प्राचीन काल में हुए हमारे महात्मा धैर्य व करुणा के प्रतीक थे। उनमें करुणा न होती तो यह जगत् सचमुच नरक-तुल्य ही होता। उनके त्याग तथा कृपा के बल पर ही यह विश्व टिका हुआ है। तनिक ध्यान दीजिये कि आज जगत् में क्या चल रहा है। इन ऋषियों की कृपा एवं त्याग का प्रकाश ही है जो स्वार्थी लोगों द्वारा संचित पापों के अंधकार को हटाने का कार्य करता है और मानव-समुदाय में समन्वय स्थापित करता है। वस्तुतः वे ही मनुष्य-जाति के सच्चे सेवक हैं। ऐसे संतों की कृपा से उनका उपहास करने वाले लोगों तक की भी शुद्धि होती है।

प्राचीन काल में, शिष्यगण गुरु के साथ वन में स्थित आश्रमों में रहते थे। वहां वे गुरु की देख-रेख में, उनकी प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए, अध्ययन करते। फिर अंततः, परम्परा के अनुसार प्रत्येक शिष्य गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा देता था। उन दिनों गुरु शिष्य से यदि कुछ लेते थे तो वो प्रथम व अंतिम दक्षिणा के रूप में ही होता था। शिष्यों द्वारा दी गई इन दक्षिणाओं के बल पर ही गुरुजन आश्रम चलाते तथा अपने व शिष्य के परिवार का भी भार-वहन करते थे। यह प्रथा इसीलिये प्रचलित हुई ताकि गुरु आगामी पीढ़ियों को विद्यादान करने में संलग्न रह सकें। तथापि, महत्व शिष्य द्वारा दिए गए धन अथवा सामग्री का नहीं होता था अपितु उसके मूल में निहित भाव का होता था।

एक बार एक राजा अपने पुत्र को ले कर ऐसे ही एक गुरु के पास आया। जब राजा अपने दल-बल के साथ गुरु के आश्रम में पहुँचा तो वहां उसके स्वागत के लिए कोई न था। राजा के साथ इसके पूर्व ऐसा कभी नहीं हुआ था। वह जहाँ भी जाता, उसका औपचारिक रूप से धूमधाम से स्वागत होता। परन्तु गुरुकुल के भीतर प्रवेश करने के पश्चात् भी कोई उसके स्वागतार्थ नहीं आया था। आखिर, बहुत ढूँढने के पश्चात्, उसने गुरु को एक वृक्ष के नीचे गहन समाधि में बैठे पाया। अपने आत्मानंद में डूबे गुरु को अपने आस-पास राजा की उपस्थिति का भान तक नहीं था। यूँ भी, राजा को गुरु के समाधि से बाहर आने की प्रतीक्षा करनी थी। अतः, ज्यों-ज्यों प्रतीक्षा का समय बढ़ता जाता, उसकी खीझ बढ़ती जा रही थी। आखिर उसने गुरु को, जिसे वह अहंकारी समझ बैठा था, सबक सिखाने का फैसला किया। किन्तु वह अपने पुत्र की विद्या की राह में बाधा भी उत्पन्न नहीं करना चाहता था। अतः उसने अपनी प्रतिशोध की भावना को स्थगित कर दिया। जब गुरु ने आँखें खोलीं तो राजा को वहां खड़े पाया और बड़ी विनम्रतापूर्वक उनके आगमन का आशय जानना चाहा। परन्तु राजा अब अपने क्रोध को संयमित न कर सका और बोल उठा कि, “तुम जानते नहीं कि जब राजा का आगमन हो तो उसका उचित आदर-सत्कार सहित स्वागत किया जाना चाहिए! आश्रम के शेष लोग कहाँ हैं?”

यह सुन कर ऋषि ने उत्तर दिया, “हे राजन, कृपया क्रोधित न हों। यहाँ के ब्रह्मचारी अपने-अपने कार्यों, जैसे अध्ययन, सेवा, होम, ध्यान तथा पूजा आदि, में व्यस्त हैं। इसीलिये आपका स्वागत करने के लिए कोई उपस्थित न था। कृपया इसे असम्मान का चिन्ह न मानें।” अब राजा किंचित शान्त हुआ और अपने पुत्र को वहाँ प्रवेश दिलवाया, किन्तु भीतर अब भी क्रोध शेष था जोकि पुत्र के गुरुकुल में रहने के दौरान बना ही रहा।

