‘‘तुम कौन हो?’’ – इस प्रश्न के विभिन्न उत्तर सुनने को मिलते हैं जैसे – ‘मैं हिन्दू हूँ’, ‘मैं ईसाई हूँ’, ‘मैं मुसलमान हूँ’, ‘मैं इंजीनियर हूँ’, ‘मैं डॉक्टर हूँ’…। इन सबमें जो सामान्य है वो है ‘मैं’ जिसका अपना कोई नाम, रूप नहीं है। यह वही परम तत्त्व है जिसे आत्मा, ब्रह्म अथवा परमात्मा के नामों से जाना जाता है।

यदि हम कहें कि, ‘परमात्मा नहीं है’ तो यह वैसा ही है जैसे जिह्वा कहे कि, ‘जिव्हा नाम की कोई वस्तु ही नहीं’। ‘मैं’ ही कहता हूँ कि ‘मैं नहीं हूँ’। हम सबके भीतर परमात्मा का निवास है। जड़-चेतन, हर प्राणी के भीतर जो धड़क रहा है वही आत्मा है। परमात्मा की निकटतम उपमा है आकाश, जोकि सर्वव्यापी है। सकल ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान आकाश है। घर बनने के पूर्व आकाश विद्यमान रहता है, घर पूरा बन जाने के बाद भी आकाश रहता है तथा घर उसी आकाश में स्थित है जो पहले था। घर को ध्वस्त कर के यदि सब मलबा इत्यादि हटा दिया जाए तो भी आकाश ज्यों का त्यों बना रहता है। ठीक उसी प्रकार, यह परम तत्त्व भी नित्य-वस्तु है – भूत में था, वर्तमान में है तथा भविष्य में रहेगा और यही परिवर्तन-रहित नित्य तत्त्व परमात्मा है।

एक बच्चे ने अम्मा से पूछा कि, ‘‘अम्मा, यदि परमात्मा सर्वव्यापी है तो हम उसे देख क्यों नहीं पाते?’’ तो, क्या हम बिजली को देख सकते हैं? नहीं, किन्तु यदि हम किसी नंगे तार को छू लें तो हमें धक्का लगेगा और बिजली का अनुभव हो जायेगा। इसी प्रकार परमात्म तत्त्व भी अनुभवगम्य है। हम कभी वृक्ष के पीछे खड़े हों तो संभवत: हमें सूर्य के दर्शन न हों और हम कह उठें कि, ‘सूर्य को वृक्ष ने ढ़क दिया है’, परन्तु यह सत्य तो नहीं है ना? वस्तुत:, वृक्ष ने हमारी दृष्टि को किंचित ढ़का है। इसी प्रकार हमारा अज्ञान ही हमें परमात्मा के स्पष्ट-दर्शन से वंचित किये हुए है। परमात्मा हमारे भीतर प्राण के रूप में, आत्मा हो कर के रह रहा है जिसका स्वरूप ही आनन्द है। यद्यपि परमात्मा सर्वव्यापी है तथापि हमारे मन का ‘मैं’ और ‘मेरा’ भाव के साथ तादात्म्य हमारे सत्य-दर्शन में बाधक बने हुए है। मन ही हमारे बंधन तथा मोक्ष का कारण है। मेरे बच्चों को अपने मन को नित्य-परिवर्तनशील विचारों तथा भावनाओं से एवं बाह्य वस्तुओं के दासत्व से मुक्त करने की कला आनी चाहिए। ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ का भाव ही हमें बंधन की जंजीरों में बाँधे रखता है।

बाह्य जगत् से हमें पूर्णत्व का अनुभव कभी न प्राप्त हो सकेगा। परन्तु आज हम बाह्य जगत् में ही आनन्द तथा पूर्णत्व की खोज कर रहे हैं। कितनी ही महिलायें आ कर मुझसे कहती हैं कि, ‘‘अम्मा, मैं चालीस वर्ष की हो गई हूँ परन्तु अभी तक अविवाहिता हूँ, अभी तक मुझे योग्य पति की तलाश है।’’ इसी प्रकार कितने ही पुरुष आ कर कहते हैं कि, ‘‘जीवन तो जैसे-तैसे चल रहा है परन्तु योग्य पत्नी को मैं आज भी खोज रहा हूँ।’’ इस प्रकार उनके जीवन में निराशा एवं दु:ख भर जाते हैं।

