही वास्तविक चढ़ावा है। किन्तु शास्त्रों का सही अध्ययन न करने के कारण हम इन बातों को ठीक से समझ नहीं पाते। आज सनातन धर्म को सही अर्थ में समझने के अवसर भी कम मिलते हैं।

आज मंदिर अनेक हैं। उनके माध्यम से अनेक लोगों को रोजी रोटी भी मिलती है। परन्तु इसके साथ-साथ लोगों को अध्यात्म का ज्ञान भी देने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि ऐसा हो पाता तो लोगों को बहुत फायदा होता। आज समाज में इसकी कमी का स्पष्ट अहसास हो रहा है।

चाहे किसी भी ध्येय से हो, ईश्वर से रोते हुए प्रार्थना करना अच्छा ही है। वह हमें भलाई की ओर ले चलेगी। बच्चा अपने पिता को ‘बप्पू’ पुकारे या ‘पापू’ पिता उसका जवाब देंगे। पिता जानते हैं कि बच्चा ठीक उच्चारण न जानने के कारण ऐसा पुकारता है। ईश्वर केवल तुम्हारे हृदय को देखते हैं। वे हृदय से उमडती प्रार्थना से मुँह मोड नहीं सकते।

चढ़ावा शब्द सुनने पर हमारे मन में खीर आदि का भोग चढ़ाने की बात उभर आती है। इस विषय में शायद कुछ लोग प्रश्न करें कि जब इतने गरीब लोग भूखे रहते हैं तो ईश्वर को खीर क्यों चढ़ायी जाय? हमने तो किसी देवता को खीर पीते नहीं देखा है। अन्ततः खीर हमीं लोग पीते हैं। मंदिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद हम आपस में बाँटकर खाते हैं। तब आस-पास रहनेवाले गरीब बच्चों को खीर पीने को मिलती है। उनके मन का प्रसाद, उनकी प्रसन्नता ईश्वर की प्रसन्नता के रूप में हम तक पहुँचती है। यद्यपि खीर हमें प्रिय है, उसे अकेले खाये बिना दूसरों के साथ बाँटकर खाने से हमारा मन विशाल होता है। उस विशालता से ही वास्तविक आनन्द की प्राप्ति होती है। वही ईश्वर का आशीर्वाद है।

हम जो कुछ भी करते हैं वह ईश्वर की कृपा पाने के लिये ही करते हैं। अतएव हम जो कुछ भी करें वह प्रभु को समर्पित करते हुए करना चाहिये। किसान खेत में बीज बोने से पहले प्रार्थना करता है। उसके बाद ही वह बोता है। इसका कारण यह है कि पुरुषार्थ की अपनी सीमा होती है। कर्म पूरा करने व उसके फल की प्राप्ति के लिये ईश्वर कृपा का होना अनिवार्य है। धान के बीज बोने के बाद, उसके अंकुरित होकर, उगने, पकने के बाद, फसल के समय यदि बाढ आ जाय तो सब कुछ ध्वस्त हो जायेगा। हम जो भी कर्म करें वह ईश्वर कृपा से ही पूर्ण होता है। इसलिये हर वस्तु को प्रभु को चढ़ाने के बाद ही उसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति – पूर्वजों की दी गई संस्कृति है। भोजन करते समय भी पहला कौर प्रभु को चढ़ाना चाहिये। यह समर्पण और बँटवारे की प्रवृत्ति है। हम उसके जरिये यह ज्ञान कार्यान्वित करते हैं कि जीवन को केवल अपने लिये न मानकर दूसरों के साथ बाँटें। मन जिसमें बंधा रहता है उसे समर्पित करने की प्रविधि भी इसमें शामिल है।

यदि हम देखें कि आज हमारा मन किससे अधिक बंधा है तो यह स्पष्ट होगा कि वह नब्बे प्रतिशत धन से बंधा हुआ है। पैतृक संपत्ति के बंटवारे के समय यदि हमारे हिस्से में अगर नारियल के दस पेड कम हो जायें तो हम अपनी माँ को तक कचहरी में खडा करने में संकोच नहीं करेंगे। एक कन्या से ब्याह करते समय उसकी पारिवारिक हैसियत ही नहीं, आर्थिक स्थिति का भी जरूर पता लगा लेते हैं। विरले ही लोग इसका अपवाद होंगे। अर्थात मन केवल संपत्ति में ही बंधा रहता है। इस मन को ऐसे बंधन से मुक्त कराना आसान बात नहीं है। किन्तु उसका सरल मार्ग ईश्वर में सब कुछ अर्पित करना है। यदि हम अपने मन को ईश्वर में अर्पित करें तो वह पवित्र हो जायेगा। इस समर्पण के अंग के रूप में ही भगवान को प्रिय वस्तु चढ़ाते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण को खीर प्रिय है। वस्तुतः कृष्ण शब्द अपने में मधुर है। प्रेम नामक माधुर्य से मधुर। किन्तु हमें खीर प्रिय है। पर हमेशा प्रभु को खीर चढ़ाने के कारण हम तो उलटे यह समझ बैठे हैं कि प्रभु को खीर प्रिय है। असल में वह हमारी प्रिय वस्तु भगवान को चढ़ाने की प्रविधि है। भगवान प्रेम हैं। प्रभु हमारे हृदय के खीर – उस प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।

