एक बार एक व्यक्ति ने एक धनाढ्य इलाके में एक आलीशान भवन किराये पर लिया। धीरे-धीरे उसे भ्रम हो गया कि वो राजा है और बहुत अहंकारी हो गया। एक दिन एक साधु उसके घर पर भिक्षा मांगने आया तो उसने बड़ा निन्दनीय व्यवहार किया। साधु ने कहा, “तुमने यह घर किराये पर ही तो लिया है और अपने आप को राजा समझने लगे हो। ज़रा सोचो और वास्तविकता के धरातल पर लौट आओ। वास्तव में, तुम्हारा कुछ भी नहीं; फिर भी व्यवहार यूँ करते हो मानो सब कुछ तुम्हारा है। कितनी दयनीय दशा है!”

आज हम सबकी यही हालत है। कुछ भी हमारा नहीं है; सब परमात्मा की ओर से भेंट-स्वरूप प्राप्त हुआ है। अनेकों ग्रन्थ पढ़ कर भी लोग समुद्र-किनारे बैठ कर कौओं की तरह काँव-काँव किया करते हैं। उनका जीवन के साथ तालमेल नहीं है, वे नहीं जानते कि कैसे जीना चाहिए। वे इस माया-जगत् में क्यों भटक रहे हैं?जिन्होंने शास्त्रों को ठीक से समझा है, वे क्या करते हैं? वे वाद-विवाद में समय व्यर्थ नहीं गँवाते;वे दूसरों को उपदेश देते हैं कि कैसे प्रगति पथ पर बढ़ें। वे लोगों को अपने मत पर आधारित लम्बे-लम्बे भाषण नहीं देते। वे बताते हैं की सब अपने-अपने चुने हुए आध्यात्मिक पथ पर, अपनी वासनाओं तथा मतानुसार आगे बढ़ें। इसीलिये हिन्दू धर्म में एक सत्य के अन्वेषण के लिए अनेकों मार्गों तथा साधनों को स्वीकृति दी गई और व्यवस्था भी की गई।
अम्मा के आश्रम में सेवा को महत्व दिया जाता है। यह अनेकों साधनाओं में से एक है। हमें प्रत्येक व्यक्ति के स्तर को देखते हुए, उनके उत्थान हेतु अनुकूल साधन बताने चाहियें। अद्वैत कोई रटने की वस्तु नहीं है, जीने की कला है-तभी हम सत्य का साक्षात्कार कर सकेंगे।

अम्मा के आश्रम में इंजीनियर, डॉक्टर, लेखक तथा स्कूलों एवं प्रिंटिंग-प्रेस में कार्यरत लोग हैं। उनमें बहुत से लोग उच्च शिक्षा-प्राप्त हैं। वे सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। इसके साथ-साथ वे ध्यान भी करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन भी करते हैं। वे अपने नियत-कर्मों को आसक्ति रहित हो कर करना सीखते हैं जोकि स्वार्थ तथा अहम् से मुक्ति पाने में बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। जब कर्म को आसक्ति-रहित हो कर किया जाता है तो यह बंधन का कारण नहीं बनता अपितु मुक्ति का हेतु बन जाता है।

अम्मा के आश्रम में कुछ लोग अगरबत्तियों को पैक करते हैं, तो दूसरी ओर कठिनतम चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भी हैं। यहाँ आने वाले कुछ दर्शनार्थी वेदान्ती होने का, ब्रह्म होने का दावा करते हैं। उनमें से एक ने प्रश्न किया कि, “अम्मा, एक आत्मा दूसरी आत्मा की सेवा कैसे कर सकती है?आश्रम में सेवा की क्या आवश्यकता है? क्या शास्त्र पर कक्षा पर्याप्त नहीं?”