ऐसी शिकायतें सुन कर अम्मा को ऐसे व्यक्ति का स्मरण हो आता है जो वधू की खोज में विश्व भर में भ्रमण करता है। उसकी भेंट स्पेन की एक लड़की से होती है जो अति सुन्दर तथा मेधावी थी किन्तु जगत् के व्यवहार में उसकी कोई रुचि नहीं थी। फिर एक लड़की कोरिया में मिली जिसमें रूपवती, मेधावी होने के साथ-साथ जगत् की सूझ-बूझ भी थी। परन्तु उसके सामने प्रस्ताव रखने में वह स्वयं संकोच कर गया। अंतत: एक अन्य देश में उसे एक लड़की मिलती है जिसमें वे सब गुण थे जो वह चाहता था।

अम्मा ने पूछा, ‘‘तो क्या तुम अपने सपनों की उस रानी से विवाह कर पाए?’’
उस व्यक्ति ने किंचित दु:ख भरे स्वर में कहा, ‘‘नहीं।’’
अम्मा ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’
उसका उत्तर था, ‘‘वास्तव में, वह अपने सपनों के राजा की राह देख रही थी।’’

बच्चो, जब हम पूर्णता को बाहर पाना चाहते हैं तो निराशा हाथ लगना अवश्यम्भावी है। हम मनुष्य आखिर क्या ढूँढ रहे हैं? क्या शान्ति व आनन्द नहीं? थोड़ी सी शान्ति के लिए मनुष्य कहाँ-कहाँ भटकता फिरता है परन्तु इस सारी भाग-दौड़ में हम अपने भीतरी जगत् को नरक बना लेते हैं। यदि बाह्य विषय-भोग की वस्तुओं द्वारा नित्य आनन्द एवं शान्ति की प्राप्ति सम्भव होती तो क्या अब तक हो न गई होती? केवल घरों तथा कारों का वातानुकूलित होना पर्याप्त नहीं है – मेरे बच्चों को अपने अंत:करण को वातानुकूलित करने की कला आनी चाहिए।

मेरे बच्चो, शान्ति, संतोष तथा आनन्द हमारे अपने मन पर निर्भर हैं न कि बाह्य वस्तुओं तथा स्थितियों पर। मन का संयम आनन्द की आधारशिला है। सदा स्मरण रहे कि स्वर्ग व नरक मन की ही कल्पना-मात्र हैं।

तुमने उस लड़की की कथा सुनी है जिसने ड्रॅाईंग प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया? उसको पुरस्कार में एक फानूस प्राप्त हुआ जिस पर बड़ी खूबसूरत नक्काशी की गई थी। उसने इसे अपने घर की बैठक में लगा दिया। उस फानूस के सौन्दर्य को निहारते-निहारते, उसका ध्यान पहली बार दीवार के उतरते रंग-रोगन की ओर आकर्षित हुआ। उसने दीवारों पर पुताई करवाने का निर्णय किया। जब पुताई हो चुकी तो उसका ध्यान खिडकियों पर लगे मैले-कुचैले पर्दों की ओर गया। उसने तुरन्त उन्हें उतार कर धो डाला। फिर उसने सोचा कि गलीचे की भी सफाई करवानी चाहिए। इस प्रकार, एक-एक करके उसने सारे कमरे को नए जैसा चमचमाता, साफ़-सुथरा बना दिया। इस सबका आरम्भ हुआ एक खूबसूरत फानूस से!

