“मैं देह हूँ” – एक असत भावना है। देह को जीवन प्रदान करने वाला है वो चेतन तत्व जो हमारा असली स्वरूप है। उदाहरण के लिए, जब तक पीटर नामक एक व्यक्ति जीवित है तब तक उसे गली में से गुज़रते देख कर लोग कहते हैं, “वो देखो पीटर जा रहा है।” किन्तु जब वे पीटर के शव को श्मशान ले जाते हुए देखते हैं तब कोई ऐसा कहता है क्या? नहीं। तब वे कहते हैं, “वो देखो,पीटर का शव जा रहा है।” क्यों? क्योंकि भीतर रहने वाला चेतन तत्व, जो देह को जीवित बनाता है, अब उसमें प्रकट नहीं हो रहा।

दुर्भाग्यवश, हम अपने जीवन का आधार इस असत भावना को मानते हैं कि, “मैं देह हूँ।” उसके बाद, हमारा जीवन तथा जीवन शैली इस असत की आधारशिला पर निर्मित होते हैं। इस प्रकार हम, इस असत भावों की श्रृंखला में, अपने असली स्वरूप को भूल ही जाते हैं। यदि आरम्भ ही गलत होगा तो फिर हम कुछ भी करें, लक्ष्य-प्राप्ति नहीं हो सकेगी। “मैं देह हूँ” – इस असत के कारण हमने सत्य को पूर्णरूपेण भुला दिया है कि “मैं आत्मा हूँ।” यह कहना कठिन होगा कि यह अज्ञान की श्रृंखला कब और कहाँ शुरू हुई, हाँ इसका अन्त तब होगा जब हम आत्मबोध को प्राप्त होंगे।

यहाँ अम्मा को एक कथा याद आ गई। एक बार एक नवयुवक संभावित वधू को देखने उसके घर गया। लड़की के पिता बहुत धनवान थे और क्योंकि लड़का कुछ घबराया सा था अतः मनोबल बढ़ाने के लिए एक मित्र को साथ ले गया था। लड़की देखने तथा लड़की के पिता के साथ कॉफ़ी, नाश्ता करने के बाद, उन दोनों ने बातचीत शुरू की।

पिता ने पूछा, “काम कैसा चल रहा है?”
युवक ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, “अरे, छोटा-मोटा व्यापार है। कोई दिक्कत नहीं। आराम से चल रहा है।”
जिस मित्र को वह विश्वास बढ़ाने हेतु साथ लाया था, वो बीच में बोंल पड़ा, “क्या कह रहे हो? अरे श्रीमान, आज इनकी 27 दुकानें हैं और दूसरे जिलों में और भी खोलने वाले हैं। यह तो इनकी विनम्रता है कि यह ऐसा कह रहे हैं।”
तब लड़की के पिता ने पूछा, “तुम रहते कहाँ हो?”
नवयुवक बोला, “मेरा छोटा सा अपना घर है। ”
मित्र फिर से बीच में बोंल पड़ा, “श्रीमान, यह तो इनकी विनम्रता है। शहर में सबसे बड़ा बंगला इन्हीं का है। इनके दो-तीन और घर भी निर्माणाधीन हैं।”
कारों की बात चली तो लड़की के पिता ने प्रश्न किया कि, “अभी तुम्हारे पास कौन सी कार है?”
युवक ने उत्तर दिया, “छोटी सी कार है जो मैं यदा-कदा ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल करता हूँ।”
एक बार फिर, मित्र ने टोका, “श्रीमान,आज इन के पास तीन कारें हैं। तीन और विदेशी कारें खरीदने वाले हैं!”
अचानक नवयुवक खाँसने लगा तो लड़की के पिता ने पूछा, “क्यों बेटा, तुम्हें सर्दी हुई है क्या?”
युवक ने उत्तर दिया, “कुछ नहीं, दो-तीन दिन से कुछ मौसम बदलने के कारण…।”
मित्र बोला, “मौसम के कारण? क्या कह रहे हो? श्रीमान जी, इन्हें तो टी.बी. है!”
अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि विवाह की बातचीत कहाँ संपन्न हुई होगी। इसी प्रकार की हमारी यह समस्या है। हम असत को जीते आ रहे हैं।