बच्चो, प्राचीन काल में लोग परिवार का पालन-पोषण करने के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते और फिर संन्यासी हो जाते। किन्तु तब तक वे अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह कर चुके होते थे और जीवन के कुछ ही वर्ष शेष होते थे। फिर भी वे गुरु के आश्रम में रहते हुए नियत कर्म व सेवा करते थे। वेदान्ती विद्वान भी अपने वेदान्ती गुरु की पूर्ण श्रद्धा-भक्ति के साथ सेवा करते थे। वे बाहर जा कर ईंधन की लकड़ी ले कर आते, गौएँ चराते, धान के खेतों में मेढें बना कर उनकी बाढ़ से रक्षा करते। तुमने आरुणि की कथा नहीं सुनी?उसने गुरूजी के खेत में पानी को घुस आने से रोकने के लिए सब सम्भव प्रयत्न किये। आखिर अपने शरीर को ही बाँध के रूप में झोंक दिया। ये कथाएं दर्शाती हैं कि वेदान्ती लोग भी कभी निस्स्वार्थ कर्म को वेदान्त का विरोधी नहीं समझते थे। वे ऐसा कभी नहीं सोचते थे कि, “क्या यह कीचड़ नहीं?क्या यह पानी नहीं?क्या मैं आत्मा नहीं?”उस समय ऐसे शिष्य होते थे।

अम्मा को याद है, कैसे आश्रम के ब्रह्मचारी एवं संन्यासी लोग सुनामी-राहत-शिविरों में भोजन परोसा करते थे। अपनी भूख-प्यास तथा अन्य शारीरिक आवश्यकताओं को ताक पर रख कर, वे ज़रूरतमंदों की सेवा में समर्पित थे। इस प्रकार उन्होंने कितने लोगों को बचाया। आश्रमवासियों ने भी भूकम्प-पीड़ितों की इसी प्रकार सेवा की। इसका परिणाम यह हुआ कि जब इतने वर्षों बाद सुनामी आपदा आई तो इन आश्रमवासियों से प्रेरित गुजरात के भूकम्प-ग्रस्त इलाके के गाँवों से लोग सुनामी-पीड़ितों की सहायतार्थ दौड़ पड़े। उनके शब्द थे, “क्या हमारी ज़रुरत के समय अम्मा ने हमारी सहायता नहीं की थी? आज जब केरल में सुनामी आई है तो क्या हम चुपचाप खड़े हुए देखते रह जाएँ? “अम्मा बता नहीं सकती कि उस समय अम्मा उनके इस भाव से कितनी द्रवित हुई थी।

प्राचीन काल में, प्रायः गुरु के एक या दो शिष्य होते थे। परन्तु अम्मा के आश्रम में तो हजारों की संख्या में हैं। उन सबके लिए चौबीसों घंटे ध्यान में बैठना सम्भव है?कभी नहीं। विचार उन्हें बैठने नहीं देंगे। अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा सेवा-कार्य करते हुए, हमें अपने विचारों को सही दिशा देनी चाहिए। इस प्रकार हम समाज के लिए लाभकारी कार्य कर सकेंगे। वास्तव में हमारे आश्रम में बच्चों की स्वर्ग में कोई रुचि ही नहीं। 90% लोग समाज-सेवा ही करना चाहते हैं। उन्हें स्वर्ग भेंट में भी दिया जाए तो वे उसे ‘अलविदा’ कह कर ठुकरा देंगे। क्योंकि स्वर्ग तो उनके हृदय में है, अन्य किसी स्वर्ग में जाने की उन्हें ज़रुरत ही कहाँ है? अधिकतर आश्रमवासी ऐसा सोचते हैं कि एक कारुणिक हृदय स्वयं स्वर्ग होता है।

पहले अधिकांश लोग सामान्य-व्यक्ति की सेवा के इच्छुक नहीं थे। यही कारण है कि हमारी सभ्यता का ह्रास हो गया और आज हम दुखी हैं।

हमें अद्वैत तथा जीवन को भिन्न नहीं अपितु एक ही जानना होगा। हममें दूसरों में स्वयं को देखने की योग्यता आनी चाहिए। अम्मा अपने चारों ओर दुःख देखती है, इसीलिये ऐसा कहती है।

निस्स्वार्थ सेवा के माध्यम से हमारे मन विस्तार को प्राप्त होते हैं तथा अन्त में ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। इससे हमारे मन की कुरूपता मिट जाती है और आत्मा के साथ ऐक्य स्थापित हो जाता है। प्रवचन देने के स्थान पर, हमें इन शिक्षाओं पर आचरण करना चाहिए। अम्मा के सभी बच्चों का यह लक्ष्य हो!अपने स्वार्थ-रहित दृष्टान्त को सामने रख कर ही हम दूसरों को इन सिद्धांतों को आत्मसात करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस पर तनिक विचार कीजिये!

