अमृत गंगा S2-30

अमृत गँगा सीज़न २ की तीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि हमें बेहतर भविष्य के निर्माण के प्रति दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। जीवन आकस्मिक, अप्रत्याशित घटनाओं की शृंखला का नाम है। हमें अपना ध्यान रुकावटों से हटा कर लक्ष्य की ओर केंद्रित करना चाहिए। हम पीछे मुड़-मुड़ कर देखते रहे तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। परिवर्तन तभी संभव है जब प्रार्थना और पुरुषार्थ युगपत हों।

इस कड़ी में आप अम्मा की श्रीलंका यात्रा देख सकेंगे और अम्मा जो भजन गा रही हैं, वो है..वृजवन कुञ्जविहारी…

अमृत गंगा S2-27

अमृत गँगा सीज़न २ की सत्ताईसवीं कड़ी में अम्मा कहती हैं कि आजकल लोगों का भाव है कि, “मुझे जो चाहिए, वो चाहिए ही। मुझे दूसरों से क्या लेना-देना?” इसी तरह गृहस्थ जीवन में भी पति पत्नी से प्रेम की याचना करता है और पत्नी पति से। सब प्रेम पाना चाहते हैं। तो टकराव तो होगा ही। लेकिन यदि दोनों सावधान रहें तो एक-दूसरे की ग़लतियाँ माफ़ कर देंगे। एक-दूसरे को समझने के लिए भावनाओं को अभिव्यक्त करना आवश्यक है।

इस कड़ी में अम्मा की यूरोप यात्रा का पड़ाव हॉलैंड होगा। अम्मा जो भजन गा रही हैं, वो है.. नंदकुमारा वन्दितरूपा

अमृत गंगा S2-29

अमृत गँगा सीज़न २ की उनतीसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि ज्ञान की पूर्णता अनुभव में है। तब ज्ञान बोध बन जाता है और बोध उस टॉर्च जैसा है जो हमारी अँधेरे में देखने में मदद करता है। हम देखते हैं, आज शरीर है, कल नहीं। इससे हमें शरीर के नश्वर स्वभाव को समझ लेना चाहिए। आत्मा ही एक अविनाशी तत्त्व है। यह ज्ञान अध्यात्म ही देता है।

इस कड़ी में, अम्मा की यूरोप यात्रा स्पेन के वेलेंशिया समाप्त हो रही है। इसी कड़ी में सुनिया, अम्मा का गाया भजन..कुछ ना ले आया तू..

अमृत गंगा S2-26

अमृत गँगा सीज़न २ की छब्बीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि साधकों को अपने सद्गुणों और ऊर्जा को इकठ्ठा करके गहरी पड़ी वासनाओं को निकाल फेंकना चाहिए। क्रोध, घृणा, द्वेष, आलस्य, संशय, लोभ, और मद-मात्सर्य.. ये सब आसुरी वृत्तियाँ हैं। इन राक्षसी वृत्तियों और विषय-भोगों में प्रवृत्त लोग असुर कहलाते हैं। अपनी दैवी वृत्तियों द्वारा हम इन आसुरी वृत्तियों पर विजय पा सकते हैं। वात्सल्य, करुणा और सहनशीलता की मूर्ति, ‘शक्ति’ हमें इन आसुरी वृत्तियों पर विजय पाने में सहायता करती है।

इस कड़ी में अम्मा यूरोप-यात्रा को पैरिस, फ़्रांस में जारी रखे हैं। और जो भजन अम्मा इस कड़ी में गा रही हैं,वो है, ‘मुरलीधरा गोपाला मुकुंदा!’

अमृत गंगा S2-25

अमृत गँगा सीज़न 2 की पच्चीसवीं कड़ी.. अम्मा बता रही हैं कि जगत देवी का ही विस्तार-मात्र है। सब संकटों से रक्षा और उनकी आवश्यकताएं पूरी करके, उनका पालन-पोषण करना माँ का धर्म होता है। वो देती है, दिए जाती है! हम प्रकृति से कितना लेते हैं! हमें अपने भीतर केवल आवश्यकतानुसार लेने का मनोभाव जगाना चाहिए। तनिक सोचें, ‘हम’ समाज को क्या दे सकते हैं! इस कड़ी में, अम्मा अपनी यूरोप यात्रा में हमें म्यूनिख, जर्मनी लिए चल रही हैं।

इस कड़ी में अम्मा भजन गा रही हैं :गोपबालका गोकुलेश्वरा।