हमारे ऋषियों ने जीवन की तुलना एक बुलबुले से की है। वस्तुतः, यह जीवन नहीं अपितु अहम् हैं, अहम् के साथ हमारा तादात्म्य है जिसकी तुलना बुलबुले से की जानी चाहिए। अनन्त काल की प्रतीक्षा के पश्चात् हमें यह मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ है, इसे हमें यूँ ही बुलबुला फूट जाने के समान व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। जीवन भर, हमें सभी कर्म कुछ इस प्रकार करने चाहियें मानो एक शांतिपूर्ण मृत्यु की तैयारी चल रही हो। जन्म और मृत्यु हमारे लिए परमात्मा की देन हैं।

बच्चो, हमें इस जन्म में कोई गलत कदम नहीं उठाना। जन्म और मृत्यु हमारी चेतना के क्षेत्र के परे की वस्तु हैं। अतः, इस छोटे से जीवन काल में, सावधान रह कर, हमें सत्कर्म करने चाहियें। हमारा वर्तमान मिथ्याबोध है शरीरम् सत्यम् आत्मा मिथ्या – “शरीर सत्य और आत्मा मिथ्या है।” आत्मा का हमें विस्मरण हो गया है। बच्चो, आत्मा, सत्य को हमें कभी भूलना नहीं चाहिए। न भूलने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है!

अम्मा के मन में कुछ चल रहा है। प्रकृति एक विशाल बगिया है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे एवं लोग इस बगिया के विविध रंगों के पूर्ण-विकसित फ़ूल हैं। इस फुलवारी का सौन्दर्य तभी पूर्ण होता है जब ये सब एक होकर रहें, प्रेम तथा एकता की तरंगें फैलाएं। ईश्वर करें कि हम सबके मन प्रेम में भीग कर एक हो जाएँ! आइये, हम मिल-जुल कर इन विविध फ़ूलों को मुरझाने से बचाने का कार्य करें ताकि यह फुलवारी नित्य-सुन्दर बनी रहे!

करुणा को विकसित करने के लिए सर्वप्रथम महत्व की बात है कि जिन वस्तुओं को हम निर्जीव समझते हैं जैसे; पत्थर, रेत, चट्टानें तथा लकड़ी आदि – उन सबके प्रति हमारे मन में प्रेम व आदर की भावना हो। यदि हम निर्जीव वस्तुओं के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति अनुभव कर सकते हंं तो वृक्षों, लताओं, पशु-पक्षियों तथा सागर, नदियों, पर्वतों व शेष सारी प्रकृति के प्रति भी प्रेम व करुणा जैसे भावों को विकसित करना सुगम हो जाता है। यदि हम इस पड़ाव तक पहुँच जाएँ तो सम्पूर्ण मानव-जाति तक करुणा-भाव के विकास की यात्रा स्वतः हो जाएगी।

क्या हमें कुर्सी तथा चट्टानों को धन्यवाद नहीं देना चाहिए जो हमें बैठने के लिए, विश्राम करने के लिए स्थान प्रदान करते हैं? धरती माता के प्रति आभारी नहीं होना चाहिए जो धैर्यपूर्वक हमें अपनी गोद में भागने, खेलने-कूदने के लिए आश्रय देती है? उन पक्षियों का कृतज्ञ नहीं होना चाहिए जो हमारे लिए गाते हैं, उन फ़ूलों का जो हमारे लिए खिलते हैं, उन वृक्षों का जो हमें छाया देते हैं तथा उन नदियों का जो कल-कल करती हमारे लिए बहती हैं? हर सुबह एक नव-सूर्योदय हमारा स्वागत करता है। रात को जब हम सब कुछ भुला कर सो जाते हैं तब हमारे साथ कुछ भी हो सकता है, हमारी मृत्यु भी सम्भव है। क्या हम उस अद्भुत शक्ति का धन्यवाद करते हैं जिसने हमें अगले दिन सुबह उठ कर पूर्ववत ही सब कार्य करने योग्य बनाये रखा, हमारे देह व मन को सभी प्रतिकूलताओं से बचा कर रखा? यदि हम इस प्रकार से देखें तो क्या हमें प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति के प्रति आभारी नहीं होना चाहिए? केवल करूणामय लोग ही आभार प्रकट कर सकते हैं।

