ऋषि-मुनियों की पावन धरा भारत की विश्व को यह अनूठी वैचारिक देन है – गुरु। परन्तु हमारी पाश्चात्य देशों की नक़ल का परिणाम है कि आज बहुत से बच्चे इस विषय पर भ्रम को उत्पन्न कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने हाल ही में अम्मा से पूछा, “गुरु के शरणागत होना तो दुर्बल मन का लक्षण है ना?”

बच्चो, आजकल अनेकों प्रकार के छाते उपलब्ध हैं। बटन से खुलने वाला छाता तो तुमने देखा ही होगा? इसी भाँति, गुरु को नमस्कार करने से हमारा मन समष्टि मन बन सकता है। ऐसी आज्ञाकारिता एवं विनम्रता को दौर्बल्य नहीं कहा जा सकता। जल-शोधक फ़िल्टर की भाँति ही गुरु भी हमारा मन शुद्ध करते हैं। हमारे अहम् का नाश हो जाता है। आज हम प्रत्येक स्थिति में अहंकार के दास बन रहे हैं। हम विवेक से काम नहीं लेते। हमारी प्रत्येक भौतिक उपलब्धि हमारे अहम् को थोड़ा और मोटा कर देती है, जबकि वास्तव में होना यह चाहिए कि सफ़लता के चलते हम अधिक विनम्र बने न कि अधिक अहंकारी। परन्तु जब हम अपने ही अहम् के दास बन जाते हैं तो विवेक सहित आगे बढ़ना असम्भवप्राय हो जाता है।

एक दिन एक घर में एक चोर घुस आया। परन्तु घर के सदस्य अभी जाग रहे थे और उन्हें चोर के भीतर आने की भनक लग गई। उन्होंने हल्ला मचा दिया और चोर नौ दो ग्यारह हो गया। शीघ्र ही एक बड़ी भीड़ उसके पीछे भाग रही थी और चिल्ला रही थी, “चोर, चोर, रुको, रुको!” परन्तु चोर बड़ा चालाक था। वह चुपके से भीड़ में से खिसक गया और उन्हीं के साथ भागता हुआ चिल्लाने लगा, “चोर, चोर, रुको, रुको!” हमारा अहम् भी ऐसा ही मक्कार, छलिया है। हर स्थिति में से यह चुपचाप खिसक जाता है। जब हमें परमात्मा अपने अहम् से निजात पाने का अवसर भी देता है तो हम उसका उपयोग अहम् को मोटा-ताज़ा करने में करते हैं। अहम् भीतर आ घुसता है। हम विनम्रता एवं सावधानी के साथ अहम् के निर्मूलन का प्रयास नहीं करते।

आज हमारे मन गमले में लगे पौधों जैसे हो गए हैं। गमले में लगे पौधे को यदि एक भी दिन पानी न दिया जाए तो यह मुरझाने लगता है। इसी भाँति, बिना अनुशासन तथा नियमों का पालन किये हम अपने मन पर संयम नहीं रख सकेंगे। जब तक हमारा मन पूर्णरूपेण संयमित न हो जाए, हमें आध्यात्मिक जीवन के विधि-निषेध का पालन करना ही चाहिए। गुरु के उपदेश, आदेशानुसार ही जीवन निर्वाह करना चाहिए। एक बार मन पूर्ण रूप से संयमित हो गया तो फिर कोई डर नहीं; हमारे मार्गदर्शन हेतु हमारे ही भीतर विवेक जागृत हो गया है।