एक भक्त सेव, अंगूर और विविध मिठाइयों के ढेर खरीदकर पूजा भवन में रखने के बाद प्रभु से निवेदन करता है, “हे प्रभु! देखिये मैं आफ लिये क्या-क्या लाया हूँ – सेव, अंगूर, मिठाई – आप को खुशी हुई ना?”

तुरन्त आकाशवाणी सुनाई पडी, “मुझे इन सब से प्रसन्नता नहीं होती।”

“तो भगवन्, बताइये कि आपको संतोष देने वाली वस्तु क्या है। मैं वह खरीद लाऊँगा।” वह व्यक्ति बोला।

“मैं तो मानस पुष्प से ही तृप्त होऊँगा। वही मुझे प्रिय है।” भगवान ने उत्तर दिया।

“मानस पुष्प? यह पुष्प कहाँ मिलता है?” उस व्यक्ति ने पूछा।

“तुम्हारे ही पडोस में।”

भक्त तुरन्त उस पुष्प की खोज में भागा दौडा गया। परन्तु उसके पडोस में कोई भी इस मानस पुष्प के बारे में कुछ नहीं जानता था। वह इस पुष्प की खोज में गाँव के घर-घर गया। परन्तु सभी जगह से उसे वही उत्तर मिला, “हमने न तो ऐसे पुष्प को देखा है और न ही कहीं उसके बारे में सुना है।”

थका माँदा, भक्त अपने घर लौटा। पूजा कक्ष में लौटकर उसने भगवान से कहा, “प्रभु! क्षमा करें। मैं पूरे गाँव में खोजता फिरा परन्तु आपका बताया हुआ मानस पुष्प कहीं नहीं मिला। अब तो मैं अपना हृदय ही आपको अर्पित करता हूँ।”

“वही फूल मैंने माँगा था – वही मानसपुष्प है। तुमने पहले जितनी भी चीजें चढ़ाईं वे तो मेरी ही शक्ति से उत्पन्न हुई हैं। मेरी शक्ति के बिना तुम अपना हाथ तक नहीं उठा सकते। संसार में सभी कुछ मेरी सृष्टि है। परन्तु तुमने भी एक चीज की सृष्टि की है – ‘मैं’ का भाव। वही मुझे चढ़ाना चाहिये। तुम्हारा निश्छल हृदय ही मेरे लिये सबसे प्रिय पुष्प है।” यह था प्रभु का उत्तर।

इसपर शायद बच्चे पूछें कि प्रभु को पुष्प चढाने की क्या आवश्यकता है। वह केवल परंपरागत आचार नहीं है। उसमें व्यावहारिकता भी है। ईश्वर को फूल चढाने के लिये लोग पौधे लगाते हैं। पौधा लगाना व उसका पालन पोषण उनका व्यवसाय बन गया है। फूल तोडनेवालों को उपजीविका मिलती है। फूल का निर्यात करनेवालों को जीविका का साधन मिलता है। आगे फूल बेचनेवालों को रोजी-रोटी मिलती है। फूल चढाने वाले को संतोष होता है। आज खिलकर कल झडनेवाला फूल कितने ही लोगों की कमाई का साधन बन गया। उसे खरीदकर प्रभु के चरणों में चढाने वाले को खुशी मिलती है। हमें हर चीज की व्यावहारिकता देखनी चाहिये। कोई शायद ऐसा सोचे कि कपडे का शाल फूलमाला से बेहतर है। वह भी अच्छा है। परन्तु वह मुर्झाता नहीं है। फूल तो एक ही दिन में मुर्झा जाता है। बार-बार नये फूलों की आवश्यकता पडती है।

हम अपने सबसे प्रिय व्यक्ति की सभी बातों का अनुसरण करते हैं। प्रेयसी कहती है, “अगर मुझसे प्यार है तो सिगरेट पीना छोड दो।” हार्दिक प्रेम करनेवाला हो तो धूम्रपान छोड देगा। वही प्रेम है। उलटे उस के अमल करने पर विचार करने लगे तो वहाँ प्रेम का अभाव है। मैंने कई लोगों को ऐसी बुरी आदतों को छोडते देखा है। “मेरा शराब पीना उसे पसन्द नहीं था, तो छोड दिया।” “मेरे इस फैशन के कपडे पहनना उसे पसन्द नहीं है, तो अब मैं वैसे कपडे नहीं पहनती।” इसपर कोई प्रश्न उठा सकता है कि क्या यह कमजोरी नहीं है? प्यार में वह कतई कमजोरी नहीं है। यदि प्रेम के बीच में तर्क पड गया तो वहाँ प्रेम का आस्वादन नहीं हो सकता। प्रेम में सिर्फ प्रेम होता है। उसमें तर्क की कोई जगह नहीं है।