मनुष्य द्वारा प्रेरित युद्ध एवं मृत्यु का कोई अन्त नहीं और न ही ऐसी त्रासदियों के पीड़ितों द्वारा बहाए गए आंसुओं का। ये सब आखिर किसलिए? विजय-पताका फ़हराने, अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने तथा अपनी धन व प्रतिष्ठा के लोभ के लिए ही तो! मनुष्य जाति अनेकों प्रकार से अभिशप्त है और इन श्रापों से मुक्ति पाने के लिए कम से कम आगामी सौ पीढ़ियों को दीन-दुखियों के आँसू पोंछ कर उन्हें ढाढस बंधा कर उनका दुःख कम करना चाहिए। कम से कम अब तो, प्रायश्चित के तौर पर ही सही, क्या हमें आत्मनिरीक्षण नहीं करना चाहिए?

किसी सत्ता-लोलुप, स्व-केन्द्रित, स्वार्थी राजनेता को दुनियाँ पर विजय पा कर या लोगों को सता कर सुख-शान्ति की प्राप्ति नहीं हुई। इतिहास साक्षी है-उनकी मृत्यु तथा उसके पूर्व का समय भी जीते-जी नरक-तुल्य ही था। हमें इस अनमोल अवसर को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हुए शान्ति व करुणा के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।

जिसके पास दौलत, अस्त्र-शस्त्र तथा ज्ञान-विज्ञान है, वह युद्ध आरम्भ कर सकता है। किन्तु कोई भी प्रेम तथा हार्दिक एकता को परास्त नहीं कर सकता। कदाचित, हमारे अंतःकरण, आँखें, कान व हाथ दूसरों के दुःख-दर्द को सचमुच समझ पाते, महसूस कर पाते! कितनी आत्महत्याओं को घटने से बचाया जा सकता था? कितने लोगों को भोजन, वस्त्र तथा आवास प्राप्त हो सकता था? कितने बच्चों को अनाथ होने से बचाया जा सकता था? कितनी ही महिलाओं को आजीविका हेतु देह के व्यापार को गले लगाने से रोका जा सकता था? कितने असह्य पीड़ा से ग्रस्त अस्वस्थ लोगों को दवा दे कर इलाज किया जा सकता था? धन-संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाले कितने ही झगड़ों को टाला जा सकता था?

जानते हो, एक सच्चे साहसी नेता होने के लिए कौन से गुण वांछनीय होते हैं? वो हैं – करुणा व मैत्री। आज हम विश्व भर में दृष्टि दौडाएं तो दौलत तथा शस्त्र हाथ में हों तो कोई भी युद्ध का बिगुल बजा देगा परन्तु कोई भी करुणा, मैत्री के बल पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मेरे बच्चों को यह कभी न भूले। निर्जीव वस्तुओं के साथ सम्मानपूर्वक पेश आयें तो हम प्रेम व करुणा पर आधारित एक नई भाषा का निर्माण कर सकते हैं। शनैः-शनैः हम अपने आस-पास के लोगों का आदर करने लगेंगे। इस प्रकार हम धीरे-धीरे एक नवयुग का निर्माण कर सकते हैं – एक सुख-शान्तिपूर्ण विश्व का! हम सबको ऐसे ही विश्व के निर्माण में संलग्न होना चाहिए!