जीवन में भी ऐसा ही होता है। हम एक सत्कार्य से आरम्भ करें तो देखेंगे कि अन्य कई सकारात्मक कार्य होते जाते हैं – मानो एक नया जन्म! क्योंकि परमात्मा गुणों का भण्डार हैं। हम उनकी ओर एक कदम बढ़ाएँ तो वो हमारी ओर छः कदम बढ़ाते हैं। इस का तात्पर्य यह कदापि नहीं कि परमात्मा हमसे दूर हैं। अपितु तात्पर्य यह कि यदि हम सद्गुणों को आत्मसात करते हैं तो यह परमात्मा को आत्मसात करने के समान है। हमारा प्रत्येक सत्कर्म परमात्मा की ओर उठाया हुआ एक कदम है। इसके साथ ही, अन्य सद्गुण भी आने लगेंगे। किन्तु इस प्रक्रिया का कहीं तो शुभारम्भ करना होगा, कम से कम एक सद्गुण तो विकसित करने की इच्छा होनी चाहिए!

कभी-कभी परीक्षा में पास होने के प्रतिशत अंक कम हों तो जिन विद्यार्थियों के अंक पास होने के लगभग निकट होते हैं, उन्हें ‘ग्रेस-मार्क्स’ दे दिए जाते हैं। यद्यपि सब विद्यार्थी उसके लिए योग्य हैं परन्तु यदि उनके अंक पास होने के अंकों के निकट नहीं होते तो वे उससे लाभान्वित नहीं होते। बिना पढाई किये, कोई केवल ‘ग्रेस-मार्क्स’ से पास नहीं हो सकता। अतः, बच्चे का पुरुषार्थ तो वांछनीय है। उसी प्रकार, यद्यपि परमात्मा की कृपा सतत बरस रही है, किन्तु उससे लाभान्वित होने के लिए हमारी ओर से कुछ प्रयास अवश्य होना चाहिए। यदि हमारा भाव उचित नहीं है, हृदय खुला नहीं है तो सब व्यर्थ है। दिन के समय खिड़कियाँ बन्द करके यदि हम शिकायत करें कि, “मुझे सूर्य प्रकाश नहीं देता!” तो इसका कोई अर्थ थोड़े ही है। सूर्य का प्रकाश तो सर्वत्र है, सबके लिए है। करना है तो बस इतना कि अपने खिड़कियाँ, दरवाज़े खुले रखें। इसी प्रकार, परमात्मा की कृपा-प्राप्ति के लिए हमें अपने हृदय-द्वार को खुला रखना होगा। तो, परमात्मा की कृपा से अधिक हमें अपने मन की कृपा की आवश्यकता होगी।

परमात्मा तो कृपा की मूर्ति हैं। हमारी आत्म-कृपा की कमी ही हम तक परमात्म-कृपा को पहुँचने से रोकती है। यदि कोई व्यक्ति हमें कुछ देना चाहे और हम अभिमानी जैसा व्यवहार करें तो वो व्यक्ति यह सोच कर पीछे हट जायेगा कि, “यह तो बड़ा अभिमानी है! मैं किसी और को दे दूंगा। ” अभिमानी व्यक्ति कृपा से वंचित रह जाता है। हम तक परमात्म-कृपा इसीलिये नहीं पहुँचती क्योंकि आत्म-कृपा का अभाव है। हमारी अंतरात्मा कहती है कि, “ऐसा करो।” हमारी बुद्धि कहती है, “थोड़ी विनम्रता से पेश आओ”, जबकि मन कहता है, “मैं क्यों विनम्र बनूं? मैं उसके सम्मुख क्यों झुकूं?” तो जो हमें प्राप्त होनी चाहिए थी वो कृपा भी प्राप्त नहीं होती। अतः, परमात्म-कृपा की प्राप्ति हेतु, पहले आत्म-कृपा का होना आवश्यक है।