जो ईश्वर के तत्वों को ग्रहण करते हैं उनमें भी ईश्वरीय गुण विकसित होते हैं। अम्मा ने स्वयं यह यहाँ देखा है। यहाँ के देहाती लोग जब शबरीमला जाते हैं, तब सभी आगतों को खाना खिलाते हैं। सिर पर जब इरुमुडिकेट्टु’ (भाँड) रखते समय सभी बच्चों को कुछ पैसे देते हैं। गरीबों को भरपेट आहार व बच्चों को मिठाई के पैसे देने से हमें भी संतोष मिलता है। हम दूसरों के प्रति जो करुणा प्रकट करते हैं वही ईश्वरकृपा के रूप में हमें वापस मिलती है।

मंदिर में हुंडी में भेंट चढाना भी इस ईश्वर प्रेम का प्रतीक है। वह कतय रिश्वत नहीं है। अपने प्रिय जनों को भेंट देना, हमारे उनके प्रति प्रेम का प्रकटन है। जब प्रेम प्रकट होता है तो वह करुणा का रूप ले लेता है। वह संसार के प्रति करुणा बनता है। जिनके हृदय में दूसरों के प्रति करुणा है उन्हीं पर ईश्वर की कृपा होती है।

इसी तरह जो ईश्वर को दिल से प्रेम करते हैं वे स्वयं बुरी आदतें छोड देते हैं। वे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो प्रभु को प्रिय न हो। अगर उनसे गलती हो भी जाये तो वे उसे न दुहराने का ध्यान रखेंगे। बुरी आदतों में व्यय होने वाले पैसों को बचाकर वे उससे गरीबों की सेवा करेंगे। गरीबों के प्रति करुणा ही ईश्वर की यथार्थ पूजा है।

वे दिखावा और ऐशोआराम छोड देंगे और इससे जो पैसे बचते हैं उससे गरीबों की सेवा करेंगे। वे केवल जरूरत के अनुसार ही चीजों का उपयुक्त उपयोग करेंगे। वे अमित धनराशि बटोरने की लालसा को छोड देंगे। औरों की धन-संपत्ति को हडपकर स्ववश करने का ख्याल छोड देंगे। इस तरह समाज में ताल-लय बना रहेगा।

हमें दिमागी कसरत की नहीं वरन् व्यावहारिक समझ की आवश्यकता है। उसी से लोगों को लाभ होगा। बच्चों को झूट बोलने से रोकने के लिये उन्हें बताया जाता है कि झूट बोलोगे तो अंधे हो जाओगे। अगर यह बात सच होती तो आज संसार में सभी अंधे होते। बुद्धि यही दृष्टिकोण अपनायेगी परन्तु जब हम यह बात छोटे बच्चों से कहते हैं तो वे डर के मारे झूट बोलने से कतरायेंगे, झूट नहीं बोलेंगे।

अगर कोई टी.वी. देखने में डूबा हुआ है, उसका मजा ले रहा है और हम उससे कहें कि आओ, हम तुम्हें स्वर्ग लोक ले चलते हैं तो वह तो कहेगा कि अभी मेरे पास समय नहीं है, सीरियल समाप्त होने पर उस पर विचार करूँगा। परन्तु यदि तुम कहो, ‘भागो, अपनी जान बचाओ, तुम्हारे घर में आग लग गई है,’ तो वह तत्क्षण सब कुछ छोड कर उठ भागेगा। उसी प्रकार हमारे पूर्व वचन बच्चों को भलाई के पथ पर ले चलते हैं। यहाँ तर्क या युक्ति पर जोर देने से कोई प्रयोजन नहीं है। वह उक्ति व्यावहारिक है। यद्यपि कई व्यवहार अनाचार जैसे दीखते हैं तो भी ध्यान से हम उनका विश्लेषण करें तो पायेंगे कि उनसे लोगों को कईं प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। हमारा मन संकुचित, विवेकहीन व बचकाना है। ये सब उसे सही रास्ते पर लाने व आगे बढने में मदद देंगे। दूध पीते बच्चे को गोश्त खिलायें तो वह नहीं पचेगा। उस बच्चे को उचित हल्का भोजन खिलाना चाहिये। इसी प्रकार हर व्यक्ति के स्तर पर जाकर उसे बातें समझानी चाहिये। यही कारण है कि सनातन धर्म की कुछ बातें लोगों को अटपटी व विकृत प्रतीत हो सकती हैं। मगर हम उसका विश्लेषण कर देखें तो उन सभी बातों में व्यावहारिकता पायेंगे। यह कहना गलत नहीं होगा कि व्यावहारिकता सनातन धर्म की नींव है।