राजकुमार एक उत्तम छात्र था। अपनी विनम्रता, कर्मठता तथा गुरु-भक्ति द्वारा उसने सारे आश्रम का मन मोह लिया था। सभी कलाओं में निपुण हो गए राजकुमार में भक्ति, विनम्रता तथा अविचल गुरु-भक्ति जैसे गुण भी विकसित हो गए थे।

जिस दिन आश्रम से विदा लेने का समय आया तो उसने गुरु से पूछा कि क्या वह सदा के लिए आश्रम में रह सकता है! गुरु ने हँस कर कहा, “जब पौधा बड़ा हो जाए तो उसे उसके जन्म देने वाले वृक्ष से दूर कर देना चाहिए, तब ही उस पर फल-फूल आयेंगे। शिष्य की शिक्षा पूर्ण ही तब होती है जब वह गुरु की सुरक्षा से बाहर आता है। अतः अब तुम्हें राजमहल लौट जाना चाहिए। परमात्मा का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है!”

गुरु को प्रणाम कर राजकुमार ने कहा, “मेरे आभार के प्रतीक के रूप में, मैं आपके चरणों में कुछ अर्पण करना चाहता हूँ। कृपया आज्ञा कीजिये।”

यह सुन कर गुरु ने कहा, “अब तुम राजमहल लौटो। उचित समय आने पर, मैं दक्षिणा मांग लूँगा। उस समय तुम देने में संकोच न करना।”

“संकोच? आप कह कर तो देखिये, मैं अपनी जान तक दे दूंगा! मुझे केवल इतना आशीर्वाद दीजिये कि आपके दिखाए मार्ग से मैं कभी विचलित न होऊं और जीवन में कभी धर्म के मार्ग से भटकूँ नहीं।” ऐसा कह कर राजकुमार ने गुरु को साष्टांग प्रणाम किया और विदा हुआ।

जब राजकुमार लौट कर राज्य में आया तो सभी नागरिकों की प्रसन्नता की सीमा न रही। परन्तु पुत्र को देखते ही, इतने वर्षों से गुरु के प्रति राजा के भीतर सुप्त क्रोध भड़क उठा। उसने अपने सैनिकों को तुरन्त गुरु का आश्रम फूंक डालने की आज्ञा दे दी किन्तु पुत्र को इस बात की भनक तक न लगने दी। सैनिकों ने राजा के आदेश का पालन किया। राजा को खुश करने के लिए उन्होंने गुरु की पिटाई भी कर डाली तथा उनके शिष्यों को भी खदेड़ कर वन में भगा दिया। राजा के आनन्द का ठिकाना न रहा।

शीघ्र ही, युवराज के राज्याभिषेक का समय आ पहुँचा। राजसिंहासन पर आसीन होने के पूर्व, राजकुमार ने गुरु से आशीर्वाद लेने का निर्णय किया। जब वो उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ कभी आश्रम हुआ करता था, तो चकित रह गया। अब वहाँ कुछ बचा था तो मात्र राख के ढेर! थोड़ी देर खोजने के पश्चात्, उसे एक वृक्ष के नीचे गुरु जी ध्यानस्थ बैठे दिखाई दिए। उसने उन्हें दंडवत प्रणाम कर, अपने भावी राज्याभिषेक की सूचना दी। उसके पूछने पर कि आश्रम को क्या हुआ, गुरु ने बताया कि आश्रम दावानल में नष्ट हो गया। उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद दिया। तभी राजकुमार का ध्यान गुरु के सारे शरीर पर लगी चोटों की ओर गया। अब वह समझ पा रहा था कि वास्तव में क्या घटित हुआ था। आश्रम के लोगों ने उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया। अब युवराज क्रोध से आग-बबूला हो उठा। अपने घोड़े पर सवार हो कर उसने गर्जना की कि, “जिस व्यक्ति ने यह कुकृत्य किया है, उसे जान से मार देना चाहिए – फिर वो चाहे मेरे पिता हों या स्वयं भगवान् ही क्यों न उतर आयें!”

उसे रोकने का प्रयत्न करते हुए गुरु ने कहा, “पुत्र, अपने क्रोध को संयमित करो। क्रोध के बदले प्रेम करो, आवेश के स्थान पर धैर्य करना सीखो। मैंने सोचा तुमने स्वयं पर संयम पा लिया है।”

“नहीं, गुरुदेव, मैं प्रतिशोध का प्यासा हूँ।”

अंततः गुरु ने हार मानते हुए कहा, “ठीक है, मैं तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊँगा। परन्तु इसके पूर्व कि तुम जाओ, उस वचन का स्मरण करो जो तुमने मुझे दक्षिणा के समय दिया था। आज दक्षिणा देने का समय आ गया है।”

राजकुमार घोड़े से उतर कर बोला, “कृपया कहिये, मैं आपको क्या दे सकता हूँ?”