एक बार एक व्यक्ति गुरु की खोज में निकला। उसे ऐसे गुरु की तलाश थी जो उसे उसकी वासनाओं के अनुसार जीने का परामर्श दे। किन्तु इसके लिए कोई न तैयार हुआ। जो नियम पालन करने को वे कहते, उन्हें यह नहीं कर सकता था। आखिर थक-हार कर उसने स्वयं को वन में पाया। वह परेशान हो कर बैठ गया और सोचने लगा कि, “ऐसा कोई समर्थ गुरु नहीं है जो मेरी इच्छानुसार मेरा मार्गदर्शन करे। मैं किसी का दास बनना नहीं चाहता। चलो, मैं जो कुछ भी करता हूँ क्या वो परमात्मा की करनी नहीं?” ज्यों ही उसके मन में यह विचार आया, एक ऊँट उसके सामने आ खडा हुआ और उसे देखने लगा। इस आदमी ने सोचा, “अरे, काश मैं इस ऊँट को ही अपना गुरु बना सकता तो बढ़िया होता!” ऊँट को संबोधित करते हुए वह बोला, “तुम मेरे गुरु बनोगे?” ऊँट ने सिर हिलाया।

अब उसने ऊँट को गुरु मान लिया।

अब उसने ऊँट से पूछा, “गुरु, तुम्हें घर ले चलूँ?” ऊँट ने फिर सिर हिला दिया। वह उस ऊँट को ले कर घर की ओर चल पड़ा। कुछ दिनों के बाद वह ऊँट के पास आ कर कहता है, “गुरु, मैं एक लड़की से प्रेम करता हूँ, उससे शादी कर लूँ?” ऊँट ने सिर हिला दिया।

फिर एक दिन वह बोला, “गुरुजी, मेरे बच्चे नहीं हैं, मेरे घर आँगन मे कुछ बच्चे खेलने लगे तो…?” ऊँट ने फिर सिर हिलाया। काल पा कर वह पिता बना तो पूछता है, “गुरुजी, मैं अपने मित्रों के साथ थोड़ा मदिरापान कर लूँ?” ऊँट ने सिर हिलाया।

दिन बीतते गए और उस व्यक्ति को शराबी बनते देर न लगी। उसका अपनी पत्नी के साथ झगड़ा होने लगा। एक दिन वह ऊँट के पास जा कर बोला, “मेरी पत्नी दिन-रात मुझसे झगड़ती रहती है। चाकू से उसकी हत्या कर दूँ?” ऊँट ने सिर हिला दिया और उस व्यक्ति ने चाकू मार कर पत्नी की हत्या कर डाली। पुलिस ने उसे कारागार में डाल दिया और उसने शेष जीवन वहीं बिताया।

बच्चो, यही होता है जब हम ऐसे गुरु का चयन करते हैं जो हमें मनमानी करने दे। अंततः हम स्वयं को अपने ही मन की जेल में कैद पाते हैं। परमात्मा ने हमें विवेक-शक्ति प्रदान की है जिसका सदुपयोग कर के हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकते हैं। हमें गुरु के उपदेशानुसार ही रहना चाहिए। वास्तव में गुरु शिष्य हेतु ही जीता है। केवल यह दोहराना ही पर्याप्त नहीं है, “अद्वैत ही सत्य है। ” अद्वैत ही जीवन है। यह तो एक अनुभूति है। इसे तो एक पूर्ण-विकसित फ़ूल की सहज-सुगंध की भाँति होना चाहिए। इसे सर्वदा याद रखना।

फूल जब कली होता है तो हम उसकी सुगंध एवं सौन्दर्य का आनन्द नहीं उठा सकते। और उसे खींच-खींच कर खोलने में तो कोई समझदारी नहीं है। हमें उसके सहज विकास के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी होगी, तभी हम उसके सौन्दर्य एवं सुगंध का आनन्द ले सकेंगे। यहाँ धैर्य की आवश्यकता है। प्रत्येक पत्थर में एक मूरत छिपी होती है किन्तु जब शिल्पकार अपनी छैनी से पत्थर के अनावश्यक, अनचाहे टुकड़ों को निकाल फेंकता है तभी उस मूर्ति का आकार स्पष्ट होने लगता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए, तनिक सोचिये कि उस पत्थर को शिल्पकार के सम्मुख कितने घंटे धैर्यपूर्वक बैठना पडता है! यह उसका तप है जो इतना सुन्दर रूप धर कर हमारे सामने आ खडा होता है।