परमात्मा की ओर पहला कदम उठाने के लिए, हमें अपने अभिमान से छुटकारा पाना होगा। इसीलिये अम्मा सदा कहती हैं कि, “बच्चो,नौसिखिये बनो।” एक नौसिखिये का भाव अहम्-भाव पर नियंत्रण पाने में सहायक सिद्ध होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें प्रगति के लिए प्रयत्न ही नहीं करना चाहिए। जब हम समाज में रहते हैं, सामूहिक रूप से कार्य करते हैं तो स्वाभाविक ही हमारी प्रगति को ले कर संदेह भी होंगे। सबका अपना-अपना धर्म होता है। हमें उसके अनुसार ही चलना चाहिए। यदि कोई गाय बगीचे में घुस कर फूल-पौधे खाने लग जाए और तुम उसे नम्रतापूर्वक कहो, “ऐ गाय! यहाँ से चली जा,” तो वह चरती रहेगी परन्तु यदि तुम चिल्ला कर कहो, “ऐ, चल निकल यहाँ से!” तो वह भाग खड़ी होगी। गाय को भगाना कोई अहंकारी कर्म नहीं है। हम केवल गाय के अज्ञान को झटका देने के लिए अपनी आवाज़ को ऊंचा करते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं। परन्तु हमारा भाव एक नौसिखिये सा होना चाहिए। इसके साथ-साथ, भीतर कहीं गहरे में, शिशुवत निर्दोषता बनी रहे।

आज हमारे शरीर तो विकास को प्राप्त हो गए हैं किन्तु मस्तिष्क नहीं। मन-मस्तिष्क के ऐसे विकास तथा विस्तार के लिए कि उसमें सम्पूर्ण जगत् समा जाए, हममें बालक का सा भाव होना चाहिए। एक बालक ही विकसित हो सकता है। किन्तु आज अधिकांशतः, मस्तिष्क मद से चूर हैं। हमें इस अहंकार, मद से निजात पाने के लिए प्रयास अवश्य करना चाहिए। आवश्यकता है दूसरों के साथ तालमेल बनाने की।

यदि एक तंग गली से दो कारों को गुज़रना हो तो उनमें से एक को पीछे हटना ही होगा। यदि दोनों का दुराग्रह रहे कि, “मैं तो अपने स्थान से हिलूंगी नहीं! मैं पीछे नहीं हटूंगी!” तो दोनों ही फंसी रहेंगी और कोई भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँचेगी। दोनों में से एक भी थोड़ा पीछे हट जाए तो फिर दोनों आगे बढ़ जाएँगी। रास्ता छोड़ने वाला तथा स्वीकार करने वाला – दोनों ही व्यक्ति आगे बढ़ने के अधिकारी हो जाते हैं। इसीलिये अम्मा कहती हैं कि क्षमा करने का अर्थ है आगे बढ़ चलना। क्षमा-याचक तथा क्षमा-दाता – दोनों को ही क्षमा ऊर्ध्व-गमन का अधिकारी बना देती है। ऐसे क्षमा-रूपी कर्म, परमात्मा की ओर जाने वाले मार्ग पर हमारे नन्हें-नन्हें कदम हैं। हमारी ओर से किंचित भी प्रयास हो तो परमात्मा हमारी सहायता अवश्य करेंगे। किन्तु यदि हमारी ओर से कोई प्रयास ही नहीं होगा तो हम परमात्म-कृपा पाने में असमर्थ रहेंगे। इसमें परमात्मा का कोई दोष नहीं, दोष तो हमारा है। यह सदा स्मरण रहे। परमात्मा की ओर हम कम से कम एक कदम तो बढायें, तभी तो हम उनकी कृपा के पात्र बनेंगे।

एक बार जगत् के सब रंग इकठ्ठा हुए। प्रत्येक ने दावा किया, “मैं सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सबका प्रिय रंग हूँ।” आखिर इस वार्तालाप का समापन विवाद में हुआ।

हरे रंग ने घोषणा की, “निश्चित रूप से, मैं सबसे महत्वपूर्ण रंग हूँ। मैं जीवन का प्रतीक हूँ। वृक्ष, लताएँ – समग्र प्रकृति मेरे रंग की है। इससे अधिक क्या कहूं?”

