कल्पना करो कि हम जन-समूह में हैं और हमें एक पत्थर आ कर लगता है और हमें चोट लग जाती है। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम पत्थर मारने वाले को पकड़ने की बजाय पहले अपने घाव पर ध्यान दें, उसकी मरहम-पट्टी करें। किन्तु यदि हम पत्थर मारनेवाले के पीछे दौड़ेंगे तो अपने घाव को धूल तथा जीवाणुओं के लिए खुला छोड़ देंगे, जिससे उसे भरने में बहुत समय लग जायेगा। इसके अतिरिक्त, हम किसी को पकड़ कर गाली-गलौज कर लें, पिटाई कर डालें और बाद में मालूम हो कि हमने तो किसी गलत व्यक्ति की धुलाई कर दी तो? ऐसा भी तो सम्भव है कि पत्थर हमें दुर्घटनावश आ लगा हो। और यदि हमारी पकड़ में सही व्यक्ति भी आ गया तो उसकी पिटाई करने से हमारा घाव तो भर नहीं जायेगा ना ही पीड़ा दूर होगी। क्रोध की स्थिति भी घाव जैसी ही होती है। हमारी अविलम्ब प्रतिक्रिया होनी चाहिए कि हम इसे शांत करें, अतः उस समय हमें साक्षी-भाव से रहना चाहिए। यदि हम नकारात्मक विचारों से तादात्म्य कर लें और उनमें फँस कर रह जाएँ तो हम शीघ्र ही उन्हें वचन तथा कर्म में परिणत होते पायेंगे, जोकि आगे चल कर दुखदायी ही होने वाला है। हमने क्रोध के सामने घुटने टेक दिए तो शीघ्र ही जान जायेंगे कि यह हमारे लिए कहीं अधिक हानिकर है बजाय उस व्यक्ति के जो इसका कारण है।

अम्मा को यहाँ एक बस-कंडक्टर की कथा याद आती है। एक दिन उसे अपने एक स्टॉप पर एक हट्टा-कट्टा, सात-फुट लम्बा नया व्यक्ति दिखाई दिया। वो बस पर चढ़ा और एक सीट पर बैठ गया। जब कंडक्टर ने किराया माँगा तो उसने उत्तर में कहा कि, “राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं। ” दुबले से कंडक्टर ने गौर से उसे देखा और डर के मारे दोबारा नहीं माँगा। वो कोई गैंग-लीडर जान पड़ता था, अतः बिना कुछ और बोले कंडक्टर वापस अपनी सीट पर आ कर बैठ गया। अगले दिन भी यही घटनाक्रम रहा। वो व्यक्ति उसी बस-स्टॉप से चढ़ा और टिकिट खरीदने के लिए उसका वही उत्तर था कि, “राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं। ” भीतर ही भीतर कंडक्टर क्रोध से उबल रहा था। वह उस गुंडे को सबक सिखाना चाहता था! उसे अब कुछ और सूझता ही न था। उसकी मनःशान्ति कहीं खो गई थी। और वो व्यक्ति प्रतिदिन बस पर चढ़ता, बिना टिकिट सफ़र करता और उतर जाता और कंडक्टर महाशय का क्रोध प्रतिदिन सातवाँ आसमान छूता। उसका मन इतना अशांत था कि वह अपने पत्नी-बच्चों के साथ भी बात नहीं कर पाता था। आखिर उसने सोचा कि बहुत हो गया, अब कुछ करना ही पड़ेगा। परन्तु समस्या थी कि वह स्वयं तो इतना छोटा, दुर्बल सा था। अतः उसने एक कराटे-टीचर से सहायता लेने का निर्णय किया। अब उसके जीवन का केंद्र-बिंदु कराटे बन गया, जिसमें निपुणता पाने के लिए वह छुट्टी पर भी रहने लगा। वो कराटे तथा मार्शल-आर्ट्स सीखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता था। सब सीखने के पश्चात् जब वह काम पर वापस लौटा तो विश्वस्त था कि अब वह सात-फुटे बदमाश से निपट सकता है। पहले ही दिन वो भारी-भरकम व्यक्ति स्टॉप पर मिल गया। हमेशा की तरह, आज भी कंडक्टर टिकिट देने लगा तो चिर-परिचित उत्तर सुनाई दिया, “राम सिंग को टिकिट की ज़रुरत नहीं।” परन्तु आज… कंडक्टर ने आवाज़ ऊँची करते हुए कहा, “ऐ भाई! यह सब नहीं चलेगा! टिकिट तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा, नहीं लोगे तो बस यहाँ से एक इंच भी आगे नहीं चलेगी!”