अम्मा को यहाँ किसी की सुनाई हुई एक मजेदार कथा याद आती है। एक सड़क किनारे बने अति भव्य मंदिर के बाहर एक पत्थर था। एक दिन वह बोला, ‘‘मैं भी एक पत्थर हूँ और वो भी जो मंदिर के भीतर मूर्ति बन कर बैठा है। फिर सब लोग मुझ पर पाँव रख कर चढ जाते हैं और उसकी पूजा करते हैं ऐसा क्यों?’’

यह सुन कर मंदिर की मूर्ति बोली, ‘‘तुम तो केवल आज मेरी पूजा होते हुए देखते हो। यहाँ पहुँचने के पूर्व शिल्पकार ने अपनी छैनी से मेरे शरीर पर हजारों प्रहार किये। उस समय मैंने हिले-डुले बिना ‘उफ’ तक नहीं की। इसीलिये आज असंख्य लोग यहाँ आ कर मेरी पूजा करते हैं।’’

यह उस पत्थर का धैर्य था जिसने उसे पूजनीय बना दिया।

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए सर्वोत्तम गुण है धैर्य। कुन्ती तथा गान्धारी से भला कौन परिचित नहीं है? उनकी कथा धैर्य तथा अधैर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। जब कुन्ती ने गान्धारी से पहले बालक को जन्म दिया तो गान्धारी खिन्न हो उठी क्योंकि वो चाहती थी कि उसका पुत्र सम्राट बने और पुत्र अभी जन्मा नहीं था। अब वह घबरा उठी, उसका धैर्य खो गया। अंतत: वह अपने पेट पर घूँसा मार कर प्रसव के लिए बाध्य करती है और बाहर आता है माँस का एक लोथडा मात्र। इसके फिर वह सौ भाग कर के सौ घटों में डाल कर रखती है और इतिहास कहता है कि इस प्रकार वह सौ पुत्रों की माँ बनी। उसमें प्रतीक्षा हेतु धैर्य ही नहीं था। और फिर यही अधैर्य से उत्पन्न सन्तान विनाश का बीज बन गई। जबकि धैर्य की सन्तान ने विजयश्री प्राप्त की।

किन्तु जब इस सुप्त बालक को जगाया जायेगा तो सरलता, भोलापन भी स्वत: जग जाएगा। हममें हर चीज से सीखने की इच्छा का सहज ही उदय हो जायेगा। फिर धैर्य तथा एकाग्रता भी आ जायेंगे। ज्यों-ज्यों हमारे भीतर का बालक बलवान होगा, त्यों-त्यों हमारे धैर्य व एकाग्रता भी बलवान होते जायेंगे। फिर अहंकार के पुत्र ‘क्षुद्र अहम्’ का कोई अस्तित्व न रहेगा। अत: मेरे बच्चों को यह नौसिखिये का भाव सदा बनाये रखना चाहिए। तब हम किसी भी वस्तु, अवसर, स्थान से सीखने में सक्षम हो जायेंगे। फिर हम जीवन में जो चाहे, पा सकते हैं। मेरे बच्चों को आजीवन यह नौसिखिये का भाव बनाये रखने का प्रयास करना होगा। जीवन में वास्तविक सफलता की प्राप्ति का यही रहस्य है।

आजकल कोई अपने दाँत निकाल कर दिखाए तो हम उसे मुस्कराहट कहते हैं, जबकि सच्ची मुस्कराहट का उद्भव हृदय से होता है। एक निष्कपट हृदय में ही सच्चा सुख अनुभव करने तथा बाँटने का सामर्थ्य होता है। इसलिए, हमें अपने भीतर विस्मृत बालहृदय को जगाना होगा, उसे बढने देना होगा। जिन बच्चों का सपना है कि वे ‘हीरो’ बनें, उन्हें अम्मा कहतीं हैं कि, यदि पहले तुम ‘ज़ीरो’ बनोगे तभी ‘हीरो’ बन सकोगे। आपने भी सुना होगा ना? अर्थात् पहले हम अपने क्षुद्र अहम् का नाश करें।