तत्त्व को समझकर हमें ईश्वर भजन करना चाहिए। भिन्न देवी-देवताओं के पृथक अस्तित्व में विश्वास न रखते हुए हमें सभी भिन्न देवरूपों को उस परम सत्ता के भिन्न रूप या पक्ष मानना चाहिए। प्रेमपूर्वक ईश्वर भजन करना चाहिए। वे हमारे मन की सभी इच्छाओं को जानते हैं। तब भी उनके सम्मुख अपने हृदय की भावनाओं को प्रकट करने में कोई गलती नहीं है। परन्तु हममें यह बोध भी होना चाहिए कि वह केवल एक शुरुवात मात्र है। क्रमेण निष्काम भाव से ईश्वराराधना करना सीखना चाहिए। जब भक्ति केवल भक्ति के लिए हो तो उससे ही हमें सब कुछ मिल जाता है – भौतिक पुरोगति व आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होगी। केवल निष्कलंक प्रेम-भक्ति से ही ईश्वर साक्षात्कार संभव हैं।

 

आज मंदिरों में जाने वालों की संख्या बढ गई है। परन्तु उसके अनुरूप संस्कारों में वृद्धि हो रही है, ऐसा कहना कुछ कठिन है। इसका कारण यह है कि आज मंदिरों में हमारे संस्कार का ज्ञान देने की व्यवस्था ना के बराबर है। अतः लोग आज मंदिरों को केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति की एक उपाधि मानते हैं। आज मंदिरों में जानेवाले जब श्रीविग्रह के सामने अंजलि बाँधे, आँखें बन्द करके खडे होते हैं तो उनके मानस चक्षु में ईश्वर नहीं वरन् उनकी इच्छाओं की ही झलक मिलती हैं। अम्मा यह नहीं कहती की मन में इच्छा नहीं होनी चाहिए। परन्तु मन में इच्छाओं की भरमार हो तो हम शान्ति की अनुभूति नहीं कर सकते। कई लोग तो मंदिरों में इसलिए जाते हैं कि वे सोचते हैं कि यदि वे ईश्वर भजन न करें, ईश्वर को तृप्त न करें तो उनके जीवन में कठिनाईयाँ उठेंगी, दुरित होंगे। सभी प्रकार हमारी रक्षा करने वाले एक ईश्वर ही हैं। सही ईश्वर आराधना से सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।

आज मंदिर में उपासना तत्त्वज्ञान विहीन, खोखला अनुकरण मात्र बन गया है। बेटा पिता के साथ मंदिर गया। पिता ने मंदिर की प्रदक्षिणा की तो बेटे ने भी वैसा ही किया। बेटा अपने पिता के इन सभी आचारों का अनुकरण करता ही बडा हुआ। बाद में बेटा अपने बेटे के साथ मंदिर गया। जो कुछ पहले गुजरी थी उसका पुनरावर्तन हुआ। परन्तु यदि प्रश्न उठे कि यह सब क्यों किया जा रहा है तो उसका उत्तर कोई नहीं जानता। आज मंदिरों में ऐसी व्यवस्था भी नहीं है कि लोगों की आवश्यकता को समझकर उन्हें आवश्यक ज्ञान दिया जाए।

एक व्यक्ति नित्य नियमित रूप से अपने परिवार के पूजागृह में कुलदेवता की पूजा किया करता था। एक दिन सब साज सज्जा करने के उपरान्त, जब वे पूजा के लिए बैठे तो उनकी बिल्ली ने आकर चढ़ाने के लिए रखा दूध पी लिया। अगले दिन सब तैयारी करने के बाद उस व्यक्ति ने बिल्ली को पकडकर एक टोकरी के नीचे बन्द कर दिया। पूजा के समाप्त होने पर ही उसे मुक्त किया। यह सत्य है कि उस बिल्ली में भी ईश्वर का वास है परन्तु सगुणाराधना में बाह्य शुद्धि प्रधान है। बाह्य शुद्धि ही हमें आन्तरिक शुद्धि तक ले जाती है। पूजा से पूर्व बिल्ली को टोकरी के नीचे बन्द करना एक दैनिक क्रिया बन गई। कई दिन बीत गए। एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई। पूजा का दायित्व पुत्र पर आया। पूजा से पूर्व बिल्ली को टोकरी के नीचे रखने की क्रिया को बेटे ने भी जारी रखा। एक दिन पूजा से पूर्व जब बिल्ली को ढूँढने लगे तो बिल्ली दिखी नहीं। तब ही उन्हें ज्ञात हुआ कि बिल्ली मर गई है। उन्होंने समय नहीं गँवाया। तुरन्त पडोस के घर से बिल्ली ले आए और फिर उसे टोकरी के नीचे बन्द करने के बाद पूजा आरंभ की।