इतने में नीला रंग बीच में बोल पड़ा, “बकवास बन्द करो! तुम तो केवल धरती की ही बात कर रहे हो। तुम आकाश तथा सागर की ओर नहीं देखते क्या? उनका रंग नीला है। और पानी तो जीवन का आधार है। अनन्तता एवं प्रेम के रंग का, मेरा अभिवादन करो!”

यह सुनते ही, लाल रंग चिल्ला उठा, “बस, बहुत हो गया! सब चुप रहो! मैं तुम सबका राजा हूँ – मैं रक्त हूँ। मैं वीरता और साहस का रंग हूँ। मेरे बिना जीवन सम्भव नहीं है।”

इस हल्ले-गुल्ले के रंग धीरे से बोला, “तुम सबने अपनी-अपनी बात कह दी। मुझे एक ही बात कहनी है – मत भूलो कि मैं सब रंगों का अधिष्ठान हूँ।”

और फिर अनेकों रंग आगे बढ़-चढ़ कर अपनी महिमा तथा श्रेष्ठता का बखान करने आये। और धीरे-धीरे जो एक गोष्ठी-मात्र से आरम्भ हुआ था, उसने वाकयुद्ध का रूप ले लिया। रंगों में एक-दूसरे का सर्वनाश तक करने की ठन गई। सहसा आकाश में काले बादल छा गए, गर्जना होने लगी, बिजली चमकने लगी और फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी। जल-स्तर तीव्रतापूर्वक बढ़ने लगा। वृक्ष समूल उखड़ गए और सारी प्रकृति अस्त-व्यस्त हो गई। भय से कांपते हुए सब रंग असहाय से हो कर चिल्ला उठे, “बचाओ!”

उसी समय उन्हें एक भविष्यवाणी सुनाई दी, “हे रंगो! अब तुम्हारा झूठा अहंकार, अभिमान कहाँ गया? तुम जो लोग मूर्खतावश श्रेष्ठता के लिए लड़ रहे थे, अब अपने जीवन की रक्षा कर पाने में असमर्थ, भय से कम्पायमान हो रहे हो। जिस-जिस वस्तु का तुम अपनी होने का दावा करते हो, वो क्षण-भर में नष्ट हो जाने वाली है। एक बात जान लो कि यद्यपि तुम सब अलग-अलग हो किन्तु अतुल्य हो। परमात्मा ने तुम सबको भिन्न-भिन्न उद्देश्य से बनाया है। स्वयं की रक्षा हेतु, तुम सबको मिलजुल कर रहना चाहिए। इकट्ठे रह कर तो तुम आकाश तक ऊंचे उड़ सकते हो, साथ-साथ खड़े रह कर सतरंगी इंद्रधनुष बन सकते हो, शान्ति व सौन्दर्य तथा कल की आशा के प्रतीक!”

बच्चो, जब कभी तुम खूबसूरत इंद्रधनुष को देखो तो तुम इस कथा को याद करना। यह तुम्हें एक-दूसरे को स्वीकार कर, मिल-जुल कर काम करने के लिए प्रेरित करे! धर्म, परमात्मा की उपासना के लिए पुष्प हैं, उन्हें ऊपरलिखित कथा के पात्रों की भाँति झगड़ालू नहीं होना चाहिए। धर्म के नाम पर हमें शत्रुता नहीं करनी चाहिए। यदि धर्म तथा धर्म-गुरु एक-साथ आ खड़े हों तो विश्व के सौन्दर्य को चार-चाँद लग जायेंगे। शान्ति की सुगंध सारे जगत् में फ़ैल जाएगी। हमें एक सामान्य मंच की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ हम सब एक हो कर आगे आयें। स्मरण रहे कि प्रकृति में प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व है और उसका अस्तित्व एक समय-विशेष पर, किसी उद्देश्य-विशेष के लिए है।