आध्यात्मिक जीवन का प्रथम सोपान है धैर्य। जिन्होंने अपने अहंकार का उन्मूलन कर, बालसुलभ अंत:करण को विकसित कर लिया है, उनका आध्यात्मिक उत्थान अवश्यम्भावी है।

हमारे देश में अनेक धर्मों के लोगों के लिए बहुत से पूजा-स्थल हैं – हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख तथा ईसाई लोग अपने-अपने पूजा-स्थलों पर जा कर प्रार्थना करते हैं। फिर भी सच्ची धार्मिकता के विकास का कोई चिन्ह नहीं दिखाई पड़ता। कोई भी धर्म आक्रामकता तथा भ्रष्टाचार की अनुमति नहीं देता। उसके बावजूद हम अधिकाधिक ऐसी घटनाओं के विषय में सुनते हैं जिनसे यह मालूम होता है कि आपराधिक भावनाएं तथा भ्रष्टाचार में भयानक दर से वृद्धि हो रही है। बच्चो, कभी तुमने सोचा है कि यह सब क्यों हो रहा है? यद्यपि लोग परमात्मा में विश्वास करते हैं फिर भी उनमें कोई आध्यात्मिक जागरूकता नहीं आयी।

इन सब पूजा-स्थलों पर कुछ लोगों का काम ही कर्मकांड व पूजा आदि करना होता है। कुछ धर्मों में उन्हें विशेष नाम, पद प्राप्त हैं। इनमें से अधिकाँश गृहस्थ होते हैं। इन्होंने पूजा के विधि-विधान का अध्ययन किया होता है और अब वे एक व्यवसाय की भाँति उसका निर्वाह करते हैं। उनके लिए यह आजीविका का एक साधन-मात्र है। उनमें कितने लोग पूजा एवं कर्मकाण्ड को अंतःकरण की शुद्धि का साधन मान कर करते होंगे? यही कारण है कि वे मंदिर तथा चर्च में आने वाले भक्तों का उचित मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं होते।

चर्च तथा मंदिरों की कमेटी अथवा बोर्ड के सदस्यों के पास अध्यात्म-तत्व को समझने अथवा उसके प्रचार-प्रसार का समय नहीं होता। साधारणतः, उनका ध्यान इसी पर रहता है कि किस प्रकार भव्य से भव्य उत्सव मनाये जाएँ और उनसे किस प्रकार लाभ उठाया जाए।

अधिकाँश भक्तों को अपने धर्म के मौलिक सिद्धांतों के विषय में कुछ जानकारी नहीं होती। धर्म के रीति-रिवाज़ों का वास्तविक तात्पर्य समझे बिना ही वे अपने पूर्वजों का अन्धानुरण करते जाते हैं। मंदिर में जिन विधि-विधानों को पिता को करते देखा, पुत्र भी बड़ा हो कर आँख मूंदे वही सब करता रहता है। उनके मूल में छिपे विज्ञान अथवा सिद्धान्त को समझने का प्रयास वह कभी नहीं करता।