गुरु ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया, “अपने पिता के कर्मों को क्षमा कर दो। मुझे इतनी ही दक्षिणा चाहिए।”

राजकुमार भौंचक्का रह गया।

“मैं देह हूँ” – एक असत भावना है। देह को जीवन प्रदान करने वाला है वो चेतन तत्व जो हमारा असली स्वरूप है। उदाहरण के लिए, जब तक पीटर नामक एक व्यक्ति जीवित है तब तक उसे गली में से गुज़रते देख कर लोग कहते हैं, “वो देखो पीटर जा रहा है।” किन्तु जब वे पीटर के शव को श्मशान ले जाते हुए देखते हैं तब कोई ऐसा कहता है क्या? नहीं। तब वे कहते हैं, “वो देखो,पीटर का शव जा रहा है।” क्यों? क्योंकि भीतर रहने वाला चेतन तत्व, जो देह को जीवित बनाता है, अब उसमें प्रकट नहीं हो रहा।

दुर्भाग्यवश, हम अपने जीवन का आधार इस असत भावना को मानते हैं कि, “मैं देह हूँ।” उसके बाद, हमारा जीवन तथा जीवन शैली इस असत की आधारशिला पर निर्मित होते हैं। इस प्रकार हम, इस असत भावों की श्रृंखला में, अपने असली स्वरूप को भूल ही जाते हैं। यदि आरम्भ ही गलत होगा तो फिर हम कुछ भी करें, लक्ष्य-प्राप्ति नहीं हो सकेगी। “मैं देह हूँ” – इस असत के कारण हमने सत्य को पूर्णरूपेण भुला दिया है कि “मैं आत्मा हूँ।” यह कहना कठिन होगा कि यह अज्ञान की श्रृंखला कब और कहाँ शुरू हुई, हाँ इसका अन्त तब होगा जब हम आत्मबोध को प्राप्त होंगे।

यहाँ अम्मा को एक कथा याद आ गई। एक बार एक नवयुवक संभावित वधू को देखने उसके घर गया। लड़की के पिता बहुत धनवान थे और क्योंकि लड़का कुछ घबराया सा था अतः मनोबल बढ़ाने के लिए एक मित्र को साथ ले गया था। लड़की देखने तथा लड़की के पिता के साथ कॉफ़ी, नाश्ता करने के बाद, उन दोनों ने बातचीत शुरू की।

पिता ने पूछा, “काम कैसा चल रहा है?”
युवक ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, “अरे, छोटा-मोटा व्यापार है। कोई दिक्कत नहीं। आराम से चल रहा है।”
जिस मित्र को वह विश्वास बढ़ाने हेतु साथ लाया था, वो बीच में बोंल पड़ा, “क्या कह रहे हो? अरे श्रीमान, आज इनकी 27 दुकानें हैं और दूसरे जिलों में और भी खोलने वाले हैं। यह तो इनकी विनम्रता है कि यह ऐसा कह रहे हैं।”
तब लड़की के पिता ने पूछा, “तुम रहते कहाँ हो?”
नवयुवक बोला, “मेरा छोटा सा अपना घर है। ”
मित्र फिर से बीच में बोंल पड़ा, “श्रीमान, यह तो इनकी विनम्रता है। शहर में सबसे बड़ा बंगला इन्हीं का है। इनके दो-तीन और घर भी निर्माणाधीन हैं।”
कारों की बात चली तो लड़की के पिता ने प्रश्न किया कि, “अभी तुम्हारे पास कौन सी कार है?”
युवक ने उत्तर दिया, “छोटी सी कार है जो मैं यदा-कदा ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल करता हूँ।”
एक बार फिर, मित्र ने टोका, “श्रीमान,आज इन के पास तीन कारें हैं। तीन और विदेशी कारें खरीदने वाले हैं!”
अचानक नवयुवक खाँसने लगा तो लड़की के पिता ने पूछा, “क्यों बेटा, तुम्हें सर्दी हुई है क्या?”
युवक ने उत्तर दिया, “कुछ नहीं, दो-तीन दिन से कुछ मौसम बदलने के कारण…।”
मित्र बोला, “मौसम के कारण? क्या कह रहे हो? श्रीमान जी, इन्हें तो टी.बी. है!”
अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि विवाह की बातचीत कहाँ संपन्न हुई होगी। इसी प्रकार की हमारी यह समस्या है। हम असत को जीते आ रहे हैं।