हममें से अधिकतर लोग क्या भूत के विलाप और भविष्य की चिन्ता में ही जीवन नहीं बिता देते? लगभग सभी वर्तमान क्षण के सुख से वंचित रह जाते हैं। हम जीवन के सौन्दर्य व आनन्द को भूल जाते हैं। यह सब हमारी मनःस्थिति के कारण होता है। हमें एक दरजी जैसा होना चाहिए। यहाँ अम्मा का अभिप्राय यह नहीं कि हमें आजीविका के लिए कपड़े सीना शुरू कर देना चाहिए। हम जितनी बार दरजी के पास जाते हैं, वह हर बार कपड़ों की सिलाई से पहले हमारा नया नाप लेता है। चाहे उसकी डायरी में पिछले महीने ही नाप लिखा गया हो, फिर भी वह दोबारा नाप लेता है ताकि जांच ले कि हमारी बाँहें छोटी-बड़ी तो नहीं हुईं अथवा हमारी लम्बाई आदि बढ़ तो नहीं गई। वह हमारे पुराने नाप पर भरोसा नहीं करता, अपितु वर्तमान नाप के अनुसार ही कपड़े सीता है। बच्चो, तुम्हारा भी दृष्टिकोण ऐसा ही होना चाहिए। हमारे पास केवल यही क्षण है। इसमें अपने पूर्वनिर्धारित मतों के साथ प्रवेश न करो। जब हम भूतकाल पर विलाप करते हुए अथवा भविष्य की चिंता में जीते हैं तो वर्तमान क्षण के सौन्दर्य की अनुभूति से चूक जाते हैं।

 

तुमने उन दो अजनबियों की कहानी तो सुनी होगी जिनकी भेंट रेलगाड़ी में होती है। एक यात्री ने पास बैठे व्यक्ति से समय पूछा। उसे समय बताने की बजाय, इस व्यक्ति ने उसे कोसना और गालियाँ देना शुरू कर दिया। उस व्यक्ति को बार-बार गालियाँ खाते हुए देख कर, आख़िरकार डिब्बे में सवार एक अन्य व्यक्ति से रहा न गया और वह बोला, “ऐ! तुम क्यों उस बेचारे पर इस तरह बरस रहे हो? उसने तुमसे समय ही तो पूछा है।”

उस व्यक्ति ने अपने गाली-गलौज को तनिक विराम देते हुए कहा, “हाँ, अभी तो इन्होंने समय ही पूछा है। मान लो मैं समय बता देता हूँ, उसके बाद ये मुझसे मौसम पर चर्चा करने लगेंगे। फिर वर्तमान घटनाओं पर चर्चा होगी, फिर मेरे पसन्द/नापसंद के बारे में। फिर ये मुझे अपनी काम-काजी संभावनाओं से अवगत करायेंगे। और फिर मैं इन्हें पसन्द करने लगूंगा, अपने घर आमन्त्रित करूंगा। मेरी एक बहुत सुन्दर बेटी है जो मेरी सारी संपत्ति की मालिक है। इनकी मीठी, लच्छेदार बातों में आ कर वो आकर्षित हो जाएगी। तब ये मुझसे उसका हाथ मांगेंगे। फिर मैं अपनी बेटी की शादी इस आदमी से करने के लिए बाध्य हो जाऊँगा जिसके पास एक घड़ी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं!” एक सांस में वो यह सब कह गया!

देखो, उसका मन कहाँ-कहाँ गया! अपने सह-यात्री को ले कर उसने क्या-क्या सोच डाला! उसने खिड़की से बाहर, गुज़रते हुए सुन्दर दृश्य को नहीं देखा, यात्रा की सुन्दरता के आनन्द से चूक गया। मेरे बच्चों के मन ऐसे नहीं होने चाहियें। विश्व भर में हमारा मन सबसे बड़ा यात्री है। मन को संयमित करने के लिए कुछ प्रयत्न आवश्यक है। मन की शांति भंग करने वाली वस्तुओं से स्वयं को हटाने के लिए कुछ प्रयत्न तो करना ही होगा। हमने लोगों को कहते हुए सुना ही होगा, “मेरा बेटा बहुत मेधावी है; लेकिन उसका पढने को मन ही नहीं करता।” मेधावी होने से क्या लाभ यदि हम उस बुद्धि का उपयोग ही न करें तो? केवल बुद्धिमान होना पर्याप्त नहीं; सीखने की इच्छा भी तो होनी चाहिए। प्रयत्न तो वांछित है और यह इच्छा अपने भीतर उपजनी चाहिए।

कुछ लोग आ कर मुझसे कहते हैं कि, “अम्मा, हम प्रार्थना करते हैं, नियमित रूप से मंदिरों में जाते हैं फिर भी कितने दुखों, निराशाओं को झेलते हैं। और हमारा पड़ोसी, जो सदा भगवान् की हंसी उड़ाता है, बड़ा समृद्ध भाग्यवान है। हमारा तो भगवान् से विश्वास उठने लगा है।”