इस विषय में एक मज़ेदार कथा सुनो। एक प्रबंधक ने अपने चार कर्मचारियों को बुला कर उन्हें अलग-अलग कार्य सौंपा। पहले को गड्ढा खोदना था, दूसरे को बीज बोना था, तीसरे को जल देना था और चौथे को उन बीजों को मिट्टी से ढक देना था। गड्ढे खोदने वाले ने अपना कार्य पूरा कर दिया किन्तु बीज बोने वाले ने अपना कार्य नहीं किया। अब तीसरे तथा चौथे ने भी अपना-अपना पानी देने व वापस गड्ढा भरने का कार्य संपन्न कर दिया। तो परिणाम क्या हुआ? सारी मेहनत बेकार गई। सभी कार्यों के पीछे जो बीज के विकास की एक भावना थी, वही निष्फल हो गई। मंदिरों एवं अन्य पूजा-स्थलों पर जाने वाले लोगों के साथ भी प्रायः कुछ ऐसा ही होता है। अध्यात्म तत्व को ठीक से समझे बिना और उसे जीवन में उतारे बिना वे अर्थहीन से कर्म करते चले जाते हैं।

यद्यपि धार्मिक लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है परन्तु समाज उनकी भक्ति से लाभान्वित नहीं हो रहा। इसके अतिरिक्त उनकी तथाकथित भक्ति एवं आध्यात्मिकता उनके जीवन में प्रतिबिम्बित नहीं होती। अम्मा ऐसा नहीं कहती कि कहीं कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता। कम से कम हम इतना तो करते हैं – है ना? हम सावधान रहें तो व्यक्ति व समाज – दोनों को किसी सीमा तक बदल सकते हैं। कम से कम अम्मा तो निस्संदेह ऐसा कर सकती हैं।

बच्चो, तुम इसे समझो कि चाहे कोई भी धर्म हो, कोई भी सम्प्रदाय हो – मौलिक सिद्धांतों की रचना तो समाज के कल्याण हेतु ही हुई है। अतः मानव-कल्याण के लाभ हेतु जो रीति-रिवाज़ बने हैं उनको लुप्त होने से बचाना ही होगा।

हमें केवल उत्सवों पर भव्य समारोहों तक ही सीमित हो कर नहीं रह जाना चाहिए। उनके मूल में निहित आध्यात्मिक आदर्शों को हमें जीना होगा। ऐसा होगा तो सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बना रहेगा।

प्रश्न— यदि किसी व्यक्ति में, आत्मज्ञान पाने के बजाय, सद्‌गुरु की सेवा की भावना प्रबल हो तो क्या सद्‌गुरु उसे अगले जन्मों में भी उपलब्ध होंगे?

अम्मा— यदि यह भावना ऐसे शिष्य की है जिसने सद्‌गुरु को पूर्ण समर्पण कर दिया है, तो सद्‌गुरु निश्चय ही सदा उसके साथ रहेंगे। परंतु शिष्य को एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। उसे एक अगरबत्ती की तरह बनना होगा, जो स्वयं जलकर दूसरों को सुगंध देती है। शिष्य का हर श्वास संसार के हित में होना चाहिए और हर कर्म करने में यह भावना होनी चाहिये कि वह सद्‌गुरु की सेवा कर रहा है। जिसने पूर्ण रूप से सद्‌गुरु की शरण ले ली है, उसके अब कोई जन्म शेष नहीं है। और यदि सद्‌गुरु चाहेंगे तो वह पुनः जन्म भी ले सकता है।

 

परन्तु गुरु भी कई प्रकार के होते हैं। जो शास्त्रों के अनुसार निर्देष देते हो – वे ही गुरु हैं। आजकल तो ऐसे लोग भी गुरु कहलाते हैं, जो कोई भी पुस्तक पढ़ लेते हैं और कुछ भी असंगत घोष्णाएँ करते फिरते हैं। परन्तु सद्‌गुरु की बात और है। उन्होंने त्याग और तपस्या से सत्य का ज्ञान पाया है और शास्त्रों में वर्णित परम अवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। बाहरी तौर पर सद्‌गुरु, विशेष रूप से अलग नहीं दिेखेंगे, पर जो लाभ सद्‌गुरु दे सकते हैं वह पांडी गुरु नहीं दे सकते। जो बाहर से बहुत तड़क-भड़क दिखाते हैं, उनके अंदर तो खोखलापन ही होगा। उन पर निर्भर रहकर तुम कुछ भी लाभ नहीं पा सकोगे। पांडी गुरु और सद्‌गुरु में इतना अंतर है, जितना एक दस वाट के बल्ब और एक हज़ार वाट के बल्ब में। एक सद्‌गुरु की उपस्थिति मात्र से, तुम आंतरिक आनंद अनुभव करोगे और तुम्हारी वासनाएँ क्षीण होंगी।