इस पर सात-फुटे आदमी ने कहा, “क्षमा चाहता हूँ, राम सिंग को टिकिट की ज़रूरत नहीं है। मेरे पास फ्री-पास है।” और उसने जेब से फ्री-पास निकाला और परिवहन-विभाग के एक उच्च-अधिकारी के रूप में अपना परिचय दिया, जिस पद पर यात्रा हेतु फ्री-पास का विशेषाधिकार दिया जाता है।

तो यहाँ किसकी हार हुई? कंडक्टर ने कितने दिन गँवा दिए? उसने कराटे सीखने के लिए, व्यर्थ ही कितना समय तथा धन बर्बाद किया? कितना तनाव-ग्रस्त रहा? और फिर, घर की शान्ति भी नष्ट हुई। इस सब में उसे क्या मिला? कुछ भी तो नहीं!

क्रोध में ऐसा ही होता है। सब खोता ही है, प्राप्त कुछ नहीं होता। हमें यह सदा याद रखना चाहिए। जब क्रोध आने लगे तो उसे दबाना नहीं, अन्यथा आखिर एक दिन फट पड़ेगा। परन्तु तत्काल प्रतिक्रिया से भी बचें। जितना हो सके, मन को शांत करने का प्रयास करें। फिर बुद्धिमत्ता सहित स्थिति को आँकें। यदि हम ऐसा कर सकें तो जीवन में क्रोध से उत्पन्न होने वाली कितनी ही विपदाओं से बच सकते हैं!

जब हम किसी से प्रश्न करते हैं कि जीवन कैसा चल रहा है तो केवल दुःख भरी कथाएँ ही सुनने को मिलती हैं। इसका कारण क्या है? बिना सोची-समझी आसक्ति ही हमारे जीवन में दुःख को निमंत्रित करती है। क्या हमें इससे कुछ सार्थक भी प्राप्त होता है? अपने परिवार के सदस्यों की हमारी अनवरत चिंता, किसी प्रकार से उन्हें या हमें लाभ पहुँचाती है? वस्तुतः, समय की बर्बादी के सिवा इससे कुछ और प्राप्त नहीं होता।

वास्तव में, हम सदा अकेले ही हैं, सबके बीच रह कर भी अकेले हैं, फिर जब अकेले होते हैं तब तो अकेले होते ही हैं। कभी ऐसा भी होता है जब ऐसा न हो? नहीं, फिर भी हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। आज हमारा जीवन दूसरों की एक मुस्कान पर आश्रित है! कोई हमारी ओर देखे, मुस्काए तो हम प्रसन्न, अन्यथा निराश हो जाते हैं। इससे हममें या तो आत्महत्या करने की अथवा दूसरे की हत्या कर देने की इच्छा होने लगती है। कितने ही लोगों का सम्पूर्ण जीवन उन अनेकों अत्याचारों, अन्यायों का बदला लेने के लिए समर्पित होता है – जो उन्हें लगता है उनके साथ हुए हैं। इस प्रकार, हम कभी स्वयं हो कर नहीं रहते और अपने जीवन के लक्ष्य से चूक जाते हैं। अतः, हमें चाहिए कि अपने कर्मों में सजग हों, जागृत हो कर रहें। इसका सरलतम उपाय है ध्यान।

बच्चों, सदा याद रखो कि ध्यान स्वर्ण-समान अनमोल है। यह सांसारिक समृद्धि, मुक्ति तथा मनःशान्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। कहते हैं कि, “ध्यान, जप से दस लाख गुणा बढ़ कर है।” अर्थात् ध्यान में लगाया गया थोड़ा सा समय लाखों की संख्या में किये मन्त्र-जप के समान होता है।