हमारे ऋषियों ने जीवन की तुलना एक बुलबुले से की है। वस्तुतः, यह जीवन नहीं अपितु अहम् हैं, अहम् के साथ हमारा तादात्म्य है जिसकी तुलना बुलबुले से की जानी चाहिए। अनन्त काल की प्रतीक्षा के पश्चात् हमें यह मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ है, इसे हमें यूँ ही बुलबुला फूट जाने के समान व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। जीवन भर, हमें सभी कर्म कुछ इस प्रकार करने चाहियें मानो एक शांतिपूर्ण मृत्यु की तैयारी चल रही हो। जन्म और मृत्यु हमारे लिए परमात्मा की देन हैं।

बच्चो, हमें इस जन्म में कोई गलत कदम नहीं उठाना। जन्म और मृत्यु हमारी चेतना के क्षेत्र के परे की वस्तु हैं। अतः, इस छोटे से जीवन काल में, सावधान रह कर, हमें सत्कर्म करने चाहियें। हमारा वर्तमान मिथ्याबोध है शरीरम् सत्यम् आत्मा मिथ्या – “शरीर सत्य और आत्मा मिथ्या है।” आत्मा का हमें विस्मरण हो गया है। बच्चो, आत्मा, सत्य को हमें कभी भूलना नहीं चाहिए। न भूलने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है!

अम्मा के मन में कुछ चल रहा है। प्रकृति एक विशाल बगिया है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे एवं लोग इस बगिया के विविध रंगों के पूर्ण-विकसित फ़ूल हैं। इस फुलवारी का सौन्दर्य तभी पूर्ण होता है जब ये सब एक होकर रहें, प्रेम तथा एकता की तरंगें फैलाएं। ईश्वर करें कि हम सबके मन प्रेम में भीग कर एक हो जाएँ! आइये, हम मिल-जुल कर इन विविध फ़ूलों को मुरझाने से बचाने का कार्य करें ताकि यह फुलवारी नित्य-सुन्दर बनी रहे!

करुणा को विकसित करने के लिए सर्वप्रथम महत्व की बात है कि जिन वस्तुओं को हम निर्जीव समझते हैं जैसे; पत्थर, रेत, चट्टानें तथा लकड़ी आदि – उन सबके प्रति हमारे मन में प्रेम व आदर की भावना हो। यदि हम निर्जीव वस्तुओं के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति अनुभव कर सकते हंं तो वृक्षों, लताओं, पशु-पक्षियों तथा सागर, नदियों, पर्वतों व शेष सारी प्रकृति के प्रति भी प्रेम व करुणा जैसे भावों को विकसित करना सुगम हो जाता है। यदि हम इस पड़ाव तक पहुँच जाएँ तो सम्पूर्ण मानव-जाति तक करुणा-भाव के विकास की यात्रा स्वतः हो जाएगी।

क्या हमें कुर्सी तथा चट्टानों को धन्यवाद नहीं देना चाहिए जो हमें बैठने के लिए, विश्राम करने के लिए स्थान प्रदान करते हैं? धरती माता के प्रति आभारी नहीं होना चाहिए जो धैर्यपूर्वक हमें अपनी गोद में भागने, खेलने-कूदने के लिए आश्रय देती है? उन पक्षियों का कृतज्ञ नहीं होना चाहिए जो हमारे लिए गाते हैं, उन फ़ूलों का जो हमारे लिए खिलते हैं, उन वृक्षों का जो हमें छाया देते हैं तथा उन नदियों का जो कल-कल करती हमारे लिए बहती हैं? हर सुबह एक नव-सूर्योदय हमारा स्वागत करता है। रात को जब हम सब कुछ भुला कर सो जाते हैं तब हमारे साथ कुछ भी हो सकता है, हमारी मृत्यु भी सम्भव है। क्या हम उस अद्भुत शक्ति का धन्यवाद करते हैं जिसने हमें अगले दिन सुबह उठ कर पूर्ववत ही सब कार्य करने योग्य बनाये रखा, हमारे देह व मन को सभी प्रतिकूलताओं से बचा कर रखा? यदि हम इस प्रकार से देखें तो क्या हमें प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति के प्रति आभारी नहीं होना चाहिए? केवल करूणामय लोग ही आभार प्रकट कर सकते हैं।