बच्चो, ऐसा नहीं बोलना चाहिए। ऐसी विषमताओं को देख कर हमें न तो हवा में उड़ना चाहिए और न ही कागज़ की किश्तियों जैसे डूब जाना चाहिए। लिखते समय, हम एक वाक्य के बाद विराम-चिन्ह क्यों लगाते हैं? ताकि नया वाक्य शुरू कर सकें। हमारा जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए। पीड़ा के समय भगवान् को कस कर पकड़े रहें। और इससे भी बढ़ कर, जीवन का अन्त करने का प्रयास तो कभी नहीं करना चाहिए। भटकता मन हमें बहुत कुछ कहेगा। पर कठिन समय के चलते हमारा मन टूट कर बिखर न जाए। मन को सम्भालो।

काल का पहिया घूमता रहता है। प्रारब्ध कितने ही रूपों में हमारे सामने आता है। परिवर्तन कभी शीघ्र आता है तो कभी देरी से। इसलिए कठिनाइयों के कारण जीवन का अन्त करने का विकल्प कभी अपने मन में न लायें। कठिन समय को प्रार्थना बदल सकती है। प्रार्थना के माध्यम को पकड़े रखो। हर समस्या का समाधान होता है। कुछ रोगों का इलाज दवा से होता है, कुछ को ओपरेशन की ज़रूरत होती है। ऐसा ही कठिनाईयों को ले कर भी होता है। अतः परमात्मा को कस कर पकड़े रखो। इसके लिए, प्रयत्न करना होगा। कुछ अच्छा पाने के लिए, प्रयत्न की सदैव आवश्यकता होती है, जबकि चिंता या निराशा में डूबने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता।

हमें चाहिए – समय, प्रयत्न तथा परमात्मा की कृपा। यदि हम गुलाब के पौधे लगायें तो हमें इसे पानी और खाद से सींचना चाहिए। सही समय पर लगने पर भी फलने-फूलने के लिए इसे कुछ समय चाहिए। तब तक, भारी बारिश भी इसके लिए जानलेवा हो सकती है। अतः प्रयत्न के साथ-साथ परमात्मा की कृपा भी आवश्यक है। और फिर, हमारे पुरुषार्थ का फ़ल भी तत्काल तो नहीं प्राप्त होता, समय से ही होता है। किन्तु अम्मा अपने बच्चों को एक बात कहेगी – परमात्मा की कृपा हो तो मेरे बच्चों के प्रयासों से वांछित परिणाम निश्चित ही प्राप्त होंगे।

अम्मा के विदेशी भक्त, युद्ध के कभी न समाप्त होने वाले भीषण आक्रमणों पर, प्रायः अपनी कुण्ठा व्यक्त करते हैं। वे अम्मा से पूछते हैं, “क्या इस पागलपन का कोई अन्त नहीं है?”

जगत् के आदि से ले कर संघर्ष चला आ रहा है। यह कहना कि इसे पूर्णतया समाप्त कर देना असंभव है, व्यग्रता को जन्म देता है। किन्तु सत्य तो यही है, है ना? क्योंकि जगत् में भले और बुरे का द्वंद्व सदा रहेगा। हमारे भले की स्वीकृति व बुराई के त्याग के संघर्ष में इस सम्भावना का पूर्णरूपेण समापन असम्भवप्राय हो जाता है। लगभग सभी देशों में यह संघर्ष आंतरिक विवादों, युद्ध तथा हड़तालों के रूप में उभर कर सामने आता है। यद्यपि अधिकांश युद्धों का उद्देश्य निजी-हितों की रक्षा होता है परन्तु यदा-कदा ऐसी परिस्थितियाँ भी रहीं जब जन-सामान्य की आवश्यकताओं तथा हित पर भी विचार किया गया और अधिक लाभ प्राप्त हुआ।

दुर्भाग्यवश, मनुष्य ने अधिकांश युद्ध सत्य व न्याय की पुष्टि हेतु नहीं अपितु स्वार्थ से प्रेरित होकर लड़े हैं। लगभग 5000 वर्ष पूर्व, भारतीय सम्राट, मौर्य वंश के प्रवर्तक, चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य तक सभी भारतीय युद्धों में सत्य तथा धर्म की मुख्य भूमिका रही। उस समय भी शत्रु को पराजित करना, आवश्यक हो तो उसका विनाश भी करना, युद्ध का भाग हुआ करते थे। परन्तु युद्ध के दौरान युद्धक्षेत्र पर स्पष्ट नियम हुआ करते थे।