आँखें मूँद कर, फ़र्श पर आलती-पलती लगा कर बैठ जाने का नाम ही ध्यान नहीं होता। अपने कर्मों, विचारों तथा वचनों में सजगता विकसित करना ही सच्चा ध्यान है।

विचार पानी की छोटी-छोटी बूंदों के समान हैं, एकत्रित हो जाएँ तो वचनों तथा कर्मों की विशाल नदी बन जाएँ। एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पनप कर, एक विशाल नदी बन कर बाहर बह निकलता है और फिर हमारे वश से बाहर हो जाता है। प्रारम्भ होती हुई एक नदी को रोक देना कठिन नहीं है, एक ईंट भी इसके प्रवाह को मोड़ देने के लिए पर्याप्त है। किन्तु बड़ी होने पर यह हमारे वश की बात नहीं रहती। अतः मेरे बच्चों, हमें अपने विचारों के प्रति बहुत सजग रहना चाहिए। क्योंकि विचार वचन का रूप लेते हैं और फिर वचन कर्म का। फिर इसके प्रवाह की दिशा में परिवर्तन अत्यन्त कठिन हो जाता है। इसीलिये अम्मा कहती है कि मेरे बच्चों को अपने विचारों, वचन तथा कर्म को ले कर अति सजग रहना चाहिए।

यदि सांचा ही बिगड़ जाए तो उसमें डाला गया कोई भी पदार्थ ठीक नहीं बनेगा। उसी प्रकार, यदि हम अपने मन का निर्देशन भलीभांति नहीं करते तो इसमें से जो भी आएगा – विचार अथवा वचन – अनुचित होगा। अतः, सर्वप्रथम अपने मन को संयमित करो और उसका एकमात्र उपाय ध्यान है। ध्यान के माध्यम से हमारा अपने भीतरी मौन से आमना-सामना होता है। बच्चों, ध्यान का अभ्यास अभ्यास अवश्य करना। अम्मा कहती है, “ध्यान जीवन का आवश्यक अंग है।” इससे हमारे मन-वचन तथा कर्म में पवित्र होते हैं। फ़िर भौतिक समृद्धि भी पीछे-पीछे आ जाती है।

प्रतिदिन थोड़ा सा समय ध्यान के लिए अवश्य रखना चाहिए। इससे मेरे बच्चों को मनः शान्ति तथा परमात्म-कृपा – दोनों की प्राप्ति होगी। बच्चों, स्मरण रहे कि ध्यान से सम्पूर्ण विश्व को लाभ होता है।

बच्चो, ऐसा नहीं लगता कि विश्व में आज जहाँ देखो, वहीं समस्याएं हैं? भारत के नगरों में बम्ब फटने का, आतंकवादी हमलों का भय है। अम्मा को ज्ञात है कि हम सब इनके तथा अन्य खतरों के विषय में चिंतित हैं। विश्व-भर की समस्याओं का एकमात्र उत्तर है – करुणा।

सब धर्मों के मूलभूत सिद्धान्त दूसरों के प्रति करुणापूर्ण व्यवहार है। धर्मगुरुओं को अपने जीवन में इसका आचरण कर, दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। आज विश्व में ऐसे अनुकरणीय व्यक्तियों का विशेष अभाव है। धर्मगुरुओं को इस अभाव की पूर्ति करने का साहस कर दिखाना चाहिए।

उन्हें विश्व-एकता तथा प्रेम के गीत को गाने की पहल करनी चाहिए, विश्व हेतु दर्पण-सदृश बनना चाहिए। दर्पण को साफ़ उसकी सफ़ाई के लिए नहीं किया जाता अपितु उन लोगों के लिए किया जाता है जो उसमें अपना मुख देखते हैं ताकि वे अपने मुखमंडल को बेहतर साफ़ कर सकें। धर्म के इन दूतों को अनुकरणीय बनना होगा क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण का सीधा प्रभाव, उनके अनुयायियों के वचनों तथा कर्मों की शुद्धि पर पड़ता है। जब सदाचारी लोग स्वयं आदर्शों का आचरण करते हैं, तभी उनके अनुयायी भी उसी उत्साह से श्रेष्ठ-आचरण हेतु प्रेरित होते हैं।