मनुष्य द्वारा प्रेरित युद्ध एवं मृत्यु का कोई अन्त नहीं और न ही ऐसी त्रासदियों के पीड़ितों द्वारा बहाए गए आंसुओं का। ये सब आखिर किसलिए? विजय-पताका फ़हराने, अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने तथा अपनी धन व प्रतिष्ठा के लोभ के लिए ही तो! मनुष्य जाति अनेकों प्रकार से अभिशप्त है और इन श्रापों से मुक्ति पाने के लिए कम से कम आगामी सौ पीढ़ियों को दीन-दुखियों के आँसू पोंछ कर उन्हें ढाढस बंधा कर उनका दुःख कम करना चाहिए। कम से कम अब तो, प्रायश्चित के तौर पर ही सही, क्या हमें आत्मनिरीक्षण नहीं करना चाहिए?

किसी सत्ता-लोलुप, स्व-केन्द्रित, स्वार्थी राजनेता को दुनियाँ पर विजय पा कर या लोगों को सता कर सुख-शान्ति की प्राप्ति नहीं हुई। इतिहास साक्षी है-उनकी मृत्यु तथा उसके पूर्व का समय भी जीते-जी नरक-तुल्य ही था। हमें इस अनमोल अवसर को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हुए शान्ति व करुणा के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।

जिसके पास दौलत, अस्त्र-शस्त्र तथा ज्ञान-विज्ञान है, वह युद्ध आरम्भ कर सकता है। किन्तु कोई भी प्रेम तथा हार्दिक एकता को परास्त नहीं कर सकता। कदाचित, हमारे अंतःकरण, आँखें, कान व हाथ दूसरों के दुःख-दर्द को सचमुच समझ पाते, महसूस कर पाते! कितनी आत्महत्याओं को घटने से बचाया जा सकता था? कितने लोगों को भोजन, वस्त्र तथा आवास प्राप्त हो सकता था? कितने बच्चों को अनाथ होने से बचाया जा सकता था? कितनी ही महिलाओं को आजीविका हेतु देह के व्यापार को गले लगाने से रोका जा सकता था? कितने असह्य पीड़ा से ग्रस्त अस्वस्थ लोगों को दवा दे कर इलाज किया जा सकता था? धन-संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाले कितने ही झगड़ों को टाला जा सकता था?

जानते हो, एक सच्चे साहसी नेता होने के लिए कौन से गुण वांछनीय होते हैं? वो हैं – करुणा व मैत्री। आज हम विश्व भर में दृष्टि दौडाएं तो दौलत तथा शस्त्र हाथ में हों तो कोई भी युद्ध का बिगुल बजा देगा परन्तु कोई भी करुणा, मैत्री के बल पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मेरे बच्चों को यह कभी न भूले। निर्जीव वस्तुओं के साथ सम्मानपूर्वक पेश आयें तो हम प्रेम व करुणा पर आधारित एक नई भाषा का निर्माण कर सकते हैं। शनैः-शनैः हम अपने आस-पास के लोगों का आदर करने लगेंगे। इस प्रकार हम धीरे-धीरे एक नवयुग का निर्माण कर सकते हैं – एक सुख-शान्तिपूर्ण विश्व का! हम सबको ऐसे ही विश्व के निर्माण में संलग्न होना चाहिए!

हममें से अधिकतर लोग क्या भूत के विलाप और भविष्य की चिन्ता में ही जीवन नहीं बिता देते? लगभग सभी वर्तमान क्षण के सुख से वंचित रह जाते हैं। हम जीवन के सौन्दर्य व आनन्द को भूल जाते हैं। यह सब हमारी मनःस्थिति के कारण होता है। हमें एक दरजी जैसा होना चाहिए। यहाँ अम्मा का अभिप्राय यह नहीं कि हमें आजीविका के लिए कपड़े सीना शुरू कर देना चाहिए। हम जितनी बार दरजी के पास जाते हैं, वह हर बार कपड़ों की सिलाई से पहले हमारा नया नाप लेता है। चाहे उसकी डायरी में पिछले महीने ही नाप लिखा गया हो, फिर भी वह दोबारा नाप लेता है ताकि जांच ले कि हमारी बाँहें छोटी-बड़ी तो नहीं हुईं अथवा हमारी लम्बाई आदि बढ़ तो नहीं गई। वह हमारे पुराने नाप पर भरोसा नहीं करता, अपितु वर्तमान नाप के अनुसार ही कपड़े सीता है। बच्चो, तुम्हारा भी दृष्टिकोण ऐसा ही होना चाहिए। हमारे पास केवल यही क्षण है। इसमें अपने पूर्वनिर्धारित मतों के साथ प्रवेश न करो। जब हम भूतकाल पर विलाप करते हुए अथवा भविष्य की चिंता में जीते हैं तो वर्तमान क्षण के सौन्दर्य की अनुभूति से चूक जाते हैं।

