अमृत गंगा S2-15

अमृत गँगा सीज़न २, की पंद्रहवीं कड़ी में अम्मा कहती हैं कि अभी हमारा अपने मन पर संयम नहीं है। मन संसार-चक्र में फंसा है और आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हेतु हमें इससे मुक्त होना होगा। हमें बाह्य और भीतरी अनुशासन और प्रार्थना की आवश्यकता है और मन्त्रों व यज्ञों की भी। ये सब आत्म-साक्षात्कार में सहायक हो कर, हमें ईश्वर-प्राप्ति की ओर ले चलते हैं।

इस कड़ी में भी अम्मा की भारत-यात्रा दिल्ली में ही दिखाई देगी और आप अम्मा के भावपूर्ण गाये भजन, ‘राम नाम रस..’ को सुन पाएंगे।

अमृत गंगा S2-14

अमृत गँगा, सीज़न २ की चौदहवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि जागरूकता एक साधना है और यह सब समस्याओं की कुञ्जी है। जागरूकता के आने पर अज्ञान टिक नहीं सकता, अन्धकार जाता रहता है। हमें अपने विचारों, वचनों और कर्मों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। हमारी दृढ़ निष्ठा हो कि एकमेव परमात्मा सर्वत्र व्यापक है और वही मुझमें भी क्रियाशील है। यह जागरूकता हमें साहसी बनाएगी।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा दिल्ली की ओर जारी है। भवानी जय जय… अम्मा इस कड़ी में यह भजन गा रही हैं!

अमृत गंगा S2-13

अमृत गँगा, सीज़न २ की तेरहवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि देश और काल कर्म के सिद्धान्त में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। कर्मफल हमारा पीछा करेंगे ही। अधर्मी लोग भाग कर कहीं भी चले जाएँ, शान्ति नहीं मिलेगी! हम जो बोयेंगे, वही काटना पड़ेगा। इसीलिये अम्मा हमेशा हमें कुछ बोलने या कर्म करने से पहले सोचने को कहती हैं। हम इस बारे में सचेत हों या नहीं, पर हमारे सभी कर्मों की प्रतिध्वनि समूची सृष्टि में होती है।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा जयपुर में जारी है। इसी कड़ी में आप अम्मा का गाया भजन सुनेंगे…’प्रभु बिन जीवन कैसे बीता’!

अमृत गंगा S2-12

अमृत गँगा सीज़न २ की बारहवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि करुणा हमारा स्वभाव है। दूसरों की सहायता करने का भाव हम में अन्तर्निहित है, किन्तु स्वार्थ-भाव करुणा को प्रकट नहीं होने देता। हम दूसरों के दुःख को जान नहीं पाते। स्वार्थ-भाव हमारे हृदय की करुणा को मलिन कर देता है। हर कोई अपनी ही दुनियाँ में खोया है। आध्यात्मिकता हममें इस भाव को जागृत करती है कि हम अलग-थलग बिखरे हुए द्वीप नहीं बल्कि एक ही श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। दूसरों के लिए थोड़ी सी भी जगह बनाएं तो हम एक श्रृंखला बना सकते हैं।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा अमदावाद में जारी है। और इस कड़ी में आप अम्मा को हिन्दी भजन, ‘सुन्दर हैं नैनां…’ गाते हुए सुन सकेंगे।

अमृत गंगा S2-11

अमृत गँगा, सीज़न 2 की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि हमें दूसरों पर आश्रित हुए बिना अपने भीतर ही आनन्द खोजना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि दूसरे लोग हमें कभी भी छोड़ कर जा सकते हैं। हम जान लें कि सच्चा सुख तो अपने भीतर ही पाया जा सकता है। यदि हम अमृत का स्वाद चखने की कोशिश में इधर-उधर भटकते रहेंगे तो हमें नकली फूलों की ही प्राप्ति होगी! इसीलिये हमें गुरु के सान्निध्य में रहते हुए,वैराग्य का अभ्यास करना चाहिए। जब हमारे भीतर वैराग्य का उदय होता है तो यह हमें अपने स्वरुप के निकट ले जाता है।

इस कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा अमदावाद की ओर चली है। इस कड़ी में, अम्मा यह भजन गा रही हैं, यमुना तीर विहारा…