एक सीमा तक, प्रत्येक व्यक्ति को अनुकरणीय बनना चाहिए क्योंकि कोई न कोई हमसे अवश्य प्रेरित होता है। अतः हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम उनके लिए अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करें। अनुकरणीय लोगों के उस विश्व में, फिर न युद्ध होंगे और न शस्त्र, वे भूतकाल के एक दुस्वप्न की भाँति हो जायेंगे। हथियार संग्रहालय के लिए कलाकृति-मात्र हो कर रह जायेंगे-भूतकाल की उन स्मृतियों के रूप में, जब मनुष्य अपने लक्ष्य के पथ से भटक गया था।

हमारी भूल यह है कि हम धर्म की उथली बातों में फंस कर रह गए हैं, इसे हमें सुधारना होगा। आइये, हम मिल जुल कर धर्म के हृदय – वैश्विक प्रेम, हृदय की पवित्रता तथा सर्वत्र एकत्व के दर्शन को स्पर्श करें। आज का युग वो युग है जहाँ सम्पूर्ण विश्व सिमट कर एक छोटा सा गाँव बनता जा रहा है। ऐसे में हमें धार्मिक-सहिष्णुता की ही नहीं अपितु गहन परस्पर-तालमेल की ज़रुरत है। अविश्वास तथा गलतफहमियों को पीछे छोड़ना होगा। आओ, हम प्रतिद्वंद्विता के अंधकारमय युग को अलविदा कहें तथा सृजनात्मक, अंतर्धार्मिक-सहयोग के नए युग का श्रीगणेश करें!

अंतर्धार्मिक-सहयोग को प्रोत्साहन देने के लिए, प्रत्येक धर्म को वहाँ अपने केन्द्रों की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ अन्य धर्मों का गहनतापूर्वक अध्ययन हो रहा हो। इसका उद्देश्य अति विशाल होना चाहिए, न कि स्वार्थपूर्ण।

जिस प्रकार सूर्य को मोमबत्ती के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार परमात्मा को भी हमसे कोई अपेक्षा नहीं है। गरीबों की सहायता ही हमारी सच्ची प्रार्थना है। करुणा के अभाव में हमारे सब प्रयास व्यर्थ होंगे-मानो हम गंदे बर्तन में दूध उँडेल रहे हों। सब धर्मों को दीन-दुखियों, गरीबों की करुणा से प्रेरित सेवा के महत्व पर बल देना चाहिए।

आओ, हम आनंदमय कल के लिये प्रार्थना व प्रयास करें, जहाँ संघर्ष-विरोध का नामोनिशाँ न हो, जहाँ विभिन्न धर्म मिल-जुल कर सुख-शान्ति तथा प्रेमपूर्वक कार्यरत हों! हमारा जीवन-रुपी वृक्ष प्रेम की माटी में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहे! सत्कर्म उस वृक्ष के पर्ण हों, करुणापूर्ण शब्द इसके पुष्प हों तथा शान्ति इसका फ़ल। हम एक ही कुटुंब के सदस्यों की भाँति प्रेमसहित फलें, फूलें ताकि हम शान्ति एवं संतोष से अभिभूत विश्व में अपनी एकता का आनंदोत्सव मना सकें।

एक बार एक व्यक्ति ने एक धनाढ्य इलाके में एक आलीशान भवन किराये पर लिया। धीरे-धीरे उसे भ्रम हो गया कि वो राजा है और बहुत अहंकारी हो गया। एक दिन एक साधु उसके घर पर भिक्षा मांगने आया तो उसने बड़ा निन्दनीय व्यवहार किया। साधु ने कहा, “तुमने यह घर किराये पर ही तो लिया है और अपने आप को राजा समझने लगे हो। ज़रा सोचो और वास्तविकता के धरातल पर लौट आओ। वास्तव में, तुम्हारा कुछ भी नहीं; फिर भी व्यवहार यूँ करते हो मानो सब कुछ तुम्हारा है। कितनी दयनीय दशा है!”