बेटे ने इस बात को जानने की कोशिश ही नहीं की कि पिताजी बिल्ली को टोकरी के नीचे बन्द क्यों किया करते थे। जो पिताजी किया करते थे बेटे ने उसका ही अंधा अनुकरण किया। इसका कारण यह था कि वह उसपर स्वयं सोचने के लिए तैयार नहीं था। आज अधिकांश लोग इस प्रकार ही आचारों का अनुष्ठान करते हैं। उसके आन्तरिक तत्त्व को समझने का श्रम नहीं करते। जो पूर्वजों ने किया था, उसका उसी तरह, बिना समझे अनुकरण करते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए। हम जिस किसी धर्म के हों हमें धर्माचारों के आन्तरिक तत्त्वों को समझना चाहिए। वैसा होने पर अनाचारों का अस्तित्व बना नहीं रह सकेगा। और यदि अनाचार हों तो भी उन्हें हटाया जा सकेगा।

आध्यात्मिकता के बारे में, मंदिर में उपासना में निहित तत्त्वों के बारे में आम जनता को जानकारी देने की व्यवस्था मंदिरों से संलग्न होकर ही दी जानी चाहिए। मंदिर मानव मन में संस्कार को द्योतित करते केन्द्र बनें। ऐसा होने पर ही हम अपनी स्वर्णिम विरासत को पुनः प्राप्त कर पाएँगे।

कईयों के लिए ईश्वर आराधना पार्ट-टाईम कार्य होता है, अंशकालिक कार्य होता है। हमें अंशकालिक भक्ति की नहीं वरन् पूर्णकालिक भक्ति की आवश्यकता है। किसी इच्छा की पूर्ति के लिए की जाने वाली प्रार्थना पार्ट टाईम भक्ति है। ‘भक्ति के लिए भक्ति’ की आवश्यकता है। केवल ईश्वर प्रेम की ही इच्छा रखनी चाहिए और उसी के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। सदैव ईश्वर स्मरण करना चाहिए। सभी में उनका दर्शन करना चाहिए। प्रार्थना करने की शक्ति भी वे ही प्रदान करते हैं। यदि उनकी शक्ति न होती तो हम अपना हाथ तक उठा न पाते, एक उँगली तक को हिला न पाते। यह निरन्तर बोध – कि वे ही सभी कुछ करा रहे हैं – यही फुल टाईम भक्ति है। इसके माध्यम से शरीरमनोबुद्धि में अधिष्ठित ‘मैं’ भाव को छोडकर हम सर्वव्यापी चैतन्य बन पायेंगे।

 

कालीदास ने मंदिर के भीतर प्रवेश किया और उन्होंने किवाड बन्द कर दिया। देवी ने आकर द्वार पर दस्तक दिया। परन्तु द्वार नहीं खुले। “भीतर कौन है?”, देवी ने पूछा। तुरन्त भीतर से एक प्रतिप्रश्न उठा, “बाहर कौन है?” पुनः प्रश्न, “भीतर कौन है?” उसका प्रत्युत्तर, “बाहर कौन है?” अन्ततः देवी ने उत्तर दिया, “बाहर काली है।” तब भीतर से पहले प्रश्न के उत्तर में, “भीतर दास है।” इतना प्रश्न करने पर भी मैं अमुक व्यक्ति हूँ ऐसा नहीं कहा, नाम नहीं बताया। ‘बाहर काली’ कहे जाने पर ही भीतर ‘दास’ कहा। उसी क्षण पूर्ण दर्शन भी प्राप्त हुए। ‘मैं’ के अन्त होने पर केवल ‘तुम’ रह जाता है। ‘मैं’ से जुडा संकुचित व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। केवल भगवद् इच्छा ही रह जाती है; यह बोध की वे ही कर्ता-धर्ता हैं, ही वास्तविक भक्ति है। उससे सब कुछ मिल जाता है, पाने को कुछ बाकी नहीं रह जाता।

हमारी आँखं की ज्योत तक ईश्वरप्रदत्त है। दस रूपये से खरीदे जाने वाले हमारे दीप की ज्योत की उन्हें आवश्यकता नहीं है। ईश्वर को हमसे कुछ पाना नहीं है। ईश्वर का आश्रय ग्रहण करने से हमें ही लाभ है। ईश्वर को चढ़ावा चढ़ाना समर्पण का प्रतीक है। उससे हममें समर्पण भाव का विकास होता है। यही नहीं, तिल के तेल या घी का दीप जलाने पर उससे उठता धुँवा अंतरिक्ष को शुद्ध करता है। इसके विपरीत यह भाव नहीं होना चाहिये कि हम अपना कार्य साधने के लिये ईश्वर को चढ़ावे के रूप में रिश्वत दे रहे हैं।