सद्‌गुरु की शिक्षाएँ केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती – उनके कर्मों में परिलक्षित होती हैं। उनके जीवन में, शास्त्रों के वचन जीवन्त रूप में देखे जा सकते हैं। यदि तुम सद्‌गुरु के जीवन का अध्ययन कर लो, तो शास्त्र अध्ययन की आवश्यकता नहीं रहेगी। सद्‌गुरु अहंभाव से पूर्ण मुक्त होते हैं। उनकी तुलना चॉकलेट या शक्कर से बनी प्रकृति से हो सकती है, जिसका पूरा प्रकार ही मिठास देता है, कोई भाग फ़ेंकने योग्य नहीं होता। सद्‌गुरु केवल संसार के कल्याण के लिये जन्म लेते हैं। वे व्यक्ति नहीं हो, एक आदर्ष के प्रतिनिधि हैं। हमें केवल उनका अनुसरण करने की ज़रूरत है। वे हमारे ज्ञान चक्षु खोलते हैं, अंधकार दूर करते हैं।

सद्‌गुरु हर कहीं है परंतु वह सद्‌गुरु ही है जो हमारे दोष दूर करके हमें ईश्वर तक पहुँचाते हैं। इसीलिये सद्‌गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया है। शिष्य के लिये तो सद्‌गुरु परमात्मा से भी अधिक हैं। एक बार सद्‌गुरु मिल गये, तो फिर तुम्हें न आत्मज्ञान के बारे में सोचना है, न पुनर्जन्म की चिंता करनी है। तब तुम्हें केवल सद्‌गुरु के बताये मार्ग का अनुसरण करना है। जैसे एक तालाब, एक बड़ी नदी से जुड़कर सागर से जुड़ जाता है वैसे ही एक बार सद्‌गुरु से जुड़ गये, तो तुम बिल्कुल ठीक जगह पर पहुँच गये। और कार्य सद्‌गुरु करेंगे और तुम्हें लक्ष्य तक पहुँचायेंगे। शिष्य को केवल यही करना है कि वह पूर्ण हृदय से गुरु चरण में समर्पित हो जाये। सद्‌गुरु कभी शिष्य का त्याग नहीं करते।

प्रश्न— अम्मा, इस युग में आत्मज्ञान पाने के लिये कौन सा पथ श्रेष्ठ है?

अम्मा— आत्मज्ञान कहीं बाहर बैठा हुआ नहीं है जिसे जाकर पाया जा सके। भगवान कृष्ण कहते हैं – ‘चित्त की समता ही योग है’। हमें हर वस्तु में दिव्य चेतना दिखनी चाहिये, तभी हम पूर्णता पा सकेंगे। हमें हर वस्तु में अच्छाई ही देखनी चाहिये। एक मधुमक्खी, फूल में केवल रस पर केंद्रित होती है और उसकी मिठास का आनंद लेती है। जो सदा हर वस्तु का केवल अच्छा पक्ष देखते हैं वे ही आत्मज्ञान पाने के अधिकारी हैं।