आज हम सबकी यही हालत है। कुछ भी हमारा नहीं है; सब परमात्मा की ओर से भेंट-स्वरूप प्राप्त हुआ है। अनेकों ग्रन्थ पढ़ कर भी लोग समुद्र-किनारे बैठ कर कौओं की तरह काँव-काँव किया करते हैं। उनका जीवन के साथ तालमेल नहीं है, वे नहीं जानते कि कैसे जीना चाहिए। वे इस माया-जगत् में क्यों भटक रहे हैं?जिन्होंने शास्त्रों को ठीक से समझा है, वे क्या करते हैं? वे वाद-विवाद में समय व्यर्थ नहीं गँवाते;वे दूसरों को उपदेश देते हैं कि कैसे प्रगति पथ पर बढ़ें। वे लोगों को अपने मत पर आधारित लम्बे-लम्बे भाषण नहीं देते। वे बताते हैं की सब अपने-अपने चुने हुए आध्यात्मिक पथ पर, अपनी वासनाओं तथा मतानुसार आगे बढ़ें। इसीलिये हिन्दू धर्म में एक सत्य के अन्वेषण के लिए अनेकों मार्गों तथा साधनों को स्वीकृति दी गई और व्यवस्था भी की गई।

अम्मा के आश्रम में सेवा को महत्व दिया जाता है। यह अनेकों साधनाओं में से एक है। हमें प्रत्येक व्यक्ति के स्तर को देखते हुए, उनके उत्थान हेतु अनुकूल साधन बताने चाहियें। अद्वैत कोई रटने की वस्तु नहीं है, जीने की कला है-तभी हम सत्य का साक्षात्कार कर सकेंगे।

अम्मा के आश्रम में इंजीनियर, डॉक्टर, लेखक तथा स्कूलों एवं प्रिंटिंग-प्रेस में कार्यरत लोग हैं। उनमें बहुत से लोग उच्च शिक्षा-प्राप्त हैं। वे सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। इसके साथ-साथ वे ध्यान भी करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन भी करते हैं। वे अपने नियत-कर्मों को आसक्ति रहित हो कर करना सीखते हैं जोकि स्वार्थ तथा अहम् से मुक्ति पाने में बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। जब कर्म को आसक्ति-रहित हो कर किया जाता है तो यह बंधन का कारण नहीं बनता अपितु मुक्ति का हेतु बन जाता है।

अम्मा के आश्रम में कुछ लोग अगरबत्तियों को पैक करते हैं, तो दूसरी ओर कठिनतम चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भी हैं। यहाँ आने वाले कुछ दर्शनार्थी वेदान्ती होने का, ब्रह्म होने का दावा करते हैं। उनमें से एक ने प्रश्न किया कि, “अम्मा, एक आत्मा दूसरी आत्मा की सेवा कैसे कर सकती है?आश्रम में सेवा की क्या आवश्यकता है? क्या शास्त्र पर कक्षा पर्याप्त नहीं?”

बच्चो, प्राचीन काल में लोग परिवार का पालन-पोषण करने के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते और फिर संन्यासी हो जाते। किन्तु तब तक वे अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह कर चुके होते थे और जीवन के कुछ ही वर्ष शेष होते थे। फिर भी वे गुरु के आश्रम में रहते हुए नियत कर्म व सेवा करते थे। वेदान्ती विद्वान भी अपने वेदान्ती गुरु की पूर्ण श्रद्धा-भक्ति के साथ सेवा करते थे। वे बाहर जा कर ईंधन की लकड़ी ले कर आते, गौएँ चराते, धान के खेतों में मेढें बना कर उनकी बाढ़ से रक्षा करते। तुमने आरुणि की कथा नहीं सुनी?उसने गुरूजी के खेत में पानी को घुस आने से रोकने के लिए सब सम्भव प्रयत्न किये। आखिर अपने शरीर को ही बाँध के रूप में झोंक दिया। ये कथाएं दर्शाती हैं कि वेदान्ती लोग भी कभी निस्स्वार्थ कर्म को वेदान्त का विरोधी नहीं समझते थे। वे ऐसा कभी नहीं सोचते थे कि, “क्या यह कीचड़ नहीं?क्या यह पानी नहीं?क्या मैं आत्मा नहीं?”उस समय ऐसे शिष्य होते थे।