एक बार एक संपन्न व्यापारी था जिसकी एक दुकान थी। उसे प्रायः व्यापार के सिलसिले में बाहर जाना पड़ता था, अतः उसने एक मैनेजर रख लिया जिसे उसने दुकान की रोज़मर्रा की सब ज़िम्मेदारी सौंप दी – जैसे रोज़ के कारोबार का हिसाब-किताब रखना आदि। उसने उसे यह आदेश दिया कि प्रतिदिन के लाभ का दस प्रतिशत एक ओर रखे, जिसमें से सात प्रतिशत सीधे व्यापारी के घर पर पहुंचाए तथा तीन प्रतिशत बैंक में जमा करा दे। व्यापारी ने मैनेजर को बताया कि बैंक-खाता एक अनाथ बच्चे के नाम है और जमा पूंजी उसकी देखभाल के लिए है। पहले-पहल तो मैनेजर ने बिना जाने-बूझे आदेश का पालन किया और तीन प्रतिशत जमा कराता रहा। परन्तु कुछ समय पश्चात्, वह सोचने लगा, “खून-पसीने की गाढ़ी कमाई क्यों उस अनाथ को यूँ ही दे दी जाए?”

तब से वह अनाथ बच्चे के खाते में एक ही प्रतिशत जमा करता और शेष धन अपने मित्रों के साथ रात-रात भर बैठ कर शराब पीने में उड़ाने लगा। व्यापारी ने मैनेजर पर न तो कभी संदेह किया और न ही खाते को कभी जांचा। फिर कुछ समय बीता और मैनेजर ने वो एक प्रतिशत भी जमा करवाना बन्द कर दिया और सारा धन विषय-भोग पर खर्च कर देता।

नशे की तथा अन्य बुरी लतों के चलते, मैनेजर इतना बीमार हो गया कि काम पर भी नहीं आ पाता था। एक दिन जब वह बिस्तर में पड़ा था तो उसे व्यापारी का पत्र प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, “मुझे मालूम हुआ कि तुम बीमार हो और बिस्तर पर पड़े हो । मुझे यह भी मालूम है कि अब तुम्हारे लिए दुकान पर आना, मेरे लिए काम करना कठिन है, इसलिए मैं दुकान बन्द कर रहा हूँ। तुम्हें याद है, मैनें तुम्हें प्रतिदिन तीन प्रतिशत बैंक में जमा कराने को कहा था? मैंने तुमसे कहा था कि वो किसी अनाथ के लिए है परन्तु वास्तव में वो तुम्हारी रिटायरमेंट के लिए था। मुझे आशा है कि अब तक उस खाते में पर्याप्त धन जमा हो गया होगा जिससे तुम शेष जीवन आराम से बिता सकते हो। ”

हममें से अधिकाँश लोग उस मैनेजर जैसी ही स्थिति में हैं, जिसे वो पत्र पढने को मिला। बाद में पछताने से क्या होता है कि, “हे भगवान्! मैंने तुम्हारे द्वारा प्रदान प्रत्येक अवसर को व्यर्थ क्यों गँवा दिया!” मृत्यु सामने आ खडी हो तब रोने से क्या होता है? हम इस दुनियाँ से यदि कुछ साथ ले जा सकते हैं तो वो है अपने द्वारा किये सत्कर्मों की पूँजी।