 

तुमने उन दो अजनबियों की कहानी तो सुनी होगी जिनकी भेंट रेलगाड़ी में होती है। एक यात्री ने पास बैठे व्यक्ति से समय पूछा। उसे समय बताने की बजाय, इस व्यक्ति ने उसे कोसना और गालियाँ देना शुरू कर दिया। उस व्यक्ति को बार-बार गालियाँ खाते हुए देख कर, आख़िरकार डिब्बे में सवार एक अन्य व्यक्ति से रहा न गया और वह बोला, “ऐ! तुम क्यों उस बेचारे पर इस तरह बरस रहे हो? उसने तुमसे समय ही तो पूछा है।”

उस व्यक्ति ने अपने गाली-गलौज को तनिक विराम देते हुए कहा, “हाँ, अभी तो इन्होंने समय ही पूछा है। मान लो मैं समय बता देता हूँ, उसके बाद ये मुझसे मौसम पर चर्चा करने लगेंगे। फिर वर्तमान घटनाओं पर चर्चा होगी, फिर मेरे पसन्द/नापसंद के बारे में। फिर ये मुझे अपनी काम-काजी संभावनाओं से अवगत करायेंगे। और फिर मैं इन्हें पसन्द करने लगूंगा, अपने घर आमन्त्रित करूंगा। मेरी एक बहुत सुन्दर बेटी है जो मेरी सारी संपत्ति की मालिक है। इनकी मीठी, लच्छेदार बातों में आ कर वो आकर्षित हो जाएगी। तब ये मुझसे उसका हाथ मांगेंगे। फिर मैं अपनी बेटी की शादी इस आदमी से करने के लिए बाध्य हो जाऊँगा जिसके पास एक घड़ी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं!” एक सांस में वो यह सब कह गया!

देखो, उसका मन कहाँ-कहाँ गया! अपने सह-यात्री को ले कर उसने क्या-क्या सोच डाला! उसने खिड़की से बाहर, गुज़रते हुए सुन्दर दृश्य को नहीं देखा, यात्रा की सुन्दरता के आनन्द से चूक गया। मेरे बच्चों के मन ऐसे नहीं होने चाहियें। विश्व भर में हमारा मन सबसे बड़ा यात्री है। मन को संयमित करने के लिए कुछ प्रयत्न आवश्यक है। मन की शांति भंग करने वाली वस्तुओं से स्वयं को हटाने के लिए कुछ प्रयत्न तो करना ही होगा। हमने लोगों को कहते हुए सुना ही होगा, “मेरा बेटा बहुत मेधावी है; लेकिन उसका पढने को मन ही नहीं करता।” मेधावी होने से क्या लाभ यदि हम उस बुद्धि का उपयोग ही न करें तो? केवल बुद्धिमान होना पर्याप्त नहीं; सीखने की इच्छा भी तो होनी चाहिए। प्रयत्न तो वांछित है और यह इच्छा अपने भीतर उपजनी चाहिए।

कुछ लोग आ कर मुझसे कहते हैं कि, “अम्मा, हम प्रार्थना करते हैं, नियमित रूप से मंदिरों में जाते हैं फिर भी कितने दुखों, निराशाओं को झेलते हैं। और हमारा पड़ोसी, जो सदा भगवान् की हंसी उड़ाता है, बड़ा समृद्ध भाग्यवान है। हमारा तो भगवान् से विश्वास उठने लगा है।”

बच्चो, ऐसा नहीं बोलना चाहिए। ऐसी विषमताओं को देख कर हमें न तो हवा में उड़ना चाहिए और न ही कागज़ की किश्तियों जैसे डूब जाना चाहिए। लिखते समय, हम एक वाक्य के बाद विराम-चिन्ह क्यों लगाते हैं? ताकि नया वाक्य शुरू कर सकें। हमारा जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए। पीड़ा के समय भगवान् को कस कर पकड़े रहें। और इससे भी बढ़ कर, जीवन का अन्त करने का प्रयास तो कभी नहीं करना चाहिए। भटकता मन हमें बहुत कुछ कहेगा। पर कठिन समय के चलते हमारा मन टूट कर बिखर न जाए। मन को सम्भालो।