उदाहरण के लिए, पैदल सेना को पैदल सैनिकों से ही युद्ध करना होता था तथा घुड़सवारों को घुड़सवारों से। हाथी पर चढ़े अथवा रथी योद्धा अपने समकक्ष योद्धाओं के साथ ही युद्ध करते थे। ऐसे ही नियम गदा, तलवार, भाले-धारियों तथा धनुष-बाण- धारी योद्धाओं पर लागू होते। सैनिकों को घायल, निहत्थे सैनिकों व स्त्रियों, बालकों, बूढ़ों तथा रोगियों पर आक्रमण करने की अनुमति नहीं हुआ करती थी। युद्ध का आरम्भ प्रातःकाल, शंखनाद के साथ होता और ठीक सूर्यास्त के समय विराम हो जाता और दोनों पक्षों के सैनिक परस्पर शत्रुता को भुला कर मित्रों की भाँति इकट्ठे भोजन करते। अगले दिन, फिर से सूर्योदय के साथ युद्ध पुनः आरंभ होता। कभी-कभी विजेता राजा युद्ध में जीता हुआ पराजित राजा का राज्य तथा धन उस पराजित राजा अथवा उसके उत्तराधिकारी को लौटा देते। युद्धों में भी ऐसी महान परम्परा थी, जिसमें युद्धभूमि पर तथा उसके बाहर भी शत्रु के प्रति भी सम्मान व उदारता का भाव होता था। शत्रु-राज्य के नागरिकों की भावनाओं एवं संस्कृति का भी सम्मान किया जाता था। ऐसे साहसी थे उस समय के लोग!

आजकल आतंकवादी हमलों की रोकथाम हेतु एअरपोर्ट तथा अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में कड़े सुरक्षा नियम लागू किये जाते हैं। हमारी शारीरिक सुरक्षा के लिए ये नियम आवश्यक हैं परन्तु यह कोई समाधान तो नहीं। वस्तुतः एक ऐसी विस्फोटक पदार्थ है जोकि सबसे घातक है और किसी मशीन द्वारा उसका पता नहीं लगाया जा सकता – वो है मानव-मन में भरी घृणा और बदले की भावना। जब तक हम अपने मन से इन घातक भावनाओं का निर्मूलन नहीं करेंगे, तब तक युद्ध और हिंसा का अन्त नहीं हो सकता।

आजकल, युद्ध में शत्रु-देश को हर सम्भव दृष्टि से नष्ट किया जाता है। विजेता परास्त देश की भूमि, प्राकृतिक-संसाधनों तथा धन-संपत्ति पर एकाधिकार स्थापित कर, लूटपाट करते हैं व अपने मौज-मज़े के लिए प्रयोग करते हैं। जो संस्कृति, परम्परा पीढ़ियों से विरासत में प्राप्त हुई थी, उसका समूल नाश कर दिया जाता है, भोले-भाले लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। इसके अतिरिक्त, बमों तथा अन्य शस्त्रों द्वारा भारी मात्रा में छोड़े गए विषाक्त धुंए द्वारा जलवायु व मिट्टी के प्रदूषण की तो हम थाह भी नहीं पा सकते। परिणामस्वरूप कितनी आगामी पीढ़ियों को शारीरिक व मानसिक दुःख सहने पड़ते हैं। युद्ध के पश्चात् कुछ शेष बचता है तो केवल मौत, गरीबी, भुखमरी व महामारी। युद्ध के मानवता को यही उपहार हैं।