हमारा शरीर एक राजा द्वारा शासित राष्ट्र-तुल्य है। ताज तथा राजदंड तो उस राजा की धरोहर हैं जिसे दिन-रात लोग सलाम करते हैं। इसी प्रकार, जब तक हमारा शरीर स्वस्थ है तब तक हाथ-पाँव आदि हमारी आज्ञा का पालन करते हैं। एक बार ताज व राजदण्ड अपने हाथ से गए तो कोई भी उसे राजा ही नहीं समझेगा। जब हम स्वस्थ हैं तो शरीर के सब भाग मस्तिष्क की बात मानते हैं। मस्तिष्क कहता है – “हाथ उठाओ! पाँव चलाओ! गीत गाओ!” – आदि-आदि और शरीर झट आज्ञा का पालन करता है। परन्तु बीमार, बिस्तर पर पड़ा शरीर सदा ऐसे आज्ञा-पालन नहीं कर सकता। हम हाथ को उठने को कहते हैं तो वो हँसता है और हमें चुपचाप पड़े रहने को कहता है। इसी प्रकार हमारे पाँव तथा सिर भी करते हैं। वे कहते हैं, “जब तक तुम स्वस्थ थे, जब तक तुम्हारे पास ताज था, हमने तुम्हारी आज्ञा का पालन किया। अब तुम्हारा ताज जाता रहा, तुम शिथिल हो गए हो तो अब हम तुम्हारा कहना क्यों मानें?” बीमारी में हमारा अपना शरीर हमारी बात नहीं सुनता। व्यक्ति कूद-भाग नहीं सकता, चबा या निगल नहीं सकता। आँखें, कान स्थाई रूप से हड़ताल पर चले जाते हैं।

इस प्रकार, हम उस राजा की भाँति हो जाते हैं जिसके मंत्रियों ने तख्ता-पलट कर दिया हो। अतः बच्चो, अम्मा की बात ध्यानपूर्वक सुनो। आज जब तुम युवा और स्वस्थ हो तो समझदारी के साथ, विवेकपूर्वक जियो। मन में दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखो। अहंकारवश दूसरों को अपने अधीन करने की भावना न रखो। यदि हम दूसरों को दुःख देते हुए जीवन व्यतीत करेंगे तो हमारी प्रार्थनाएं सफ़ल नहीं होंगी। परमात्मा का आशीर्वाद उनके साथ होता है जिनके हृदय में करुणा है। युवावस्था, स्वस्थावस्था में ही हमें करुणा का विकास कर लेना चाहिए। आगे चल कर, दुःख-संकट की घड़ी में यही हमारे काम आएगी।

कल्पना करो कि हम जन-समूह में हैं और हमें एक पत्थर आ कर लगता है और हमें चोट लग जाती है। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम पत्थर मारने वाले को पकड़ने की बजाय पहले अपने घाव पर ध्यान दें, उसकी मरहम-पट्टी करें। किन्तु यदि हम पत्थर मारनेवाले के पीछे दौड़ेंगे तो अपने घाव को धूल तथा जीवाणुओं के लिए खुला छोड़ देंगे, जिससे उसे भरने में बहुत समय लग जायेगा। इसके अतिरिक्त, हम किसी को पकड़ कर गाली-गलौज कर लें, पिटाई कर डालें और बाद में मालूम हो कि हमने तो किसी गलत व्यक्ति की धुलाई कर दी तो? ऐसा भी तो सम्भव है कि पत्थर हमें दुर्घटनावश आ लगा हो। और यदि हमारी पकड़ में सही व्यक्ति भी आ गया तो उसकी पिटाई करने से हमारा घाव तो भर नहीं जायेगा ना ही पीड़ा दूर होगी। क्रोध की स्थिति भी घाव जैसी ही होती है। हमारी अविलम्ब प्रतिक्रिया होनी चाहिए कि हम इसे शांत करें, अतः उस समय हमें साक्षी-भाव से रहना चाहिए। यदि हम नकारात्मक विचारों से तादात्म्य कर लें और उनमें फँस कर रह जाएँ तो हम शीघ्र ही उन्हें वचन तथा कर्म में परिणत होते पायेंगे, जोकि आगे चल कर दुखदायी ही होने वाला है। हमने क्रोध के सामने घुटने टेक दिए तो शीघ्र ही जान जायेंगे कि यह हमारे लिए कहीं अधिक हानिकर है बजाय उस व्यक्ति के जो इसका कारण है।