बीज जितना भी उत्तम हो यदि वह हाथ में ही पडा रहे तो अंकुरित नहीं होगा। उसे मिट्टी में बोने पर ही वह अंकुरित होता है। बीज को मिट्टी के सम्मुख झुकना पडता है। इस समर्पण भाव के जागरण पर ही फल की प्राप्ति होगी। इसी प्रकार ‘मैं और मेरी इच्छाओं की पूर्ति’ के भाव को छोडकर, सब कुछ उन्हीं का है, उनकी इच्छा के अनुसार जो हो सो हो – इस भाव का विकास करना चाहिए। इस समर्पण भाव से ही भक्ति पूर्ण होगी।

समर्पण की बात करने पर कुछ लोग सोचेंगे कि ईश्वर को कुछ अर्पित करने से ही फलप्राप्ति होगी। हमें समर्पण को इस अर्थ में नहीं लेना चाहिए। हम अभी शरीर, मन व बुद्धि के तल पर ही हैं। मैं शरीर हूँ। मैं अमुक व्यक्तियों का पुत्र या पुत्री हूँ। मेरा नाम अमुक है। ऐसे हमने इस ‘मैं’ के साथ जो कुछ जोड रखा है उन सब का ही अर्पण होना चाहिए। अहंकार – केवल वही हमारी सृष्टि है! उसका ही त्याग करना है। उसी का उनमें समर्पण करना है। उसके समर्पण के बाद जो शेष है वह ईश्वरसृष्टि ही होगी। हम ईश्वर के अधरों से लगे हुए मुरली बन जाएँगे, नादोद्घोष करते शंख हो जाएँगे। अनंत में उडान भरने के लिए हमारे व्यक्तित्व को त्यागना मात्र ही पर्याप्त है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ को त्यागने पर व्यक्ति नहीं रह जाता, केवल समष्टि रह जाती है।

बीज को हाथ में रखे रहने पर वह अंकुरित नहीं होता, उसे चट्टान पर डालने पर भी वह अंकुरित नहीं होता, उसे उर्वरक मिट्टी में ही बोना पडता है; उसी प्रकार हमारे किसी भी कर्म का सही लाभ पाने के लिए अहंकार को त्यागना होगा। समर्पण भाव का जागरण होना चाहिए। तब उनकी कृपा से सब कुछ स्वयमेव सिद्ध हो जाएगा।

ईश्वर में हमें अपने मन का समर्पण करना चाहिए। मन कोई वस्तु नहीं है कि हम उसे उठाकर ईश्वर में अर्पित कर दें। इसीलिए मन जिस किसी विषय-वस्तु में बंधा है, उसका समर्पण मन के समर्पण के तुल्य है। कुछ लोगों को खीर पसन्द है। वे उसका भोग लगाते हैं। उसका दस गरीब बच्चों में प्रसाद रूप में वितरण होता है – तो यह भी उसका एक प्रयोजन हुआ। मन सर्वाधिक संपत्ति से बंधा है। उससे मुक्ति पाने के लिए पैसा चढ़ावे के रूप में चढ़ाया जाता है।

हम मंदिरों में जाकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। वास्तव में उनके चरणों में हमारे हृदय प्रसूनों को अर्पित करना चाहिए। जब हम हमारे हृदय को ही उनके चरणों में अर्पित कर देते हैं तो वह भक्ति हुई, वास्तविक समर्पण। उसके प्रतीकरूप में हम पुष्प अर्पित करते हैं। मन दुःखों के भार से पीडत है, तो ईश्वर से अपने दुःखों के बयान करने में कोई गलती नहीं है। अपने हृदय के भावों को ईश्वर से बाँट सकते हैं। हमारे भार को उनके सम्मुख हम उतार कर रख सकते हैं। परन्तु हमारी प्रार्थना भक्ति के लिए हो। केवल उससे ही पूर्ण फल की प्राप्ति संभव है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि सब कुछ बताने से ही ईश्वर जान सकेंगे।

वकील और डॉक्टर से सब कुछ खुलकर बोलना पडता है। तभी वकील सही वकालत और डॉक्टर रोग को जान-समझकर उसका उपचार कर सकते है। परन्तु ईश्वर को कुछ न कहने पर भी वे सब कुछ जानते हैं, वे सर्वज्ञ हैं। प्रार्थना, ईश्वरप्रेम को पाने के लिए हो। जब हमारी प्रार्थना केवल ईश्वर के लिए ही होती है तो हमारे पूछे बिना ही ईश्वर हमारी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि हम उनसे एक हो जाएँ। वैसा करने पर उनकी कृपा सहज रूप से ही हममें प्रवाहित हो जाएगी, हम ईश्वरीय गुणों से आपूरित हो जाएँगे।

