अमृत गंगा 11

अमृत गंगा की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि अनुभव सच्चा गुरु है। यदि हम अनुभवी लोगों के पदचिन्हों पर चलें तो हम एक ही जीवनकाल में वो पा सकते हैं, जिसे पाने में सामान्यतः सैंकड़ों जन्म लग जाते हैं। प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है और आध्यात्मिक क्षेत्र में यह अनुकूलता है – सद्गुरु का सान्निध्य! सद्गुरु हमें हमारी यात्रा पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं।

इस कड़ी में आगे चल कर, अम्मा की लन्दन-यात्रा और उनका भावपूर्वक गाया हुआ भजन, ललिता ललिता श्रीललिता…प्रस्तुत है।

अमृत गंगा 10

अमृत गंगा की दसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि अपने में परिवर्तन लाने के लिए, हमें राह नहीं देखनी कि पहले दूसरे बदलें। बल्कि, पहले हम बदलें और दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनें। हमारा प्रत्येक सत्कर्म, प्रत्येक सुविचार कई गुणा फल देगा। जब हमारे हृदय में अरुणोदय होगा तो उसका प्रकाश सबको स्पष्ट दिखाई देगा।

इस कड़ी में अम्मा की मिलान(इटली) की यात्रा व कन्नड़ भाषा में उनका गाया हुआ भावपूर्ण भजन, जय जय रामा .. प्रस्तुत है।

अमृत गंगा 9

अमृत गंगा की नवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि ईश्वर कहीं दूर, बादलों के पार.. स्वर्ण-सिंहासन पर नहीं बैठा। ईश्वर हम सबके भीतर विद्यमान है। जब हम दूसरों की सहायता करते हैं तो हमारे भीतर विद्यमान परमात्मा जागृत हो उठता है। जैसे वृक्ष को बीज के बाहरी खोल को तोड़ कर जन्मना पड़ता है, वैसे ही हमारा स्वरुप भी अभी बीज-अवस्था में है। परमात्मा हमारे भीतर, हमारे अहंकार के खोल के टूटने पर प्रकट होता है।  

आगे चल कर, इस कड़ी में अम्मा की फ्रांस के टूलॉन के पास स्थित आश्रम में आगमन और उनके भावपूर्ण गणेश-भजन, हर-सुत अखिल अमंगल-हर.. का आनन्द लीजिये!

अमृत गंगा 8

अमृत गंगा की आठवीं कड़ी में, अम्मा हमें याद दिला रही हैं कि हमारी साधना का लक्ष्य अपनी खोई हुई सरलता को पाना है। सरलता, सहजता द्वारा ही हममें आत्मज्ञान जागृत होगा। अम्मा कहती हैं कि अभी हमारी सरलता, निष्कलङ्कता को अहंकार के धुएँ ने ढक रखा है और इस अहंकार का हमें नाश करना होगा। यहाँ वो हमें फिर एक बार, उदाहरण के लिए विश्वामित्र मुनि की कथा सुना रही हैं।

इस कड़ी में फ्रांस के टूलॉन नगर की यात्रा और उनका भावपूर्ण भजन, जय ॐ श्री माता  प्रस्तुत है। 

अमृत गंगा 7

अमृत गंगा की सातवीं कड़ी में अम्मा हमें याद दिला रही हैं कई हमारे हाथ में कुछ है तो केवल वर्तमान क्षण। बीता हुआ कल ‘आज’ नहीं बन सकता और आने वाला कल भी आज नहीं हो सकता। अगली सांस तक हमारे हाथ में नहीं है। फल देने की शक्ति केवल ईश्वर के पास है, अतः हमें समर्पण भाव के साथ कर्म करना चाहिए।

इस कड़ी में प्रस्तुत है – अम्मा की फ़िनलैंड के हेल्सिंकी की यात्रा और उनका गाया भावपूर्ण भजन, ‘तुम हो माते…’।