अम्मा को यहाँ एक बस-कंडक्टर की कथा याद आती है। एक दिन उसे अपने एक स्टॉप पर एक हट्टा-कट्टा, सात-फुट लम्बा नया व्यक्ति दिखाई दिया। वो बस पर चढ़ा और एक सीट पर बैठ गया। जब कंडक्टर ने किराया माँगा तो उसने उत्तर में कहा कि, “राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं। ” दुबले से कंडक्टर ने गौर से उसे देखा और डर के मारे दोबारा नहीं माँगा। वो कोई गैंग-लीडर जान पड़ता था, अतः बिना कुछ और बोले कंडक्टर वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया। अगले दिन भी यही घटनाक्रम रहा। वो व्यक्ति उसी बस-स्टॉप से चढ़ा और टिकिट खरीदने के लिए उसका वही उत्तर था कि, “राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं। ” भीतर ही भीतर कंडक्टर क्रोध से उबल रहा था। वह उस गुंडे को सबक सिखाना चाहता था! उसे अब कुछ और सूझता ही न था। उसकी मनःशान्ति कहीं खो गई थी। और वो व्यक्ति प्रतिदिन बस पर चढ़ता, बिना टिकिट सफ़र करता और उतर जाता और कंडक्टर महाशय का क्रोध प्रतिदिन सातवाँ आसमान छूता। उसका मन इतना अशांत था कि वह अपने पत्नी-बच्चों के साथ भी बात नहीं कर पाता था। आखिर उसने सोचा कि बहुत हो गया, अब कुछ करना ही पड़ेगा। परन्तु समस्या थी कि वह स्वयं तो इतना छोटा, दुर्बल सा था। अतः उसने एक कराटे-टीचर से सहायता लेने का निर्णय किया। अब उसके जीवन का केंद्र-बिंदु कराटे बन गया, जिसमें निपुणता पाने के लिए वह छुट्टी पर भी रहने लगा। वो कराटे तथा मार्शल-आर्ट्स सीखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता था। सब सीखने के पश्चात् जब वह काम पर वापस लौटा तो विश्वस्त था कि अब वह सात-फुटे बदमाश से निपट सकता है। पहले ही दिन वो भारी-भरकम व्यक्ति स्टॉप पर मिल गया। हमेशा की तरह, आज भी कंडक्टर टिकिट देने लगा तो चिर-परिचित उत्तर सुनाई दिया, “राम सिंग को टिकिट की ज़रुरत नहीं।” परन्तु आज… कंडक्टर ने आवाज़ ऊँची करते हुए कहा, “ऐ भाई! यह सब नहीं चलेगा! टिकिट तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा, नहीं लोगे तो बस यहाँ से एक इंच भी आगे नहीं चलेगी!”

इस पर सात-फुटे आदमी ने कहा, “क्षमा चाहता हूँ, राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं है। मेरे पास फ्री-पास है।” और उसने जेब से फ्री-पास निकाला और परिवहन-विभाग के एक उच्च-अधिकारी के रूप में अपना परिचय दिया, जिस पद पर यात्रा हेतु फ्री-पास का विशेषाधिकार दिया जाता है।

तो यहाँ किसकी हार हुई? कंडक्टर ने कितने दिन गँवा दिए? उसने कराटे सीखने के लिए, व्यर्थ ही कितना समय तथा धन बर्बाद किया? कितना तनाव-ग्रस्त रहा? और फिर, घर की शान्ति भी नष्ट हुई। इस सब में उसे क्या मिला? कुछ भी तो नहीं!

क्रोध में ऐसा ही होता है। सब खोता ही है, प्राप्त कुछ नहीं होता। हमें यह सदा याद रखना चाहिए। जब क्रोध आने लगे तो उसे दबाना नहीं, अन्यथा आखिर एक दिन फट पड़ेगा। परन्तु तत्काल प्रतिक्रिया से भी बचें। जितना हो सके, मन को शांत करने का प्रयास करें। फिर बुद्धिमत्ता सहित स्थिति को आँकें। यदि हम ऐसा कर सकें तो जीवन में क्रोध से उत्पन्न होने वाली कितनी ही विपदाओं से बच सकते हैं!