अम्मा को याद है, कैसे आश्रम के ब्रह्मचारी एवं संन्यासी लोग सुनामी-राहत-शिविरों में भोजन परोसा करते थे। अपनी भूख-प्यास तथा अन्य शारीरिक आवश्यकताओं को ताक पर रख कर, वे ज़रूरतमंदों की सेवा में समर्पित थे। इस प्रकार उन्होंने कितने लोगों को बचाया। आश्रमवासियों ने भी भूकम्प-पीड़ितों की इसी प्रकार सेवा की। इसका परिणाम यह हुआ कि जब इतने वर्षों बाद सुनामी आपदा आई तो इन आश्रमवासियों से प्रेरित गुजरात के भूकम्प-ग्रस्त इलाके के गाँवों से लोग सुनामी-पीड़ितों की सहायतार्थ दौड़ पड़े। उनके शब्द थे, “क्या हमारी ज़रुरत के समय अम्मा ने हमारी सहायता नहीं की थी? आज जब केरल में सुनामी आई है तो क्या हम चुपचाप खड़े हुए देखते रह जाएँ? “अम्मा बता नहीं सकती कि उस समय अम्मा उनके इस भाव से कितनी द्रवित हुई थी।

प्राचीन काल में, प्रायः गुरु के एक या दो शिष्य होते थे। परन्तु अम्मा के आश्रम में तो हजारों की संख्या में हैं। उन सबके लिए चौबीसों घंटे ध्यान में बैठना सम्भव है?कभी नहीं। विचार उन्हें बैठने नहीं देंगे। अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा सेवा-कार्य करते हुए, हमें अपने विचारों को सही दिशा देनी चाहिए। इस प्रकार हम समाज के लिए लाभकारी कार्य कर सकेंगे। वास्तव में हमारे आश्रम में बच्चों की स्वर्ग में कोई रुचि ही नहीं। 90% लोग समाज-सेवा ही करना चाहते हैं। उन्हें स्वर्ग भेंट में भी दिया जाए तो वे उसे ‘अलविदा ‘कह कर ठुकरा देंगे। क्योंकि स्वर्ग तो उनके हृदय में है, अन्य किसी स्वर्ग में जाने की उन्हें ज़रुरत ही कहाँ है? अधिकतर आश्रमवासी ऐसा सोचते हैं कि एक कारुणिक हृदय स्वयं स्वर्ग होता है।

पहले अधिकांश लोग सामान्य-व्यक्ति की सेवा के इच्छुक नहीं थे। यही कारण है कि हमारी सभ्यता का ह्रास हो गया और आज हम दुखी हैं।

हमें अद्वैत तथा जीवन को भिन्न नहीं अपितु एक ही जानना होगा। हममें दूसरों में स्वयं को देखने की योग्यता आनी चाहिए। अम्मा अपने चारों ओर दुःख देखती है, इसीलिये ऐसा कहती है।

निस्स्वार्थ सेवा के माध्यम से हमारे मन विस्तार को प्राप्त होते हैं तथा अन्त में ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। इससे हमारे मन की कुरूपता मिट जाती है और आत्मा के साथ ऐक्य स्थापित हो जाता है। प्रवचन देने के स्थान पर, हमें इन शिक्षाओं पर आचरण करना चाहिए। अम्मा के सभी बच्चों का यह लक्ष्य हो!अपने स्वार्थ-रहित दृष्टान्त को सामने रख कर ही हम दूसरों को इन सिद्धांतों को आत्मसात करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस पर तनिक विचार कीजिये!

अम्मा को अपने बचपन की कुछ घटनाएं स्मरण हो आयी हैं। अम्मा समुद्र-तट पर रहने वाले एक निर्धन परिवार में जन्मी थीं। अम्मा घर का सारा काम-काज करती थीं। आँगन में झाड़ू लगाते समय, यदि गलती से हमारा पाँव अख़बार के एक टुकड़े पर पड़ जाता तो हम झुक कर उसे छू कर फिर माथे से लगाते। और यदि हम ऐसा न करते तो हमारी माँ हमारी पिटाई करती। वो हमसे कहती, “यह कागज़ सरस्वती माता है।”