मंदिर में प्रवेश करने पर मन को पूरी तरह ईश्वर में ही केन्द्रित रखने का श्रम करना चाहिए। मौन मंत्रजप करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिए। दर्शन करने के पश्चात् अंजलि बाँधे, आँखे बन्द कर खडे होते हुए एकाग्रता से उस रूप को अपने भीतर देखना चाहिए, ध्यान करना चाहिए। मंदिर में जाकर केवल बाह्य तौर पर दर्शन पाना पर्याप्त नहीं है। प्रतिदिन कुछ समय ईश्वरध्यान के लिए हटाकर रखना चाहिए। यथासंभव मंत्रजप करना चाहिए। इससे शक्ति का संचय होता है। कई उपनदियों में बहते जल को समाहित किया जाए, एक कर दिया जाए तो वह एक विशाल प्रवाह का रूप धारण कर लेगी, उसमें अपार शक्ति होगी। उससे विद्युत शक्ति का उत्पादन हो सकता है। उसी तरह कई विचारों के रूप में मन की शक्ति का भी व्यय हो रहा है। उसे एक ही विचार में एकाग्र कर लें तो वह एक महत् शक्ति बन जाएगी। यदि साधारण व्यक्ति की उपमा एक बिजली के खम्भे से की जाए तो तपस्वी की तुलना ट्रान्सफार्मर से की जा सकती है।

प्रश्न – क्या आप बता सकती हैं कि विग्रह आराधना का आरंभ कैसे हुआ?

अम्मा – सत्ययुग में असुर चक्रवर्ती हिरण्यकशिपु के प्रश्न के उत्तर में जब प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “इस स्तंभ में भी ईश्वर विराजमान हैं”,  तो उस स्तंभ से ईश्वर नरसिह रूप में प्रकट हुए। सर्वव्यापी ईश्वर इस प्रकार प्रह्लाद के संकल्प से स्तंभ से प्रकट हुए – इसे मूर्ति प्रतिष्ठा का प्रथम दृष्टान्त कहा जा सकता है। प्रह्लाद की कथा तो प्रसिद्ध है। असुरराज हिरण्यकशिपु ने त्रिलोकों को अपने वश में करने व कभी भी मृत्यु का ग्रास न बनने के लिए ब्रह्माजी की तपस्या की। हिरण्यकशिपु की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने उनसे पूछा कि वे क्या वर चाहते हैं तो असुरराज बोले, “मेरी मृत्यु न आकाश में हो न भूमि पर। न कमरे के भीतर हो न ही कमरे के बाहर हो। मेरी मृत्यु न दिन में हो न रात में। मेरी मृत्यु न स्त्री के हाथों हो न पुरुष के; मृत्यु ने देवों के हाथ हो, न असुरों के; न मनुष्य के द्वारा हो न पशुओं के। शस्त्रों से मेरी मृत्यु न हो।” ब्रह्माजी “तथास्तु!” कहकर, उसे वर प्रदान करके अंतर्धान हो गए।

हिरण्यकशिपु जब तपस के लिए बैठे थे उस अंतराल में अन्य एक घटना घटित हुई। हिरण्यकशिपु को तपस लीन जानकर उनके अभाव में देवों ने असुरों पर वार किया और उन्हें परास्त कर दिया। देवेन्द्र हिरण्यकशिपु की गर्भिणी पत्नी को बंधी बनाकर ले गए। बीच रास्ते ही उनकी मुलाकात नारद महर्षि से हुई जिनके उपदेशानुसार देवेन्द्र हिरण्यकशिपु की पत्नी को महर्षि के आश्रम में छोड कर स्वयं देवलोक चले गये। गर्भवती ‘कयाध’ को नारद महर्षि ने भागवत् तत्त्व से अवगत कराया। माता के गर्भ में शिशु ने भी इन सभी उपदेशों का श्रवण किया।

हिरण्यकशिपु तपस के पूर्ण होने पर लौटे और उन्होंने देवों को पराजित किया। नारद महर्षि के आश्रम में वास करती अपनी पत्नी को पुनः राजमहल ले आए। वर के बल से अहंकार में अंधे हिरण्यकशिपु ने त्रिलोकों पर आक्रमण कर दिया और उन्होंने उनपर विजय भी पा ली। उन्होंने देवों को अपना दास बनाया; वे ऋषि-मुनियों व भगवद् भक्तों को तंग करने लगे, याग यज्ञों को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे। उन्होंने आदेश दिया कि आगे ‘हिरण्याय नमः’ के अलावा अन्य किसी मंत्र का उच्चारण न हो। उन्हीं की पूजा की जाए, अन्य किसी की नहीं।