– श्रीमाता अमृतानन्दमयी देवी

कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या ईश्वर को आँखों से देखा जा सकता है? वे कहते हैं कि यदि यह संभव नहीं है तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं किया जा सकता। मानव सीमित है। वे लोग यह नहीं समझते कि दृष्टि, श्रवणशक्ति, सभी सीमित हैं। उनसे एक प्रश्न पूछना चाहिए कि बिजली की तार में बिजली को देखा नहीं जा सकता परन्तु इस कारण से यह तो कहा नहीं जा सकता कि बिजली नहीं है। छूने से झटका लगता है। वह अनुभव है।

एक पक्षी आकाश की ऊँचाईयों में उडता जाता है। इतना ऊँचा उडता है की दृष्टि से ओझल हो जाती है। क्या इसपर यह कहा जा सकता है कि चूँकि वह दृष्टिगोचर नहीं है उसका अस्तित्व नहीं है? ऐसा कहना कि मैं तो केवल उसी में विश्वास करूँगा जो मैं देख सकता हूँ, बिल्कुल युक्तिहीन है। मानो किसी व्यक्ति की हत्या हो गई। हजारों लाखों लोगों ने यह हादसा अपनी आँखों से देखा नहीं परन्तु न्यायाधीश को इनके कथन से कुछ लेना देना नहीं है। उनका फैसला तो एक चश्मदीद गवाह के बयान पर निर्भर है। उसी प्रकार जितने ही लोग बोलें कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, पर प्रमाण तो ईश्वरसिद्ध ऋषि-मुनियों के वचनों को ही माना जाएगा।

एक व्यक्ति जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारता रहता था एक दिन किसी के घर गया। वहाँ भूगोल के एक छोटे प्रतिरूप को देख कर उसने पूछा, “ओह, कितना सुन्दर है! किसने बनाया है?” यह सुनकर उसके आस्तिक मित्र ने कहा, “यदि कृत्रिम भूगोल बनाने के लिए किसी की आवश्यकता है तो यथार्थ भूमि का भी तो कोई स्रष्टा रहा होगा?”

