अमृत गंगा S2-10

अमृत गंगा, सीज़न 2 की दसवीं कड़ी में, अम्मा ने कहा कि आज प्रश्न यह नहीं कि ज़्यादा कैसे जियें, बल्कि कैसी ज़िन्दगी जियें! जब तक हमें इसका समाधान अंदर से नहीं मिलता, हमारे जीवन में तृप्ति, सन्तोष का अभाव रहेगा। हम जी रहे हैं लेकिन अंदर दुःख भरा है। हमें अपने अंदर ही आनन्द को ढूंढना चाहिए। बाहरी जगत हमें परम-आनन्द नहीं दे सकता।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा ने अमदावाद की ओर रुख़ किया है। अम्मा ने इस कड़ी में भजन गाया है, ‘रोते जग में..’

अमृत गंगा S2-09

अमृत गँगा सीज़न २ की नवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि कर्म का क्षेत्र बड़ा निगूढ़ है। हमारा जन्म पूर्वजन्मों के कर्मानुसार होता है। कभी-कभी, ग्रहों की प्रतिकूल गति के चलते, हम बेबस हो जाते हैं। अगली साँस तक हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन डरने की कोई बात नहीं। वर्तमान क्षण भविष्य का निर्णायक होता है। वर्तमान क्षण में हमें विवेक-सहित कर्म करने चाहियें। बस इतना ही कर सकते हैं हम! हमें मनन करके स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम जीवन में होनी क्षमताओं का सदुपयोग कर रहे हैं? इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा मुम्बई में जारी है।

इसी कड़ी में अम्मा भजन गा रही हैं, ‘कृष्ण वासुदेव हरे..’

अमृत गंगा S2-08

अमृत गँगा के सीज़न २ की आठवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं..हालाँकि हमें ऐसा मालूम होता है कि हमारा समय ख़राब चल रहा है..लेकिन असल में समय अच्छा या बुरा नहीं होता। ईश्वर ने अच्छाई या बुराई की छूट हमें दे दी है। जो हमारे अनुभव में आता है, वो इसी छूट का परिणाम है। हम अपनी राह में अँधियारा भी बिखेर सकते हैं या उजियारा! अँधेरे में, हम टॉर्च ले कर चलें तो हमें रस्सी में साँप की भ्रान्ति नहीं होगी। हमें प्रत्येक वस्तु ज्यों की त्यों दिखाई पड़ेगी। जब हमारे भीतर बोध का उदय होता है तो हम प्रत्येक वस्तु को जस का तस देखते हैं। हम वस्तुओं के स्वभाव से परिचित हैं, अतः संकट को टाल सकते हैं।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत-यात्रा का रुख़ मुंबई की ओर है। इसी कड़ी में, अम्मा का भजन ‘माँ नाम बोले..’ प्रस्तुत है!

अमृत गंगा Specials 5

अमृत गंगा की इस कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि सब प्रकार के अनुभवों का कारण मन है। हमें अपने मन को जानना होगा। लोग हमें सराहें तो हम हर्षोल्लास से भर जाते हैं और आलोचना कर दें तो क्रोध और निराशा हमें घेर लेते हैं। जैसे संकट का भान होते ही, कछुआ अपने सिर को अंदर खींच लेता है, वैसे ही हमें भी संकट के आने पर अन्तर्मुखी हो कर अपनी सीमितताओं को पहचानना चाहिए। जिन लोगों ने शास्त्रों का अध्ययन किया है, उनमें वस्तुओं को उनके स्वभावानुसार, साक्षी-भाव से देखने की क्षमता होती है। हमें यह समझना होगा कि वस्तुएं सुख का स्रोत नहीं हैं। सुख-दुःख का एकमात्र कारण, मन है।

इस कड़ी में आप देखेंगे..अम्मा की हॉफ़ हेरेनबर्ग, जर्मनी की यात्रा और सुनेंगे अम्मा का गाया हुआ भजन..जय माता दी।

अमृत गंगा Specials 4

अमृत गंगा की इस कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि प्रेम प्रत्येक वस्तु को नया, तरोताज़ा और अनोखा बना देता है। अम्मा प्रेम की वैश्विक भाषा बोलती हैं। वो कहती हैं कि दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का प्रकाश हमारे जीवन को ताज़गी, शक्ति और उत्साह से भर देता है। घंटों दर्शन देने के बाद भी अम्मा के चेहरे पर मधुर मुस्कान बिखरी रहती है.. थकान का नामोनिशां तक नहीं होता। ‘प्रेम एवं करुणा से उत्पन्न करुणा-भाव’ का, अम्मा जीता-जागता उदाहरण हैं, जैसा कि संत कवि कबीर भी कहते थे! ..वो इस उक्ति को जीवंत करती हैं, “जहाँ प्रेम है वहां थकान नहीं होती!”

इस कड़ी में प्रस्तुत है, अम्मा की डब्लिन, आयरलैंड की यात्रा और उनका प्रगाढ़ भक्तिभाव सहित गाया हुआ मराठी भजन रामकृष्ण गोविन्द