अगर हम आत्मज्ञान पाना चाहते हैं, तो शरीर को पूरी तरह भूलना होगा। हमें पूर्ण रूप से आश्वस्त होना होगा कि हम आत्मा ही हैं। प्रभु का कोई विशिष्ट निवास स्थान नहीं है, वे हमारे हृदय में बसते हैं। सभी आसक्तियों और देहभाव से मुक्त होना आवश्यक है। तब हममें एक गहरी समझ पैदा होगी, कि आत्मा को कोई जन्म मृत्यु नहीं है, न कोई सुख दुःख है। हमारा मृत्यु भय मिट जायेगा और हम आनंद से भर जायेंगे।

एक जिज्ञासु साधक को, हर परिस्तिथिति को धैर्यपूर्वक स्वीकार करना सीखना चाहिये। यदि शहद में कुछ नमक मिल गया है, तो लगातार शहद डालते जाने से नमकीन स्वाद हट जायेगा। इसी तरीके से हमें द्वेष भाव तथा मैं भाव से, पूरी तरह छुटकारा पाना चाहिये। अच्छे विचारों के सतत चिंतन के द्वारा इसे प्राप्त करो। जब मन इस तरीके से निर्मल हो जायेगा, तो हम किसी भी स्थिति को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर सकेंगें। इस तरह हम आध्यात्मिक उन्नति अवश्य प्राप्त करेंगे, चाहे हमें तत्काल इसका पता न भी चले।

आत्मज्ञान की अवस्था में, हम दूसरों को अपना ही आत्मरूप मानते हैं। चलते हुए यदि हम गिर जाते हैं और पैर को चोट पहुँचती है, तो हम आँखोंको दोष देकर, उन्हें दंडित नहीं करते, चोटग्रस्त पैर को आराम देने की कोशिश करते हैं। यदि हमारे बाँये हाथ को चोट लगती है, तो दाहिना हाथ फौरन मदद के लिये आगे आता है। उसी तरह आत्मज्ञान का अर्थ है, दूसरों में अपनी आत्मा का अनुभव करते हुए, उनकी गलतियों को माफ़ करना।

आत्मज्ञानी के लिये, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है, परन्तु उस अवस्था का अनुभव पाने के पूर्व, आत्मज्ञान की सब बातें, कोरे शब्द हैं। उन शब्दों में अनुभव की शक्ति नहीं होती। और सद्‌गुरु की सहायता के बिना, चेतना के उस स्तर तक पहुँचना भी असंभव है। एक साधक के लिए सद्‌गुरु के उपदेषानुसार, आचरण परम आवश्यक है। आत्मज्ञान पाने के लिये केवल दृष्टिकोण बदलने की ज़रूरत है — बस!

भ्रमव्य लोग यह सोचते हैं कि उनके सांसारिक बंधन वास्तविक हैं। एक गाय की कहानी है, जो रोज़ एक शेड में खूँटे से बाँधी जाती थी। एक दिन उसे खूँटे से नहीं बाँधा गया। उसे केवल शेड के अंदर करके, दरवाज़ा बंद कर दिया गया। गले की रस्सी का दूसरा सिरा ज़मीन पर पड़ा रहा। दूसरे दिन जब गाय को शेड से बाहर करने के लिये दरवाज़ा खोला गया तो गाय अपने स्थान से नहीं हिली। उसने गाय को धक्का दिया, डंडे से मारा, पर गाय टस से मस नहीं हुई। तब उसने सोचा कि रोज़ मैं इसे बाहर करने से पूर्व, खूँटे से रस्सी खोलता हूँ, अगर मैं इसे खूँटे से खोलने का नाटक करुँ तो? उसने वही किया। बस, गाय चल पड़ी।