हमारे यहाँ एक गाय हुआ करती थी। यदि हम उसके गोबर पर पाँव रख देते तो भी इसी प्रकार नमन करते। इस गोबर से घास उगाने के लिए खाद बनती है। गाय घास खाती है, दूध देती है जो हमारे लिए आवश्यक होता है। जब हम घर में प्रवेश करते तो दरवाज़े की चौखट पर सीधे पाँव नहीं रखते थे। गलती से रख भी देते तो हमें उसे नमस्कार करना पड़ता था। हमारी माँ हमें यह सब सिखाती थी। ऐसे आचार-व्यवहार से हम परमात्मा की सर्व-व्यापकता को जानना-पहचानना शुरू करते हैं। फिर उस सर्वव्यापी परमात्मा के आदर-सम्मान हेतु कुछेक नियमों का पालन करना आवश्यक हो जाता है।

हम देखें, तो पाएंगे कि इस जगत् में प्रत्येक वस्तु का मूल्य है, अपना एक महत्व है। किसी भी वस्तु का तिरस्कार नहीं किया जा सकता। माया का अर्थ असत नहीं होता; बल्कि वो जिसमें सदा परिवर्तन होते रहता है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि हम प्रत्येक वस्तु का सम्मान करें। भगवान और भागवत् भिन्न नहीं हैं। इसी प्रकार जगत् और ईश्वर भी पृथक नहीं। अतः हमें विश्व की प्रत्येक वस्तु की आधारभूत एकता पर दृष्टि रखनी चाहिए। यही कारण है कि अम्मा अनजाने में भी किसी वस्तु पर पाँव रख दें तो रुक कर उसे नमस्कार करती हैं। यद्यपि अम्मा को ज्ञात है कि वो और परमात्मा एक ही हैं तब भी वो प्रत्येक वस्तु को नमस्कार करती हैं। सीढियां तथा ऊपरी मंजिल-सभी एक ही प्रकार के मसाले से बनते हैं – ईंटें, सीमेंट और कंक्रीट। फिर भी अम्मा उन सीढ़ियों का तिरस्कार नहीं कर सकती जिन्होंने उन्हें ऊपरी मंजिल तक पहुँचाया। वो उस मार्ग को भुला नहीं सकती जिसका उन्होंने अनुगमन किया। अम्मा उन सब विधि-विधानों का आदर करती है जो व्यक्ति के आत्मबोध के लक्ष्य की ओर प्रगति में सहायक होते हैं।

कुछ बच्चे प्रश्न करते हैं कि अम्मा को अब इन नियमों के पालन करने की क्या आवश्यकता है? जब बच्चे को पीलिया हो तो डॉक्टर खाने-पीने की कुछ वस्तुओं पर रोक लगा देता है। उदाहरण के लिए, बच्चे को नमक से परहेज़ करना चाहिए। यदि वो खायेगा तो रोग बढ़ जायेगा। किन्तु नमक के बिना बच्चे को भोजन में स्वाद नहीं आता। उसके हाथ कोई स्वादु पदार्थ लग जाए तो वो उसे छोड़ेगा नहीं। तो ऐसे में माँ क्या करेगी? माँ सारे परिवार के लिए बिना नमक का भोजन बनाएगी। यद्यपि शेष परिवार तो नमक खा सकता है, किन्तु उस बीमार बच्चे की खातिर सब लोग नमक का त्याग करते हैं। यद्यपि अम्मा को बचपन में सिखाये नियमों के अनुसरण की अब आवश्यकता नहीं रहे, फिर भी वो अपने शिष्यों के कल्याणार्थ ऐसा करती हैं।

सनातन धर्म हमें प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति में परमात्मा का दर्शन करने की शिक्षा देता है। तो, उस दृष्टि से नरक है ही नहीं। चाहे तुमने कितने ही पाप क्यों न किये हों, उन्हें सत्कर्मों तथा आत्मशुद्धि हेतु की गयी साधनाओं द्वारा धोया जा सकता है और अंततः आत्मबोध की प्राप्ति की जा सकती है। सनातन धर्म हमें यही सिखाता है। सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करें तो प्रत्येक पापी के लिए मुक्ति की सम्भावना है। बच्चों, यह जान लो कि कोई पाप ऐसा नहीं जो पश्चात्ताप से धोया न जा सके। किन्तु हम स्नान करते हुए हाथी जैसे न बनें जो पानी से बाहर आते ही मिट्टी ले कर फिर से अपने शरीर पर उंडेल लेता है। बहुत से लोग ऐसा ही करते हैं। जीवन की राह पर चलते-चलते हमसे गलतियां हो सकती हैं। गलती हो जाए तो निराश हो कर बैठ न जाएँ। यदि हम फिसल कर गिर जाएँ तो हमें यह सोच कर वहीं पड़े नहीं रहना चाहिए कि यहाँ ज़मीन पर पड़े रहने में कितना सुख है! हमें उठ कर फिर से अपने गंतव्य की ओर चल देना चाहिए। गिरने के लिए निराश न हो कर उठ खड़े होवो और आगे चलो।