आज कुछ आर्थिक दृष्टि से संपन्न देश मात्र इसीलिये युद्ध को भड़काते हैं ताकि उनके आधुनिकतम शस्त्रों के विक्रय में वृद्धि हो। हम जो कुछ करें, भले वो युद्ध ही हो, उसका लक्ष्य सत्य एवं धर्म की रक्षा ही होना चाहिए। अम्मा यह नहीं कहना चाहती कि युद्ध अटल हैं। देखा जाए तो किसी भी काल में युद्ध अनिवार्य नहीं होता। परन्तु जब तक मानव के मन में द्वंद्व जारी है तब तक क्या हम बाह्य जगत् से युद्ध का पूर्णतः उन्मूलन कर पाएंगे? यह सोचने जैसी बात है।

आज विश्व में अनेकों द्वंद्वों का एक मुख्य कारण है – विज्ञान व धर्म में अलगाव। वास्तव में, विज्ञान तथा धर्म को कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ना चाहिए। विज्ञान के बिना धर्म और धर्म के बिना विज्ञान अधूरे हैं। विज्ञान की सहायता से हमें मनुष्य के मन से घृणा एवं बदले की भावना को पूर्णरूपेण उखाड़ फेंकना चाहिए। सब धर्मों का सार प्रेम ही है। वैज्ञानिक उत्कर्ष का लक्ष्य समाज का उत्थान होना चाहिए। हमें इतिहास से शिक्षा लेनी चाहिए किन्तु वहीं रुक नहीं जाना चाहिए। विज्ञान तथा अध्यात्म के मिलन द्वारा हम भूतकाल के अंधकारमय गलियारों से बाहर, शान्ति, एकता तथा मैत्री के प्रकाश में आ पहुंचेंगे।

बच्चो, हम सबको इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

ऋषि-मुनियों की पावन धरा भारत की विश्व को यह अनूठी वैचारिक देन है – गुरु। परन्तु हमारी पाश्चात्य देशों की नक़ल का परिणाम है कि आज बहुत से बच्चे इस विषय पर भ्रम को उत्पन्न कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने हाल ही में अम्मा से पूछा, “गुरु के शरणागत होना तो दुर्बल मन का लक्षण है ना?”

बच्चो, आजकल अनेकों प्रकार के छाते उपलब्ध हैं। बटन से खुलने वाला छाता तो तुमने देखा ही होगा? इसी भाँति, गुरु को नमस्कार करने से हमारा मन समष्टि मन बन सकता है। ऐसी आज्ञाकारिता एवं विनम्रता को दौर्बल्य नहीं कहा जा सकता। जल-शोधक फ़िल्टर की भाँति ही गुरु भी हमारा मन शुद्ध करते हैं। हमारे अहम् का नाश हो जाता है। आज हम प्रत्येक स्थिति में अहंकार के दास बन रहे हैं। हम विवेक से काम नहीं लेते। हमारी प्रत्येक भौतिक उपलब्धि हमारे अहम् को थोड़ा और मोटा कर देती है, जबकि वास्तव में होना यह चाहिए कि सफ़लता के चलते हम अधिक विनम्र बने न कि अधिक अहंकारी। परन्तु जब हम अपने ही अहम् के दास बन जाते हैं तो विवेक सहित आगे बढ़ना असम्भवप्राय हो जाता है।

एक दिन एक घर में एक चोर घुस आया। परन्तु घर के सदस्य अभी जाग रहे थे और उन्हें चोर के भीतर आने की भनक लग गई। उन्होंने हल्ला मचा दिया और चोर नौ दो ग्यारह हो गया। शीघ्र ही एक बड़ी भीड़ उसके पीछे भाग रही थी और चिल्ला रही थी, “चोर, चोर, रुको, रुको!” परन्तु चोर बड़ा चालाक था। वह चुपके से भीड़ में से खिसक गया और उन्हीं के साथ भागता हुआ चिल्लाने लगा, “चोर, चोर, रुको, रुको!” हमारा अहम् भी ऐसा ही मक्कार, छलिया है। हर स्थिति में से यह चुपचाप खिसक जाता है। जब हमें परमात्मा अपने अहम् से निजात पाने का अवसर भी देता है तो हम उसका उपयोग अहम् को मोटा-ताज़ा करने में करते हैं। अहम् भीतर आ घुसता है। हम विनम्रता एवं सावधानी के साथ अहम् के निर्मूलन का प्रयास नहीं करते।