यथासमय उनकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। बच्चे का नाम प्रह्लाद रखा गया। चूँकि उसे नारद महर्षि के उपदेशों का स्मरण था प्रह्लाद विष्णु भक्त बन गया। उपनयन के बाद पिता ने प्रह्लाद को गुरुकुल भेजा। कुछ समय बाद पिता को यह जानने की उत्सुकता हुई की उनके बेटे ने गुरुकुल में क्या सीखा है। उन्होंने प्रह्लाद को राजमहल बुलवाया। प्रह्लाद से पिता ने पूछा, “तुम ने गुरुकुल में क्या सीखा?” प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “श्रवणम्, कीर्तनम्, स्मरणम्, पादसेवनम्, अर्चनम्, वंदनम्, दास्यम्, सख्यम्, आत्मनिवेदनम् – इन नवविध भक्तिमार्गों से भगवान की उपासना की जा सकती है।” अपने पुत्र के ही मुख से अपने परम शत्रु विष्णु की पूजा की जानी चाहिए, आराधना की जानी चाहिए, सुनकर हिरण्यकशिपु अतिक्रुद्ध हो गये। क्रोध के आवेग में उन्होंने सिपाईयों को आज्ञा दी कि वे प्रह्लाद को मार डालें। बहुविध प्रयासों के बाद भी सिपाई प्रह्लाद को मार न सके। निराश हुए हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र के मन से ईश्वर भक्ति को मिटा देने के विचार से उसे पुनः गुरुकुल भेजा। परन्तु वहाँ प्रह्लाद के उपदेशें से प्रभावित हो कर अन्य असुर बालक भी भगवद् भक्त बनने लगे। अत्यंत कुपित होकर हिरण्यकशिपु बोले, “मैं त्रिलोकों का नाथ हूँ। मेरे सिवा कोई अन्य ईश्वर है तो वह कहाँ है?” “ईश्वर सर्वव्यापी हैं। वे सर्वत्र विराजमान हैं,” प्रह्लाद ने उत्तर दिया। “तो क्या वे इस स्तंभ में भी हैं?” हिरण्यकशिपु गरज उठे। “हाँ, इस स्तंभ में भी भगवान का वास है,” प्रह्लाद बोला। पुत्र के उत्तर को सुन हिरण्यकशिपु ने मुट्टी बनाकर जोर से स्तंभ पर प्रहार किया। स्तंभ में दरार पड गयी। उसके भीतर से अर्ध सिह, अर्ध मानव रूप में नरसिहमूर्ति का उग्ररूप प्रकट हुआ। संध्या समय था। भगवान ने राजदरबार की देहली पर बैठकर हिरण्यकशिपु को अपने गोद में उठा लिया, और नाखूनों से उसके सीने को चीर कर उसका वध किया। निष्कलंक भक्त प्रह्लाद के मुख से निकले वचन सत्य सिद्ध हुए। इसे विग्रहाराधना का आरंभ कहा जा सकता है। एक साधारण शिलास्तंभ में ईश्वर की उपस्थिति पर विश्वास! जब वह विश्वास दृढ हुआ तो वह अनुभव में परिणत हुआ। हमें इस कथा के सार को ग्रहण करना चाहिए। सर्वशक्तिमान ईश्वर कोई भी रूप धारण कर सकते हैं। वे सगुण या निर्गुण भाव अपना सकते हैं। खारे पानी से नमक निकाला जा सकता है और नमक पुनः पानी में लीन हो सकता है।

यह घटना मानव की सीमाओं को भी दर्शाती है। संसार के सर्वाधिक शक्तिमान, अतिबुद्धिशाली व्यक्ति की बुद्धि के दायरे के पार है ईश्वर की बुद्धि। मानव बुद्धि की सीमाएँ हैं। ईश्वर असीम हैं। हिरण्यकशिपु ने तो बहुत सोच-विचारकर मृत्यु से सभी प्रकार सुरक्षित रहने के लिए ही ब्रह्माजी से वर माँगा था। जब उन्हें वर प्राप्ति हुई तो उन्होंने ठान लिया कि त्रिलोकों में उनका मुकाबला करने के काबिल कोई नहीं है। परन्तु हिरण्यकशिपु एक बात में चूक गए, वे ईश्वर को नहीं समझ पाये। सभी समस्याओं का समाधान उनके पास है। न दिन न रात का समय – संध्या समय; न आकाश में, न भूमी पर – अपनी गोद में लेटाया; न भीतर न बाहर – देहली पर; न मानव न पशु – नरसिह; निरायुध – अपने नाखूनों से वध किया। इस प्रकार ब्रह्माजी के वर का किसी भी प्रकार उल्लंघन किए बिना नरसिह मूर्ति भगवान ने अधर्मी हिरण्यकशिपु का वध किया। ईश्वर मानव बुद्धि से परे हैं। उन्हें जानने का केवल एक ही मार्ग है, स्वयं अपने आप को उनमें पूर्ण अर्पित करना – पूर्ण शरणागति। मानव में अहंकारजन्य बुद्धि व विवेक बुद्धि होते हैं। विवेक बुद्धि स्पष्टदर्शी है, मालिन्य रहित बुद्धि है। वह दर्पण की तरह है। उसमें ईश्वर का स्पष्ट प्रतिबिम्ब होता है। जो अपनी बुद्धि को ईश्वर में समर्पित करते हैं केवल वे ही बुद्धि की सीमाओं को भेद पाते हैं, लाँघ पाते हैं।