बीज में ही वृक्ष निहित है पर बीज को देखने से या उसे काट खोलने पर वृक्ष की उपस्थिति का भान नहीं होता। उस बीज को बो दो, सिचाई करो। श्रम करो। तो उसमें से अंकुर फूटेगा, पौधा उगेगा। केवल वाद-विवाद करने से कोई लाभ नहीं है, परिश्रम आवश्यक है। तब अनुभूति होगी। एक भौतिकवादी शास्त्रज्ञ को भी किए जाने वाले परीक्षण में विश्वास होता है। हालाँकि बहुत से परीक्षण असफल भी हो जाते हैं तब भी वे प्रयत्न जारी रखते हैं। उनमें विश्वास होता है कि वे अगले परीक्षण में सफलता पाएँगे। एक डॉक्टर बनने में या इंजिनीयर बनने में कितने वर्ष लग जाते हैं? कोई नहीं कहता कि इतने वर्ष प्रतीक्षा करना उनके लिए संभव नहीं है। इतने साल के निरन्तर प्रयास के फलस्वरूप ही वे डॉक्टर या इंजिनीयर बन पाते हैं। ईश्वर दृष्टिगोचर व्यक्ति नहीं है। वे सब के कारण हैं। यदि कोई पूछे कि आम का पेड या गुठली – इनमें से क्या पहले हुआ तो क्या उत्तर देंगे? आम के पेड के होने के लिए गुठली की आवश्यकता है। गुठली के होने के लिए आम के पेड का होना अनिवार्य है। अतः दोनो के होने के लिए अन्य किसी कारण की आवश्यकता है। वह है ईश्वर! वे सभी के मूल कारण हैं, स्रष्टा हैं। वे सर्वस्व हैं। उन्हें जानने का एकमात्रा उपाय है हममें ईश्वरीय गुणों की वृद्धि; अपने अहंकार को ईश्वर में समर्पित करना। तब हम भी ईश्वरत्व का अनुभव कर पाएँगे। प्रह्लाद सर्वोत्तम भक्ति के उदाहरण हैं। प्रह्लाद की भाँति समर्पित भक्त को पाना कठिन है। यदि हम कोई कार्य करने के लिए उद्यत होते हैं परन्तु हमें उस कार्य में असफलता मिलती है तो हम किसी न किसी को दोष देकर लौट आते हैं। समस्याओं के उठने पर हम विश्वास खो बैठते हैं, ईश्वर को कोसते हैं। पर प्रह्लाद को देखो – उन्हें पानी में डुबो कर मार डालने का श्रम किया गया; उबलते तेल में डाला गया, ऊँचे पहाड पर से नीचे खाई में धकेल दिया गया; आग में फेंक दिया गया। उन्हें मार डालने के अनेक श्रम किए गए परन्तु इन परिस्थितियों में भी प्रह्लाद विचलित नहीं हुए, उनकी भक्ति में अल्प मात्र भी कमी न आई। उस अडिग विश्वास के कारण वे सुरक्षित भी रहे। संकटों का सामना करते हुए भी वे ‘नारायण, नारायण’ जपते रहे। अन्ततः उनकी भक्ति को नष्ट करने के श्रम में उन्हें उल्टा-सीधा पाठ पढाने का श्रम किया गया। उनसे कहा गया, “श्रीहरि चोर है, ईश्वर नहीं। ईश्वर का तो अस्तित्व ही नहीं है।” प्रह्लाद इस सब के बीच सदैव भक्ति से मंत्रजप करते रहे। अब हम अपनी ओर एक नजर डालें – किसी के बारे में कुछ सुनते नहीं कि हमारा उनपर से विश्वास उठ जाता है। जीवन में कोई दुःख आता है तो हमारा विश्वास उठ जाता है। हम सभी की भक्ति पार्ट टाईम (अल्प कालिक) भक्ति है। जब कुछ आवश्यकता होती है तो हम भगवान का स्मरण करते हैं अन्यथा उन्हें याद तक नहीं करते। यदि हमारी इच्छा की पूर्ति न हो तो? तब हमारा विश्वास उठ जाता है। यह है हमारी स्थिति। परन्तु सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी प्रह्लाद अविचलित रहे। प्रत्येक प्रतिसंधि से गुजरते हुए उनका विश्वास दृढ होता गया। संकटों के बढने के अनुसार वे भी भगवद् चरणों को और कसकर पकड लेते। प्रह्लाद में उतना समर्पण था। फलतः वे विश्वभर के लिए प्रकाश प्रसारते दीप बन गए। प्रह्लाद की भक्ति और उनकी कथाएँ आज भी हजारों के हृदयों में प्रकाश प्रसारते हैं।

भक्ति व अद्वैत भाव में प्रह्लाद उत्कृष्ट थे। प्रह्लादसम समर्पण वाला व्यक्ति जो कुछ स्पर्श करता है वह स्वर्ण बन जाता है। प्रह्लाद की भक्ति ही पिता हिरण्यकशिपु की मुक्ति का कारण भी बनी। ईश्वर के करों से मृत्यु प्राप्त करना मुक्ति ही है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने हिरण्यकशिपु को शरीर से तादात्म्य से विलग करके आत्मबोध प्रदान किया। भगवान ने अनुभव के माध्यम से हिरण्यकशिपु में बोध जगाया कि शरीर नश्वर है और केवल आत्मा ही शाश्वत है।

निस्सार मानव अपनी बुद्धि और काबलियत पर गर्व करता ईश्वर को तक दोष देता है। ईश्वरतत्त्व बुद्धि से परे है। ऋषीश्वरों ने ईश्वर को जानने हेतु ही विग्रहाराधना व अन्य आध्यात्मिक साधना का मार्ग दर्शाया है।

प्रश्नः यदि ईश्वर सर्वव्यापी हैं तो मंदिरों की क्या आवश्यकता है?