यदि आप पेन्सिल से लिख रहे हैं और कोई गलती हो जाए तो उसे रबर से मिटा कर ठीक कर सकते हैं। परन्तु यदि इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराते रहेंगे तो आख़िरकार कागज़ फट जायेगा। तो, हम गलतियां करें तब भी सच्चे मन से कोशिश करें कि फिर उन्हें न दोहराएँ। गलती मनुष्य से हो जाती है किन्तु हमें सावधान रहना चाहिए तथा हार नहीं माननी चाहिए।

सनातन धर्म कभी किसी को इतना बड़ा अपराधी घोषित कर के उसका सर्वथा त्याग नहीं कर देता कि उसमें अब सुधार की कोई सम्भावना ही नहीं रही । ऐसा करना तो एक ऐसे अस्पताल के निर्माण समान होगा जिसमें रोगियों को प्रवेश करने की मनाही हो। अध्यात्म के मार्ग पर चलते हुए, हमें किसी को अयोग्य घोषित कर नकारना नहीं चाहिए। एक टूटी हुई घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बताती है। अतः, स्वीकारने का दृष्टिकोण अपनाएँ।

कभी किसी को यह कह कर न ठुकराएँ कि, “तुम बेकार हो!” ऐसे अपशब्द कभी नहीं कहने चाहियें। आप बच्चों को भी ऐसे शब्द कहेंगे तो वे क्रोधित हो जायेंगे, फिर बड़ों की तो बात ही क्या। ऐसे अपमान भरे शब्द लोगों में पाशविक भावनाओं तथा बदला लेने की भावनाओं की आग को हवा देने का काम करेंगे और वे अपनी गलतियों को दोहराते रहेंगे। जबकि हम यदि उनके गुणों पर दृष्टि रखें और धैर्यपूर्वक उनकी नकारात्मक वृत्तियों से मुक्ति पाने में सहायता करें तो हम उनके उत्थान में, उनके गुणों को उभार कर ऊपर लाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

अभी अम्मा ने बताया न कि बचपन में सीखी हुई अच्छी आदतों को जीवन भर सहेज कर क्यों रखा? इसी प्रकार, बच्चों, तुम्हें भी सनातन धर्म के मूल्यों को जीवन का एक हिस्सा बना लेना चाहिए।

लुटेरे रत्नाकर की जीवन-कथा हम सबके लिए एक अच्छा सबक है। अपने परिवार के पालन के लिए, वह जंगल में से गुज़रने वाले प्रत्येक व्यक्ति को लूटता था। यद्यपि वे ऋषि जिन्हें वह लूटने चला था, यह जानते थे फिर भी उन्होंने उसे नकारा नहीं। यदि वे उसकी भर्त्सना करते तो कदाचित उसका रूपान्तरण कभी न होता, वो महर्षि वाल्मीकि कभी न होता! उनके धैर्य तथा मार्गदर्शन के चलते, नृशंस रत्नाकर, जो ‘राम’ शब्द तक नहीं बोल पाता था, एक महर्षि हुआ और रामायण का रचयिता हुआ-एक ऐसा ग्रन्थ जिसने लाखों लोगों को, धर्म का मार्ग दिखा कर, उद्धार किया।

लोग गलतियां करते हैं क्योंकि वे अपने सत्-स्वरूप से अनभिज्ञ हैं। अतः, उनकी उपेक्षा अथवा निन्दा करना तो कोई समाधान नहीं है। बल्कि हमें उन्हें सही ज्ञान दे कर, उनका मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा सहित इस ओर प्रयास करना चाहिए।