आज हमारे मन गमले में लगे पौधों जैसे हो गए हैं। गमले में लगे पौधे को यदि एक भी दिन पानी न दिया जाए तो यह मुरझाने लगता है। इसी भाँति, बिना अनुशासन तथा नियमों का पालन किये हम अपने मन पर संयम नहीं रख सकेंगे। जब तक हमारा मन पूर्णरूपेण संयमित न हो जाए, हमें आध्यात्मिक जीवन के विधि-निषेध का पालन करना ही चाहिए। गुरु के उपदेश, आदेशानुसार ही जीवन निर्वाह करना चाहिए। एक बार मन पूर्ण रूप से संयमित हो गया तो फिर कोई डर नहीं; हमारे मार्गदर्शन हेतु हमारे ही भीतर विवेक जागृत हो गया है।

एक बार एक व्यक्ति गुरु की खोज में निकला। उसे ऐसे गुरु की तलाश थी जो उसे उसकी वासनाओं के अनुसार जीने का परामर्श दे। किन्तु इसके लिए कोई न तैयार हुआ। जो नियम पालन करने को वे कहते, उन्हें यह नहीं कर सकता था। आखिर थक-हार कर उसने स्वयं को वन में पाया। वह परेशान हो कर बैठ गया और सोचने लगा कि, “ऐसा कोई समर्थ गुरु नहीं है जो मेरी इच्छानुसार मेरा मार्गदर्शन करे। मैं किसी का दास बनना नहीं चाहता। चलो, मैं जो कुछ भी करता हूँ क्या वो परमात्मा की करनी नहीं?” ज्यों ही उसके मन में यह विचार आया, एक ऊँट उसके सामने आ खडा हुआ और उसे देखने लगा। इस आदमी ने सोचा, “अरे, काश मैं इस ऊँट को ही अपना गुरु बना सकता तो बढ़िया होता!” ऊँट को संबोधित करते हुए वह बोला, “तुम मेरे गुरु बनोगे?” ऊँट ने सिर हिलाया।

अब उसने ऊँट को गुरु मान लिया।

अब उसने ऊँट से पूछा, “गुरु, तुम्हें घर ले चलूँ?” ऊँट ने फिर सिर हिला दिया। वह उस ऊँट को ले कर घर की ओर चल पड़ा। कुछ दिनों के बाद वह ऊँट के पास आ कर कहता है, “गुरु, मैं एक लड़की से प्रेम करता हूँ, उससे शादी कर लूँ?” ऊँट ने सिर हिला दिया।

फिर एक दिन वह बोला, “गुरुजी, मेरे बच्चे नहीं हैं, मेरे घर आँगन मे कुछ बच्चे खेलने लगे तो…?” ऊँट ने फिर सिर हिलाया। काल पा कर वह पिता बना तो पूछता है, “गुरुजी, मैं अपने मित्रों के साथ थोड़ा मदिरापान कर लूँ?” ऊँट ने सिर हिलाया।

दिन बीतते गए और उस व्यक्ति को शराबी बनते देर न लगी। उसका अपनी पत्नी के साथ झगड़ा होने लगा। एक दिन वह ऊँट के पास जा कर बोला, “मेरी पत्नी दिन-रात मुझसे झगड़ती रहती है। चाकू से उसकी हत्या कर दूँ?” ऊँट ने सिर हिला दिया और उस व्यक्ति ने चाकू मार कर पत्नी की हत्या कर डाली। पुलिस ने उसे कारागार में डाल दिया और उसने शेष जीवन वहीं बिताया।

बच्चो, यही होता है जब हम ऐसे गुरु का चयन करते हैं जो हमें मनमानी करने दे। अंततः हम स्वयं को अपने ही मन की जेल में कैद पाते हैं। परमात्मा ने हमें विवेक-शक्ति प्रदान की है जिसका सदुपयोग कर के हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकते हैं। हमें गुरु के उपदेशानुसार ही रहना चाहिए। वास्तव में गुरु शिष्य हेतु ही जीता है। केवल यह दोहराना ही पर्याप्त नहीं है, “अद्वैत ही सत्य है। ” अद्वैत ही जीवन है। यह तो एक अनुभूति है। इसे तो एक पूर्ण-विकसित फ़ूल की सहज-सुगंध की भाँति होना चाहिए। इसे सर्वदा याद रखना।