अम्माः यह सनातन धर्म की विशेषता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के तल तक जाकर उनका उद्धार करता है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न संस्कारों के होते हैं, सभी का एक ही स्तर नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति का उनके संस्कार के अनुरूप ही मार्गदर्शन किया जा सकता है। दूध पीते बच्चे को माँस खिलाएँ तो वह पचेगा नहीं। उसे तो उसकी स्थिति के अनुरूप उचित आहार ही देना चाहिए। कुछ रुग्णों को इंजेक्शन से अलर्जी होती है उन्हें दवा टिकिया के रूप में दी जाती है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को उनके शारीरिक व मानसिक गठन के अनुरूप मार्ग का उपदेश दिया जाना चाहिए। इस तथ्य के आधार पर ही विभिन्न संप्रदायों का उद्भव हुआ। सगुण व निर्गुण का संकल्प, भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सभी का उद्भव इसी आधार पर है। इन सभी मार्गों का आधारभूत तथ्य नित्यानित्य विवेक ही है। अर्चना, पूजा, भजन – सभी का लक्ष्य यही है। दृष्टिहीन बच्चे को ब्रेल अक्षरों को स्पर्श करवाकर अक्षरों का ज्ञान दिया जाता है। बधिरों को संकेतों की भाषा में सिखाना पडता है। सभी को उनके तल के अनुसार ही ज्ञान दिया जा सकता है। साधारण लोगों के उद्धार के लिए मंदिरों की आवश्यकता है। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता, मंदिरों की आवश्यकता का निषेध नहीं हो सकता।

हालाँकि वायु सर्वत्र व्याप्त है तब भी क्या पंखे के नीचे बैठने में कोई विशेषता नहीं है? वृक्ष की छाँव में अन्य स्थलों पर न पाई जानेवाली एक शीतलता होती है। वहाँ एक खास ठंडक व सुख का अनुभव होता है। इसी प्रकार जब उपाधि के माध्यम से ईश्वर की पूजा की जाती है तो उनका सान्निध्य अधिक अनुभव हो पाता है। हालाँकि सूर्यप्रकाश सर्वत्र है तब भी बन्द कमरे में प्रकाश पाने के लिए दीया जलाना पडता है। हालाँकि गाय में दूध है उसके कानों को पकडकर निचोडने से कोई फायदा नहीं है। दूध तो थन से ही मिलेगा। ईश्वर सर्वव्यापी हैं तो भी मंदिरों में विश्वास रखनेवालों को सहज ही उनका सान्निध्य अनुभव हो पाता है। परन्तु उसके लिए विश्वास का होना भी आवश्यक है। विश्वास का अर्थ है मन का ट्यूनिग, या ईश्वर के सुर से मन का सुर मिलाना। हालाँकि मंदिरों में ईश्वर सान्निध्य है तो भी अविश्वासियों को उसकी अनुभूति नहीं होगी। विश्वास से ही अनुभूति होती है।

एक बार अम्मा और यहाँ के बच्चे नृत्य का कार्यक्रम देख रहे थे। एक विदेशी दंपत्ति विदेशी नृत्य कर रहे थे। उनका हाथों में हाथ लिए यूँ नृत्य करना एक बेटी को पसन्द न आया। उस बेटी ने पूछा, “छी, यह कैसा नृत्य है? स्त्री-पुरुष साथ-साथ नृत्य कर रहे हैं!” इसपर अम्मा ने प्रश्न किया, “क्या शिव-पार्वती एक साथ नृत्य करेंगे तो तुम्हें देखते हुए लज्जा अनुभव होगी?” चूँकि हम उसे दिव्य मानते हैं, हमें उसमें कोई बुराई न दिखेगी। जब हम शिव-पार्वती कहते हैं तो उसमें एक दिव्यता आ जाती है। अतः हम उसे श्रेष्ठ मानते हैं। यह विश्वास पर ही आधारित है। चूँकि हम उस स्त्री-पुरुष में दिव्यता देख नहीं पाते हमें उनका नृत्य बुरा लगता है। अर्थात मनोभाव ही प्रधान है। विश्वास में दृढ प्रतिष्ठित रहते हुए हम यदि अग्रसर हों तो यकीनन हमें ईश्वरानुभूति होगी। विश्वास ही नींव है।