काल का पहिया घूमता रहता है। प्रारब्ध कितने ही रूपों में हमारे सामने आता है। परिवर्तन कभी शीघ्र आता है तो कभी देरी से। इसलिए कठिनाइयों के कारण जीवन का अन्त करने का विकल्प कभी अपने मन में न लायें। कठिन समय को प्रार्थना बदल सकती है। प्रार्थना के माध्यम को पकड़े रखो। हर समस्या का समाधान होता है। कुछ रोगों का इलाज दवा से होता है, कुछ को ओपरेशन की ज़रूरत होती है। ऐसा ही कठिनाईयों को ले कर भी होता है। अतः परमात्मा को कस कर पकड़े रखो। इसके लिए, प्रयत्न करना होगा। कुछ अच्छा पाने के लिए, प्रयत्न की सदैव आवश्यकता होती है, जबकि चिंता या निराशा में डूबने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता।

हमें चाहिए – समय, प्रयत्न तथा परमात्मा की कृपा। यदि हम गुलाब के पौधे लगायें तो हमें इसे पानी और खाद से सींचना चाहिए। सही समय पर लगने पर भी फलने-फूलने के लिए इसे कुछ समय चाहिए। तब तक, भारी बारिश भी इसके लिए जानलेवा हो सकती है। अतः प्रयत्न के साथ-साथ परमात्मा की कृपा भी आवश्यक है। और फिर, हमारे पुरुषार्थ का फ़ल भी तत्काल तो नहीं प्राप्त होता, समय से ही होता है। किन्तु अम्मा अपने बच्चों को एक बात कहेगी – परमात्मा की कृपा हो तो मेरे बच्चों के प्रयासों से वांछित परिणाम निश्चित ही प्राप्त होंगे।

अम्मा के विदेशी भक्त, युद्ध के कभी न समाप्त होने वाले भीषण आक्रमणों पर, प्रायः अपनी कुण्ठा व्यक्त करते हैं। वे अम्मा से पूछते हैं, “क्या इस पागलपन का कोई अन्त नहीं है?”

जगत् के आदि से ले कर संघर्ष चला आ रहा है। यह कहना कि इसे पूर्णतया समाप्त कर देना असंभव है, व्यग्रता को जन्म देता है। किन्तु सत्य तो यही है, है ना? क्योंकि जगत् में भले और बुरे का द्वंद्व सदा रहेगा। हमारे भले की स्वीकृति व बुराई के त्याग के संघर्ष में इस सम्भावना का पूर्णरूपेण समापन असम्भवप्राय हो जाता है। लगभग सभी देशों में यह संघर्ष आंतरिक विवादों, युद्ध तथा हड़तालों के रूप में उभर कर सामने आता है। यद्यपि अधिकांश युद्धों का उद्देश्य निजी-हितों की रक्षा होता है परन्तु यदा-कदा ऐसी परिस्थितियाँ भी रहीं जब जन-सामान्य की आवश्यकताओं तथा हित पर भी विचार किया गया और अधिक लाभ प्राप्त हुआ।

दुर्भाग्यवश, मनुष्य ने अधिकांश युद्ध सत्य व न्याय की पुष्टि हेतु नहीं अपितु स्वार्थ से प्रेरित होकर लड़े हैं। लगभग 5000 वर्ष पूर्व, भारतीय सम्राट, मौर्य वंश के प्रवर्तक, चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य तक सभी भारतीय युद्धों में सत्य तथा धर्म की मुख्य भूमिका रही। उस समय भी शत्रु को पराजित करना, आवश्यक हो तो उसका विनाश भी करना, युद्ध का भाग हुआ करते थे। परन्तु युद्ध के दौरान युद्धक्षेत्र पर स्पष्ट नियम हुआ करते थे।

