अमृत गंगा S2-19

अमृत गँगा, सीज़न २ की उन्नीसवीं कड़ी में, अम्मा ने कहा कि समाज में सच्ची प्रगति तभी होती है जब हम दूसरों के साथ बाँटते हैं। हमारे पूर्वज समग्र दूरदृष्टि के स्वामी थे। उनके निर्णय एक व्यक्ति के नहीं बल्कि समाज के हित में होते थे। आज के समाज में हम ऐसा प्रेम और एकता नहीं देखते। हमें अपने दिलों में दूसरों के लिए जगह बनानी चाहिए।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा कोलकाता में जारी है। इस कड़ी में, अम्मा ‘जय अम्बा’- भजन गा रही हैं।

अमृत गंगा S2-18

अमृत गँगा सीज़न २ की अठारहवीं कड़ी में अम्मा कह रही हैं कि हमारा लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार होना चाहिए। जीवन में आपदा-विपदा तो आती ही रहेंगी। जीत और हार स्वाभाविक हैं। लेकिन हमें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। अपनी साधना कभी नहीं छोड़नी चाहिए। आगे बढ़ते रहना सीखना है।

इस कड़ी में अम्मा की भारत यात्रा लखनऊ की ओर चल पड़ी है। इस कड़ी में अम्मा जो भजन गा रही हैं, वो है..’समस्त पापनाशनम..’

अमृत गंगा S2-17

अमृत गँगा सीज़न २ की सत्रहवीं कड़ी में अम्मा कह रही हैं कि हमारा मन ध्वनि-प्रदूषण में फंसा हुआ है और हमें इसे संयमित करने का प्रयत्न करना चाहिए। ऋषि-मुनियों ने निरंतर प्रयत्न द्वारा इसकी प्राप्ति की। उसी प्रकार हमें भी ध्यान आदि जैसी आदतें विकसित करनी चाहियें। जब मन भटके तो हमें प्रयत्न करना चाहिए। एकाग्रता बनाये रखना ज़रा कठिन कार्य है। इस भारी चुनौती के बारे में सोचने की बजाय, हम उमंग और उत्साहपूर्वक परिवर्तन लाने की कोशिश करें। हमें अपने प्रयत्न के पीछे कार्यशील शक्ति के बारे में जागरूकता बनाये रखनी चाहिए।

इस कड़ी में भी, अम्मा की भारत यात्रा वृन्दावन में ही जारी है। इस कड़ी में आप अम्मा को, ‘जिस हाल में..’ भजन गाते सुनेंगे।

अमृत गंगा S2-16

अमृत गँगा सीज़न २ की सोलहवीं कड़ी में अम्मा कहती हैं कि जब हम अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाते हैं तो हमारे यह कर्मों के फल के रूप में वापस हमारे पास आता है और परिणाम होता है बन्धन! लेकिन ज्ञान सहित किये गए कर्म बन्धनकारक नहीं होते। अतः हमें ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान पर आधारित भक्ति निश्चय ही फलित होगी!

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा, गोपियों की नगरी, वृन्दावन में जारी रहेगी। इसी कड़ी में आप अम्मा को, ‘हे गणनायक सिद्धिविनायक..’ भजन गाते सुन सकेंगे।

अमृत गंगा S2-15

अमृत गँगा सीज़न २, की पंद्रहवीं कड़ी में अम्मा कहती हैं कि अभी हमारा अपने मन पर संयम नहीं है। मन संसार-चक्र में फंसा है और आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हेतु हमें इससे मुक्त होना होगा। हमें बाह्य और भीतरी अनुशासन और प्रार्थना की आवश्यकता है और मन्त्रों व यज्ञों की भी। ये सब आत्म-साक्षात्कार में सहायक हो कर, हमें ईश्वर-प्राप्ति की ओर ले चलते हैं।

इस कड़ी में भी अम्मा की भारत-यात्रा दिल्ली में ही दिखाई देगी और आप अम्मा के भावपूर्ण गाये भजन, ‘राम नाम रस..’ को सुन पाएंगे।