जिस मंदिर या आराधनालय में अनेक व्यक्ति एकमन हो प्रार्थना करते हैं वहाँ का वातावरण अन्य स्थलों के वातावरण से भिन्न होगा। एक मयखाने में एक ऑफीस का सा वातावरण नहीं होता। मंदिर का वातावरण मयखाने के वातावरण से भिन्न होता है। जबकि मयखाने में हम मनोबल खो बैठते हैं, एक मंदिर में हम मनोबल पाते हैं, मनोबल का विकास होता है। आराधनालय सद्विचारों के तरंगों से व्याप्त होते हैं। उस वातावरण में विचलित मन को भी कुछ शान्ति की अनुभूति हो पाती है। अतर के कारखाने की एक खासियत होती है, वहाँ का वातारण ही सुगंधित होता है। दूसरी ओर रसायन बनाने वाले कारखाने का अंतरिक्ष भिन्न होता है। मंदिरों का भक्तिभावसिक्त वातावरण, वहाँ के पावन दृश्य, सभी मन की एकाग्रता पाने में व हममें भक्तिभाव को जगाने में सहायक होते हैं। मंदिर दर्पण की तरह हैं। निर्मल दर्पण में हम अपने मुख पर लगे मैल को स्पष्ट देख पाते हैं और अतः उसे साफ भी कर पाते हैं। हमारे हृदयमालिन्यों के निवारण में मंदिर सहायक हैं।

प्रश्न- क्या ईश्वर ही, हमसे सब कुछ नहीं करा रहे हैं?
अम्मा- हाँ, लेकिन ईश्वर ने हमें बुद्धि भी दी है ताकि हम विवेकपूर्वक कार्य कर सकें। हमें सभी कार्य विचारशीलता से, विवेकपूर्वक करना चाहिये। भगवान ने तो जहर भी बनाया है, पर कोई अकारण ज़हर नहीं खाता तब हम अपने विवेक का उपयोग करते हैं। इसी तरह हमें अपने हर कार्य की जाँच परख विवेकपूर्वक करते रहना जरूरी है।

प्रश्न- अम्मा, जो लोग एक सद्गुरु को समर्पण कर देते हैं, क्या वे मानसिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं?
अम्मा- बेटा, एक बटन के दबने से छाता खुल जाता है। इसी तरह एक सद्गुरु के समक्ष सिर झुकाने से तुम्हारा मन, खुलकर विश्वमानस में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी आज्ञाकारिता तथा विनम्रता, कमज़ोरी नहीं है। एक पानी के फिल्टर की तरह, सद्गुरु तुम्हारा अहंकार हटाकर तुम्हारा मन निर्मल बना देते हैं। अन्यथा सामान्य लोग तो सदा, अपने अहंकार के गुलाम बने रहते हैं। वे अपनी विवेक बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाते।

एक रात एक घर में चोर घुस गया। परन्तु जैसे ही वह घुसा, लोग जाग गये और वह जान बचाकर भागा। लोग उसके पीछे-पीछे चिल्लाते हुए भागने लगे- ‘पकडो चोर, पकडो चोर!’ जैसे ही थोड़ी भीड़ बढ़ी, चोर भी भीड़ में शामिल हो गया और वह भी चिल्लाने लगा- ‘पकडो चोर, पकडो चोर’। उस चोर की तरह, अहंकार भी हमारा साथी बन गया है। ईश्वर हमें अहंकार छोड़ने के अवसर प्रदान करते हैं, परंतु तब भी हम अपने अहंकार का ही पोषण करते हैं और उसे अपना दोस्त बना लेते हैं। शायद ही कभी हम विनम्रता अपनाकर, अहंकार त्यागने की कोशिश करते हैं।

अनु्शासन के बिना, मन तुम्हारे नियंत्रण में नहीं आ सकता। इसलिए तुम्हें सद्गुरु के निर्देश अनुसार, संयमपूर्वक रहना ज़रूरी है। एक बार मन पर काबू पा लेने के पश्चात, तुम्हें किसी का ड़र नहीं रहेगा, क्यों कि तब तुम्हारे अंदर विवेक शक्ति जागृत हो जायेगी जो तुम्हारा प्रदर्शन करेगी।

प्रश्न— मेरी समझ में नही्‌ आता कि र्ईश्वर की बनाई वस्तुओं के उपभोग से आनंद लेने में क्या आपत्ति है? ईश्वर ने हमें इन्द्रियाँ क्या इसीलिये नही दी हैं कि हम वस्तुओं का आनंद ले सकें?

अम्मा— जैसा अम्मा ने अभी कहा, कि हर वस्तु की नियम और सीमाएँ है और हमें उन नियमों के अंतर्गत जीना चाहिये। हरवस्तु की एक अंतर्निहित प्रकृति होती है। ईश्वर ने हमें केवल इन्द्रियाँ ही नहीं दी हैं, वरन्‌ विवेक—बुद्धि भी दी है। जो व्यक्ति उसका उपयोग न कर, इन्द्रिय सुखों के पीछे भागते रहते हैं, उन्हें कभी सुख शान्ति नहीं मिल सकती। उनका अंत हमेशा दुःखद ही होगा।

एक यात्री एक बार विदेश गया। उस देश में वह पहली बार गया था। वहाँ के लोग उसके लिये अजनबी थे। उसे वहाँ की भाषा नहीं आती थी, न उनके रीतिरिवाज मालूम थे, न खान—पान की आदतें ज्ञात थी। वह घूमते—घामते, बाजार में पहुँच गया, जहाँ खरीददारों की बहुत भीड़ थी। वहाँ तरह—तरह के फल थे, जो उसने पहले नहीं देखे थे। उसने देखा कि बहुत से लोग एक विशिष्ट फल खरीद रहे थे। उसने सोचा कि ये फल ज़रुर स्वादिष्ट होगा और एक थैला भर खरीद लिया। एक झाड़ के नीचे बैठकर, उसने एक फल चखा। फल जरा भी मीठा नहीं था — उसका मुँह जलने लगा।

उसने फल का मध्यभाग चखा— वह भी तीखा था। फल का दूसरा सिरा भी बहुत तीखा निकला। उसने दूसरा फल चखा, वह भी तीखा निकला। उसने सोचा कोई फल तो मीठा होगा— उसने एक—एक करके सभी फल चखे। तीखे स्वाद के फलों से उसका मुँह जलता रहा,आँसू बहने लगे, पर वह ज़िद्दपूर्वक, एक के बाद एक फल खाता ही गया। बेचारा बहुत पीड़ा में था। मीठे स्वादिष्ट फल की तलाश में, उसे मिले— केवल मुँह जलाने वाले, तीखे स्वाद के फल।

जिन्हें वह मीठे फल समझा था— वह थी पकी लाल मिर्च! हर मिर्च चखकर कष्ट उठाना आवश्यक नहीं था। परंतु इस झूठी आशा में कि कोई फल तो मीठा होगा— वह अंतिम मिर्च तक खाता ही चला गया। मिर्च का तो स्वभाव है— तीखापन! एक मात्र सुख जो उसे मिला, वह था मिर्च की सुंदरता देखने का सुख।

इसी प्रकार हम भी बार—बार उन्हीं चीज़ों में सुख ढूँढते हैं, जिनमें सुख है ही नखीं। सुख की खोज में हम एक वस्तु से, दूसरी और फिर तीसरी पर जाते रहते हैं। यह केवल मन का भ्रम ही है कि हम बाहरी वस्तुओं से सु्ख पा सकते हैं।

सत्य यही है कि बाहरी किसी वस्तु में सुख है ही नहीं। जो सुख तुम खोज रहे हो वह तुम्हारे अंदर ही है। ईश्वर ने हमें शरीर, मन व बुद्धि दी है ताकि हम यह पाठ पढ़ सकें व सच्चे सुख का उद्‌गम खोज सकें। अविवेकपूर्ण इन्द्रिय भोग से तो सुख के बजाय दुःख ही हाथ आयेगा।

शरीर व इन्द्रियों का उपयोग हम दो प्रकार से कर सकते हैं। पहला— यदि हम ईश्वर को जानने का प्रयत्न करें तो हम अनंत सुख पा सकते हैं। परंतु यदि इन्द्रिय सुखों के पीछे ही भागते रहें, तो मिर्च में मिठास ढूँढने वाले मूर्ख यात्री के समान दुःख ही पाते रहेंगे। इन्द्रिय सुखों की मूल प्रकृति ही दु:ख देने की है, यह समझे बिना उनके पीछे दौड़ने से दुःख ही हासिल होगा। अगर हम बाहरी वस्तुओं की मूल प्रकृति समझ लें, तो उनसे उत्पन्न दुःख, हमें कमजोर नहीं बना सकेगा।

सागर में लहरें उठती हैं, परंतु अगले ही शण तट पर गिर कर चूर हो जाती हैं। वे ऊपर रुक नहीं सकती, गिरना उनकी नियति है। जो व्यक्ति सुख पाने की आशामें बाहरी वस्तुओं की ओर लपकता है, वह भी इसी तरह गिरकर दुःखी होता है। इससे हमें यह समझ लेना चाहिये कि सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं है। लोगों की आंतरिक अशांति व दु:ख का कारण यही भ्रम है। इससे केवल व्यक्ति नहीं, पूरा समाज प्रभावित हो रहा है। बाहरी वस्तुओं में सुख की खोज के कारण ही सच्चा प्रेम लुप्त हो गया है। पारिवारिक जीवन की खुशी व शांति नष्ट हो गई है। लोगों ने खुले दिल से प्रेम व सेवा करने की शमता खो दी है। पति पराई स्त्रियों की कामना करते हैं और स्त्रियाँ पराये मर्दों की। भोग की लालसा इस हद तक बढ़ चुकी है कि कुछ ऐसे पिता भी हैं, जो भूल जाते कि वह उनकी अपनी बेटी है। भार्ई बहन के रिश्तों में भी दरार पड़ रही है। अनगिनत बच्चों की हत्या की जा रही है। इस सारी दुष्टता का कारण यह भ्रामक अवधारणा है कि सुख बाहर पाया जा सकता है। अम्मा यह नहीं कह रही है कि तुम भौतिक सु्खों से वंचित रहो। परंतु तुम्हें उनकी मूल प्रकृति से अवगत रहना चाहिये। अति से बचना चाहिये। धर्म पकड़े रहो और अधर्म से बचो।

जो लोग केवल अपने लिये सुख खोजते फिर रहे हैं तथा असंयमित जीवन जी रहे हैं, उनका अंत दु:खदायी ही होगा? यह स्वाभाविक है कि कामनाएँ और भावनाएँ मन में पैदा हों— लेकिन कुछ संयम बरतना आवश्यक है। भूख लगना स्वाभाविक है— परंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, खाने योग्य दिेखे तो हम उस पर टूट पड़ें। ऐसा करेंगे, तो बीमार पड़ जायँगे। अधिक भोग से दु:ख ही पैदा होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते।

इन्द्रिय सुख भी वास्तव में अंदर से ही प्राप्त होता है। परंतु लोग सुखों का बाहर, पागलों की तरह, तब तक पीछा करते हैं, जब तक कि वे हार कर, निराश हो कर गिर न पड़ें। वे उठकर फिर भागते हैं और फिर गिरते हैं। यदि तुम सुखों को बाहर ही खोजते रहोगे, तो जीवन में कभी शांति नहीं पा सकोगे। तुम्हें अंदर देखना सीखना होगा, वहां तुम्हें सच्चा सुख मिलेगा। जब तक तुम्हारा मन बाहरी कूद—फाँद बंद कर के, शांत नहीं हो जाता, तब तक तुम सच्चा सुख अनुभव नहीं कर सकते। सागर की गहराई में बेचैनी की कोई लहरें नहीं हैं। जब तुम मन की गहराइयों में उतरोगे, तो मन स्वतः शांत हो जायेगा। वहाँ तुम केवल आनंद पाओगे।