लोगों की भी वही दशा है। वे बंधे हुए नहीं है, पर सोचते हैं कि वे बंधे हुए हैं। यह भ्रम दूर करना ज़रूरी है। यह ठीक से समझ लेना है, कि तुम किसी बंधन में नहीं हो। पर यह भ्रम, सद्‌गुरु की सहायता के बिना दूर नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि सद्‌गुरु तुममें आत्मज्ञान डालतें हैं। सद्‌गुरु की जिम्मेदारी इतनी ही है, कि तुम्हें बंधन से परे होने का निश्चयात्मक विश्वास दिला दे। क्योंकि अगर तुम वास्तव में बंधन में होते, तो तुम्हारे बंधन खोलने पड़ते। लहरों के शांत होने पर ही, हम सूर्य का स्पष्ट प्रतिबिंब देख पाते हैं। इसी तरह मन की तरंगों के शांत होने पर ही, हम आत्मा को देख पायेंगे। हमें आत्मा को रूप नहीं देना है— केवल मन की तरंगों को शांत करना है और आत्मा स्वतः प्रकट हो जायेगी। स्वच्छ पारदर्शी काँच पर परार्वतन नहीं होगा— एक तरफ पेन्ट करने पर ही प्रतिबिम्ब दिेखेगा। इसी तरह जब हमारे अंदर निेस्वार्थ का पेन्ट लग जायेगा, तब हम मन के दर्पण में परमात्मा को देख पायेंगे।

जब तक अहंकार शेष रहेगा, हम निे:स्वार्थी नहीं बन सकते। सद्‌गुरु, शिष्य को ऐसी परिस्थितियों में से गुज़ारते हैं, जिससे शिष्य अपने अहंकार को स्पष्ट रूप से देख लेता है तथा उसे काट—छाँट कर, दूर करना सीखता है। सद्‌गुरु की समीपता व परामर्श से शिष्य में धैर्य विकसित होता है।

वे शिष्य की धैर्य परीक्षा इस प्रकार लेते हैं कि शिष्य को क्रोध आये। जैसे शिष्य को ऐसा कोई कार्य सौंपा जाता है, जिसे वह पसंद नहीं करता— इस पर वह क्रोधित होकर अवज्ञा करता है। उस समय सद्‌गुरु, उसे विवेकपूर्वक विचार करने हेतु प्रेरित करेंगे। तब शिष्य अपने अंदर कठिनाइयों के पार जाने की शक्ति, महसूस करेगा। इस तरह सद्‌गुरु विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ निर्मित करके शिष्य की कमज़ोरियाँ दूर करते हैं और उसे सशक्त बनाते हैं। शिष्य तब अपने अहंकार के पार जाने में समर्थ होता है।

जब एक शंख के अंदर का माँस निकाल दिया जाता है तभी उसमें से ध्वनि बाहर निकल सकती है। इसी तरह जब हम अहंकार हटा देते हैं, तभी हम अपनी आत्मा की ध्वनि सुन सकते हैं। पूर्ण समर्पण घटित हो जाने पर ‘मैं’ का भाव शेष नहीं रहता, केवल परमात्मा रहता है। इस अवस्था को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

यदि एक सद्‌गुरु के शरण लेने के बाद भी तुममें यह चिंता व्याप्त है कि मुझे आत्मज्ञान कब होगा? तो इसका अर्थ है कि समर्पण पूर्ण नहीं है— तुम्हें सद्‌गुरु पर पूर्ण विश्वास नहीं है। एक बार सद्‌गुरु की शरण में आने पर, तुम्हारा एक मात्र कार्य उनके निर्देषों का निष्ठा से पालन करना है। और कोई विचार मन में आना ही नहीं चाहिये। शिष्य का बस इतना ही कर्तव्य है। एक सच्चा शिष्य, आत्मज्ञान की अभिलाषा भी गुरु को समर्पित कर देता है। उसका एक मात्र लक्ष्य, आज्ञा पालन है। सद्‌गुरु तो पूर्णता के मूर्तरूप हैं।

इसी प्रकार सद्‌गुरु के प्रति सच्चे शिष्य का प्रेमभाव व श्रद्धा, शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

शिष्य बनने के लिये और सच्चा गुरु पाने के लिये, भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये। जब दिल और दिमाग में सामंजस्य हो, तभी शिष्य सद्‌गुरु को पहचान सकता है।