उदाहरण के लिए, पैदल सेना को पैदल सैनिकों से ही युद्ध करना होता था तथा घुड़सवारों को घुड़सवारों से। हाथी पर चढ़े अथवा रथी योद्धा अपने समकक्ष योद्धाओं के साथ ही युद्ध करते थे। ऐसे ही नियम गदा, तलवार, भाले-धारियों तथा धनुष-बाण- धारी योद्धाओं पर लागू होते। सैनिकों को घायल, निहत्थे सैनिकों व स्त्रियों, बालकों, बूढ़ों तथा रोगियों पर आक्रमण करने की अनुमति नहीं हुआ करती थी। युद्ध का आरम्भ प्रातःकाल, शंखनाद के साथ होता और ठीक सूर्यास्त के समय विराम हो जाता और दोनों पक्षों के सैनिक परस्पर शत्रुता को भुला कर मित्रों की भाँति इकट्ठे भोजन करते। अगले दिन, फिर से सूर्योदय के साथ युद्ध पुनः आरंभ होता। कभी-कभी विजेता राजा युद्ध में जीता हुआ पराजित राजा का राज्य तथा धन उस पराजित राजा अथवा उसके उत्तराधिकारी को लौटा देते। युद्धों में भी ऐसी महान परम्परा थी, जिसमें युद्धभूमि पर तथा उसके बाहर भी शत्रु के प्रति भी सम्मान व उदारता का भाव होता था। शत्रु-राज्य के नागरिकों की भावनाओं एवं संस्कृति का भी सम्मान किया जाता था। ऐसे साहसी थे उस समय के लोग!

आजकल आतंकवादी हमलों की रोकथाम हेतु एअरपोर्ट तथा अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में कड़े सुरक्षा नियम लागू किये जाते हैं। हमारी शारीरिक सुरक्षा के लिए ये नियम आवश्यक हैं परन्तु यह कोई समाधान तो नहीं। वस्तुतः एक ऐसी विस्फोटक पदार्थ है जोकि सबसे घातक है और किसी मशीन द्वारा उसका पता नहीं लगाया जा सकता – वो है मानव-मन में भरी घृणा और बदले की भावना। जब तक हम अपने मन से इन घातक भावनाओं का निर्मूलन नहीं करेंगे, तब तक युद्ध और हिंसा का अन्त नहीं हो सकता।

आजकल, युद्ध में शत्रु-देश को हर सम्भव दृष्टि से नष्ट किया जाता है। विजेता परास्त देश की भूमि, प्राकृतिक-संसाधनों तथा धन-संपत्ति पर एकाधिकार स्थापित कर, लूटपाट करते हैं व अपने मौज-मज़े के लिए प्रयोग करते हैं। जो संस्कृति, परम्परा पीढ़ियों से विरासत में प्राप्त हुई थी, उसका समूल नाश कर दिया जाता है, भोले-भाले लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। इसके अतिरिक्त, बमों तथा अन्य शस्त्रों द्वारा भारी मात्रा में छोड़े गए विषाक्त धुंए द्वारा जलवायु व मिट्टी के प्रदूषण की तो हम थाह भी नहीं पा सकते। परिणामस्वरूप कितनी आगामी पीढ़ियों को शारीरिक व मानसिक दुःख सहने पड़ते हैं। युद्ध के पश्चात् कुछ शेष बचता है तो केवल मौत, गरीबी, भुखमरी व महामारी। युद्ध के मानवता को यही उपहार हैं।

आज कुछ आर्थिक दृष्टि से संपन्न देश मात्र इसीलिये युद्ध को भड़काते हैं ताकि उनके आधुनिकतम शस्त्रों के विक्रय में वृद्धि हो। हम जो कुछ करें, भले वो युद्ध ही हो, उसका लक्ष्य सत्य एवं धर्म की रक्षा ही होना चाहिए। अम्मा यह नहीं कहना चाहती कि युद्ध अटल हैं। देखा जाए तो किसी भी काल में युद्ध अनिवार्य नहीं होता। परन्तु जब तक मानव के मन में द्वंद्व जारी है तब तक क्या हम बाह्य जगत् से युद्ध का पूर्णतः उन्मूलन कर पाएंगे? यह सोचने जैसी बात है।

आज विश्व में अनेकों द्वंद्वों का एक मुख्य कारण है – विज्ञान व धर्म में अलगाव। वास्तव में, विज्ञान तथा धर्म को कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ना चाहिए। विज्ञान के बिना धर्म और धर्म के बिना विज्ञान अधूरे हैं। विज्ञान की सहायता से हमें मनुष्य के मन से घृणा एवं बदले की भावना को पूर्णरूपेण उखाड़ फेंकना चाहिए। सब धर्मों का सार प्रेम ही है। वैज्ञानिक उत्कर्ष का लक्ष्य समाज का उत्थान होना चाहिए। हमें इतिहास से शिक्षा लेनी चाहिए किन्तु वहीं रुक नहीं जाना चाहिए। विज्ञान तथा अध्यात्म के मिलन द्वारा हम भूतकाल के अंधकारमय गलियारों से बाहर, शान्ति, एकता तथा मैत्री के प्रकाश में आ पहुंचेंगे।

बच्चो, हम सबको इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए।