अमृत गंगा की पहली कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि ज़िन्दगी हमारी सोच के अनुसार नहीं चलती लेकिन अगर प्रेम और विवेक से काम लें तो क्रोध और घृणा जैसी भावनाओं से ऊपर उठ सकते हैं। अतः हमें अपने वचनों और कर्मों में सावधानी बरतनी चाहिए। अम्मा ने अपना जीवन दूसरों की सेवा में लगा कर, विश्व भर के लाखों-लाखों लोगों को मानवता से प्रेम व सेवा करने की प्रेरणा दी है।
इस कड़ी में प्रस्तुत है, अम्मा की बार्सलोना, स्पेन की यात्रा और उनका भाव-सहित गाया हुआ गणेश-भजन भी…सुखकर्ता तुम हो…
अम्मा जानती हैं कि मेरे बच्चे कोरोना वायरस से भयभीत हैं। अम्मा अपने सभी बच्चों को ध्यान में रख कर,सबके लिए प्रार्थना कर रही हैं। ऐसे समय में,तुम सबको बहुत ही सावधान और सतर्क रहना होगा। यह समय है,धैर्य,आत्म-संयम और एकता दिखाने का। अम्मा को मालूम है,मेरे सब बच्चे डरे हुए हैं। लेकिन इस वक़्त ज़रूरत डर की नहीं,बल्कि सावधानी और सतर्कता बरतने की है। सबसे मुख्य तो धैर्य है,हिम्मत! हिम्मत होगी,तो तुम किसी भी चीज़ पर विजय पा सकते हो। इसलिए,डरना छोड़ो और धैर्य से काम लो। इस वायरस को मारने वाले,एंटी-वायरस का नाम है धैर्य,जो हमारे मन में पड़ा है। अगर तुम धैर्यलक्ष्मी-धैर्य की देवी-से मित्रता कर लो तो तुम में किसी भी चीज़ का सामना करने की,उस पर विजय पाने की शक्ति आ जाएगी।
मेरे बच्चों को चाहिए कि वे सरकार और कानून-प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा दिए गए सभी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। साथ ही,ईश्वर-कृपा के लिए,कोमल ह्रदय से किन्तु गंभीरता के साथ प्रार्थना करें। हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे कि,”दवा लो लेकिन साथ-साथ मन्त्र भी जपो।” इस तरह,आज के हालात में भी,हमारे सतत प्रयासों और ईश्वर-कृपा,दोनों की समान आवश्यकता है। प्रत्येक नागरिक को वैसी ही जागरूकता और सावधानी बरतनी चाहिए-जैसी युद्ध के मैदान में तैनात सैनिक बरतता है। मेरे बच्चो,दिवंगत आत्माओं के लिए प्रार्थना करो और उनके परिवारों के मन की शांति के लिए भी।
तीन साल पहले से,अम्मा को 2020 में,सर पर मंडरा रहे भावी संकट का अनुमान हो रहा था। दो साल पहले,अम्मा ने इस संकट से निपटने के लिए एक ध्यान-पद्धति का अविष्कार किया। इसमें कहा गया है कि भावी को पूरी तरह से टाला तो नहीं जा सकता और इसका थोड़ा-बहुत प्रभाव तो होगा ही। अम्मा,विश्व के लिए लाभकारी,इस ध्यान-पद्धति को विस्तार से समझाती आई हैं और इसका दो वर्षों से अभ्यास किया जा रहा है। इसका नाम है,’विश्व-शान्ति एवं ईश्वर-कृपा हेतु,श्वेत-पुष्प ध्यान-पद्धति।’ अम्मा की सब लोगों से विनती है कि सारे विश्व के कल्याण हेतु,इस ध्यान-पद्धति का,प्रतिदिन एक या दो बार,नियमित रूप से अभ्यास करें।
शान्ति ध्यान-पद्धति प्रत्येक वस्तु की सत्ता लहरों या तरंगों के रूप में है। पिछली सदी में,फ़्रांस के लोगों ने Concorde नामक एक विमान का अविष्कार किया,जोअत्यन्त तीव्र उड़ान भर सकता है। इसकी आवाज़ इतनी कोलाहल भरी थी कि इसकी Shock-waves से बिल्डिंगों को भारी नुकसान पहुंचा। तो ऐसे ही,गीत की आवाज़ का भी,लहरों या तरंगों के रूप में संचार होता है। हर चीज़ लहरों या तरंगों के रूप में है। क्रोध से उपजी तरंगें,एक माँ के वात्सल्य-भाव से उपजी तरंगों से भिन्न होती हैं और प्रेम व काम-वासना में उठने वाली तरंगें अलग ही होती हैं। कई तरह की तरंगें बनती रहती हैं।
हमारी प्रार्थनायें और सतत प्रयास,संभवतः इस वायरस का प्रतिरोध कर सकती हैं। अतः,संकल्प-गहन भावना-के साथ की गई प्रार्थना का असर ज़रूर होता है। प्रत्येक वस्तु में लय-ताल है जगत की प्रत्येक वस्तु में एक लयताल है-सारी सृष्टि और उसके जीवों के बीच एक ऐसा सम्बन्ध,जिसे नकारा नहीं जा सकता। यह जगत एक नेटवर्क जैसा है,जहाँ हर चीज़ दूसरी से जुड़ी है। मान लो,किसी जाल के चारों कोनों को चार लोगों ने पकड़ा हो और फिर इसे किसी एक जगह से भी हिलाया जाए तो उसकी तरंगें सब ओर महसूस होंगी। इसी तरह,जाने-अनजाने,हमारे हर कर्म की गूँज सारी सृष्टि में होती है-फिर वो व्यक्तिगत तौर पर किया गया कर्मा हो अथवा सामूहिक। इसीलिये,अम्मा बार-बार कहती हैं कि,”हम कोई अलग-थलग पड़े हुए द्वीप नहीं,बल्कि एक ही श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। अतः,अपने से पहले,दूसरों के बदलने की प्रतीक्षा मत करो। कोई बदले न बदले,अपने भीतर परिवर्तन ला कर,तुम बाहर परिवर्तन ला सकते हो।”
मान लो,दसवीं मंज़िल पर रहने वाला कोई व्यक्ति देखे कि अपनी ही बिल्डिंग की सबसे निचली मंज़िल पर आग लगी है और कोई आदमी मदद के लिए चिल्ला रहा है। अगर वो कहे कि,”आग तो सबसे नीचे लगी है,तुम ही जानो;मुझे क्या पड़ी है?” ऐसा सोचना तो बड़ी भारी मूर्खता होगी क्योंकि नीचे लगी आग किसी भी पल,फ़ैल कर ऊपर पहुँच सकती है। इसी प्रकार,आज जो किसी और की समस्या है,कल हमारी हो सकती है। ठीक ऐसे ही,जब पहली बार यह वायरस चीन में पाया गया तो हम सबने सोचा कि यह तो चीन की समस्या है,हमारी नहीं आख़िरकार,अब यह समस्या हमारी भी नहीं हो गई? प्रश्न इस बात का नहीं है कि उन्होंने इस पर काबू पाया या नहीं बल्कि यह कि हम इससे किस तरह निपटते हैं। हम सावधान रहें,सावधानी और जागरूकता से काम लें तो हम खुद को भी बचा लेंगे और इस महामारी को और फैलने से भी रोक लेंगे।
तो,मेरे बच्चों को क्या करना है?मान लो,हमारी टांग टूट जाये तो हमें कमरे में ही रहना पड़ेगा ना-दो महीने,छह महीने! तब हमें यह बोझिल नहीं लगता क्योंकि मालूम है कि टाँग के ठीक होने के लिए ज़रूरी है। इसी तरह,अब जो अलग रहने,सफ़ाई रखने और अत्यन्त सावधानी बरतने का अभ्यास,आगे चल कर हमें वायरस से प्रतिरोध की क्षमता प्रदान करेगा। जिन लोगों को यह रोग हो ही गया है,उन्हें डरना नहीं चाहिए। बस अपने अलग कमरे में बने रहो और ध्यान रखो कि तुमसे दूसरों को न लग जाये। अपने कमरे में रहो। और जिनको नहीं है,उन्हें अगर कोई लक्षण दिखाई दें तो तुरंत सम्बंधित प्राधिकारी को सूचित करके,उनसे सहायता प्राप्त करें।
इस समय,अमृतपुरी आश्रम में तीन हज़ार पांच सौ लोग रह रहे हैं,जिनमें कई दूसरे देशों के और भारतीय मूल के लोग भी शामिल हैं। आश्रम में,हम सरकार के बनाये नियमों का बखूबी पालन कर रहे हैं और किसी को आश्रम में आने की अनुमति नहीं है। यहाँ रहने वाले लोग भी अगर बाहर जाएँ तो उन्हें कुछ दिन वापस लौटने की मनाही है। ये नियम सरकार के बनाये हुए हैं और हम उनका पालन कर रहे हैं। यहाँ रह रहे 3500 लोगों को भी हमें बचा कर रखना है। इसीलिये,इस नियम की स्थापना की गई है।
ऐसे समय में,अम्मा अपने उन आश्रमवासी बच्चों से मिल रही हैं,जो आश्रम से बाहर नहीं गए। यह वर्ष भर का एकमात्र ऐसा समय है,जब आश्रमवासियों को अम्मा को अपनी सब समस्याएं बताने का मौका मिलता है। अम्मा प्रत्येक व्यक्ति को बुला कर,उसकी साल भर की समस्याएं सुनती हैं। साधारणतः,अम्मा इसके लिए,प्रतिवर्ष पच्चीस दिन अलग रखती हैं। सरकार के सभी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए,अम्मा प्रतिदिन ध्यान और भजन के लिए बाहर आती हैं। शेष समय,आश्रमवासियों की समस्याएं सुनने के लिए रखा गया है।
इस महामारी से निपटने में,भारत सरकार शुरू से ही बहुत सतर्क और सक्रिय रही है। यही कारण है कि हम कम से कम इतनी रोकथाम तो कर पाए हैं। आइये,हम हृदय से प्रार्थना करें और सतर्क एवं सावधान रहें ताकि इसे यहीं रोक कर,आगे और न फैलने-बढ़ने दें। अपनी रक्षा स्वयं करें और बच कर रहें। हम स्वयं ही अपनी राह के अंधियारे हैं,स्वयं ही प्रकाश! हम स्वयं ही अपनी राह के कांटे हैं और स्वयं ही फूल!
मनुष्य के पुरुषार्थ की सदा एक सीमा होती है। हम कितनी भी सावधानी के साथ कार चलाएं,कोई दूसरा असावधान ड्राइवर हमारी कार से आ कर टकरा सकता है। किसी भी कर्म के इच्छित फल में,कृपा की अपनी भूमिका होती है। निस्संदेह,पहले उचित कर्म की आवश्यकता तो है ही। किन्तु सफ़लता की प्राप्ति के लिए,हमें आवश्यकता होती है ईश्वर-कृपा की। और इस कृपा को पाने के लिए प्रार्थना अनिवार्य है।
अब मेरे बच्चों की समझ में आ गया है कि जीवन बस इसी क्षण में,वर्तमान में है। अगली साँस भी हमारे हाथ में नहीं है। हम इस वर्तमान समय का उपयोग कैसे करते हैं,उसी से हमारे सच्चे जीवनकाल का पता लगता है। क्योंकि जीवन तो वही है। अम्मा हमेशा कहती हैं कि मेरे बच्चों को अपने स्वरुप को जानना है। अपने आप को पहचानो और पूरी जागरूकता,उत्साह एवं शान्ति के साथ विश्व-कल्याण हेतु प्रार्थना करो।
ऐसी परिस्थिति में,अपने कमरे में बैठ कर प्रतिदिन थोड़ी देर के लिए ॐ लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु- इस मन्त्र का जप करना एक अच्छी साधना है। ॐ लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु। ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः। मेरे सभी बच्चों पर कृपा बनी रहे!
माता अमृतानंदमयी मठ पिछले सप्ताह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में हुए नक्सलियों के आतंकी हमले में शहीद हुए 40 से अधिक सीआरपीएफ जवानों के परिवारों को 5 लाख रुपये की सहायता देगा।
जवानों की शहादत पर दुख प्रकट करते हुए माता अमृतानंदमयी ने कहा कि इन बहादुरों के परिवारों का समर्थन करना हमारा धर्म है, जो राष्ट्र की रक्षा करते हुए मर गए। मेरा दिल उनके परिवारों और प्रियजनों के लिए हमेशा मौजूद है। हम सभी उनकी शांति और सलामती के लिए प्रार्थना करते हैं।
माता अमृतानंदमयी मठ ने दान की घोषणा उस वक्त की जब अम्मा मैसूर की यात्रा कर रही थीं, जो उनकी 2019 की भारत यात्रा के उत्तरी चरण का पहला पड़ाव था।
श्री माता अमृतानन्दमयी देवी का अय्यप्पा भक्त समागम को सम्बोधन २० जनवरी,२०१९ ,अय्यप्पा भक्त समागम, पुत्तरीकंडम मैदान, तिरुवनन्तपुरम
“अय्यप्पा शास्तावे की जय… शरणम अय्यपा स्वामिये की जय…।”
“प्रेम-स्वरुप,आत्मस्वरूप, यहाँ उपस्थित सभी को प्रणाम!
जिन आचार्यों ने अम्मा को इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया, उन्हें भी प्रणाम।
शबरीमला मंदिर से सम्बन्धित हाल ही की घटनाएँ अति दुर्भाग्यपूर्ण रही हैं। मन्दिर के आधारभूत तत्त्व व मंदिरों में की जानेवाली पूजा इत्यादि का यथेष्ट ज्ञान न होना ही समस्या का मूल कारण है। प्रत्येक मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समय किये जानेवाला संकल्प भिन्न हैं, उस की उपेक्षा करना अनुचित है। मंदिर में की जानेवाली पूजा और विधि-विधानों के विषय में प्रवेश करने से पूर्व मंदिर में प्रतिष्ठित देवी-देवता और सर्वव्यापी ईश्वर में अंतर समझना चाहिए। सर्वव्यापी ईश्वर की कोई सीमायें नहीं हैं, न स्त्री-पुरुष का भेद है, वह सर्वत्र व्याप्त अनंत शक्ति है। परन्तु मंदिर के देवी देवताओं की बात अलग है।
समुद्र में रहने वाली मछली और घर के फ़िश-टैंक में पलने वाली मछली में अन्तर है। फ़िश-टैंक में पाली जाने वाली मछली को तो हमें दाना, ऑक्सीजन देना पड़ता है,पानी बदलते रहना पड़ता है। लेकिन समुद्र में रहने वाली मछली को इन सब की ज़रूरत नहीं पड़ती। नदी में स्नान करना हो तो हमें किन्हीं विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता लेकिन उसी नदी के पानी को एक स्विमिंग पूल में उपयोग करें तो उसे फ़िल्टर करना पड़ेगा, उसमें क्लोरीन मिलानी पड़ेगी। उसी स्विमिंग पूल में उतरने से पहले हमें अलग से स्नान करना पड़ता है, ख़ास स्विमिंग-सूट पहनना पड़ता है। स्विमिंग पूल में नहाने के साबुन का इस्तेमाल भी वर्जित होता है। हालाँकि स्विमिंग पूल में नदी का ही पानी है, फिर भी वहाँ नियम अलग हो जाते हैं। उसी प्रकार, यद्यपि मंदिर में स्थापित देवी-देवता उसी सर्वव्यापी ईश्वर के ही अंश हैं, तथापि मंदिर में शुद्धि-अशुद्धि का ख्याल रखना व आचार अनुष्ठानों का पालन करना आवश्यक है।
भक्त का जैसा भाव होता है तदनुरूप उसे फल मिलता है। बीज बोने के बाद आवश्यक खाद पानी देने पर ही फल फूल, सब्जी मिलते हैं। इसी तरह मंदिर के प्रत्येक देवता की पूजा नियमित समय पर होनी चाहिए, उनको नैवेद्य चढ़ाना चाहिए, मंदिर में शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए और आचारों, अनुष्ठानों का पालन किया जाना चाहिए। किन्तु सर्वव्यापी ईश्वर की उपासना में ऐसे विधि-विधानों का प्रतिबन्ध नहीं होता।
प्रत्येक मंदिर में प्रत्येक देवता का आधारभूत संकल्प भिन्न होता है। उदाहरण के लिए, किसी मंदिर में रौद्र-भाव में प्रतिष्ठित देवी की उपासना का विधान होता है तो किसी दूसरे मंदिर में शान्त भाव में प्रतिष्ठित देवी की उपासना का। तदनुसार पूजा, आचार, उपचार, शुद्धि अशुद्धि का विधान होता है। अतः परंपरागत रूप से चले आ रहे इन आचारों और अनुष्ठानों का सही पालन न किया जाए, तो यह मंदिर के वातावरण व शुद्धता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा।
मंदिरों में पूजित देवी देवताओं को अल्पवयस्क(माइनर) माना गया है। जिस प्रकार किसी बच्चे को माता-पिता और अध्यापकों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार देवता को भी तंत्रियों (केरल में शास्त्र अनुसार पूजा विधान का निर्धारण व प्रतिष्ठा कर्म करनेवालों को तंत्री कहते हैं), पुजारियों और भक्तों की आवश्यकता होती है। कोई नास्तिक मंदिर जाये तो चूंकि वह उन विश्वासों की कदर नहीं करता वह वहाँ थूक दे या मूत्र मल विसर्जन ही कर दे, अतः मंदिरों की पवित्रता भक्तों पर आश्रित है।
शबरीमला अय्यप्पन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। ऐसी मान्यता है कि शबरीमला मंदिर से जुड़े व्रत अनुष्ठान उनकी महासमाधी में प्रवेश करने से पूर्व उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप है। बदलते समय के साथ परिवर्तन लाना आवश्यक ज़रूर है, लेकिन अगर हम मन्दिरों के तत्त्वों का विस्मरण कर परिवर्तन लाने लगेंगे तो हमारे मूलभूत संस्कारों की हानि होने का डर है। (मलयालम में एक कहावत है कि) ‘बच्चे को बारम्बार इतना न नहलाओ कि बच्चा ही न रह जाये’ अर्थात परिवर्तन इस प्रकार न हो कि मूलभूत आधार ही मिट जाये।
श्री शंकराचार्य, श्री नारायण गुरु और श्री चट्टंबी स्वामिगल – इन सब महात्माओं ने अद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। किन्तु उस उच्चतम स्थिति को प्राप्त होने के पश्चात् भी उन्होंने मन्दिरों की प्रतिष्ठा की और उनमें प्रतिष्ठित देवी देवताओं के पूजन हेतु विधि-विधानों का निर्धारण भी किया। प्रत्येक मंदिर के अपने आचार होते हैं। कई बार मुझे इन मन्दिरों में आमन्त्रित किया गया और मैं वहाँ गई भी हूँ। ऐसे कई शिव-मन्दिरों में अम्मा को परम्परानुसार केवल तीन-चौथाई परिक्रमा कर के लौटने को कहा गया(उसमें निहित विश्वास ये है कि शिव असीम अनंत हैं अतः किसी दायरे में सीमित नहीं किये जा सकते) और उन विधि-विधानों का आदर करते हुए अम्मा ने वैसा ही किया।
ब्रह्मस्थान मंदिरों की प्राण-प्रतिष्ठा के पूर्व अम्मा ने भी तत्कालीन आचार्यों व तंत्रियों से विचार-विमर्श किया था। जब अम्मा ने अपने कुछ ब्रह्मचारियों को संन्यास दीक्षा भी देनी थी तो उन्होंने इसके लिए परंपरा अनुसार सन्यास ग्रहण किये एक संन्यासी को आमन्त्रित कर, शास्त्रविदित विधि-विधान का पालन करते हुए ऐसा करवाया, आचारों का उल्लंघन नहीं किया। मंदिर हमारी संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं। उनकी संरक्षा करना अनिवार्य है अन्यथा समय के साथ समाज किसी कटी पतंग की तरह दिशाहीन हो जाएगा। मन्नारशाला मंदिर की (केरल का एक विख्यात मंदिर) परम्परा के अनुसार केवल एक महिला ही वहाँ की पुजारी हो सकती है। कई स्थानों पर स्कूल या कॉलेज केवल लड़कों या लड़कियों के लिए ही बने होते हैं, पर इसको लिंग भेद या लैंगिक असमानता तो नहीं कहा जा सकता। एक विशेष वय तक की बच्चियाँ व विशेष आयु से ऊपर की महिलाओं को शबरीमला जाने की अनुमति है अतः यह कहना ठीक न होगा कि वहाँ महिलाओं की अवज्ञा होती है।
छोटे बच्चों से कहा जाता है कि,”झूठ बोलोगे तो अंधे हो जाओगे” या “तुम्हारी नाक लम्बी हो जाएगी”। कहीं यह सच होता तो आज हम सभी अंधे होते, हमारी नाक बहुत लम्बी होती! परन्तु बाल्यावस्था में जब बच्चा विवेकहीन होता है, सही गलत में भेद नहीं कर पाता तब ऐसी चेतावनियों से उसे लाभ होता है। यह व्यावहारिक तरीका है। एक बार एक छोटे बच्चे ने चित्र बना कर अपने पिता को दिखाया और कहा, “पिताजी, देखो मैंने हाथी बनाया!” पिताजी ने सरसरी नज़र डाली तो कुछ आडी-टेढ़ी रेखाएँ खींची हुई देखीं और वो बोले, “हाथी कहाँ है? मुझे तो ऐसा कुछ नज़र नहीं आता!” इसपर बच्चा फूट-फूट कर रोने लगा, और घर की एक-एक चीज़ को उठाकर फेंकने लगा, कितना भी मनाने पर वो शांत नहीं हुआ। आखिर में पिताजी बोले, “अरे! मेरी आँखें कमज़ोर हैं न, इसलिए ठीक से दिखाई नहीं दिया! अब मैंने चश्मा लगा कर देखा है, कितना सुन्दर हाथी बनाया है तुमने!” यह सुनकर बच्चा बहुत खुश हो गया। यह हृदय की भाषा है। अर्थात हमें श्रोता को समझकर उसके तल तक उतरना चाहिए, यहाँ केवल बुद्धि काम नहीं देती। मंदिर सोपान हैं|सीढ़ियों से चढ़कर छत पर पहुँचने के बाद हम यह समझ जाते हैं कि छत और सीढ़ियाँ समान वस्तुओं से बनी हैं – सीमेंट, रोड़ी, रेत, इत्यादि से| परन्तु यह समझने के उपरान्त भी हम सीढ़ियों को नकार नहीं सकते। छत तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की आवश्यकता बनी रहती है। हालांकि हमें अनुभव हो कि यह विविध नाम-रूप ईश्वर ही हैं तब भी, इस विचार से कि औरों को भी इस तल तक उठना है, हम सीढ़ियों को नकारेंगे नहीं, उनमें, सब में उस ईश्वर के दर्शन करेंगे। इसी प्रकार आचार अनुष्ठानों के तिरस्कार से हमारी संस्कृति नष्ट होगी।
गत पंद्रह वर्षों में अम्मा ने एक छोटा सा अनुसन्धान किया। शबरीमला दर्शनों के दिनों में, अम्मा ने पंद्रह वर्ष, वहाँ के हर अस्पताल में लोगों को भेजा। पता चला कि शबरीमला यात्रा अवधि के दौरान लगभग सभी अस्पतालों में आने वाले रोगियों की संख्या में 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाती है। कदाचित इसका कारण यह हो कि उन महीनों के दौरान पुरुष शराब नहीं पीते, मांस नहीं खाते, अपनी पत्नी से गाली-गलोच नहीं करते, और सपरिवार व्रत का अनुष्ठान करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं। इस तरह समाज के कितने ही परिवारों में शारीरिक एवं मानसिक संतुलन लाने में मंदिर मददगार हैं। इसीलिए इन आचार परम्पराओं की संरक्षा करना हमारी आवश्यकता है। हमारी सभ्यता की यही नीव भी है और आधार भी।
जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से युद्ध-नीति जाननी चाही तो श्रीकृष्ण ने उससे भीष्म से पूछने को कहा। (ऐसा नहीं था की भगवान नहीं बता सकते थे परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से भीष्म ही अधिकारी थे।) इस विषय-विशेष में, शबरीमला के भक्त तंत्रियों व पुजारियों तथा आप जैसे श्रद्धालु भक्तों को साथ बैठ कर चर्चा करनी चाहिए और एक निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए। मलयालम में एक कहावत है: “धीमे-धीमे खाते रहो तो आप ताड़ का पूरा पेड़ भी खा सकते हो!” इससे अधिक मुझे कुछ नहीं कहना, मुझसे पूर्व भी कई लोग अधिकतर वो सब कह चुके हैं जो इस विषय पर कहा जाना चाहिए। ॐ नमः शिवाय
दिल्ली
के राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केन्द्र में आयोजित, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छता
सम्मलेन में माननीय प्रधानमन्त्री, श्री नरेन्द्र मोदी तथा यूनाइटेड नेशन्स के महासचिव,
श्री अंतोनिओ गुतरेस ने श्री माता अमृतानन्दमयी देवी(अम्मा) को, चार वर्ष पूर्व प्रारम्भ
हुए स्वच्छ-भारत-अभियान के अंतर्गत, स्वच्छ भारत कोष हेतु 100 करोड़ रुपयों राशि का,
सर्वाधिक योगदान देने के लिए पुरस्कृत किया। इस धनराशि का उपयोग, गंगा-तट पर रहने वाले गरीब लोगों के लिए शौचालय
बनाने के लिए किया गया।
PM Modi honouring Amma
मंच से बोलते हुए, प्रधान मन्त्री ने अम्मा को, माता अमृतानन्दमयी मठ द्वारा समर्पित, स्वच्छता एवं पर्यावरण-रक्षण जैसी सेवाओं के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि, ” मैं विशेष रूप से पूज्य अम्मा को प्रणाम करता हूँ क्योंकि जबसे इस कार्य को प्रारम्भ किया, पूज्य अम्मा ने सक्रिय रूप से, एक प्रकार से पूरे अभियान को अपने कन्धों पर ले लिया। उनका योगदान अद्भुत रहा है। अम्मा आज स्वयं समय निकाल कर के, पूज्य बापू की जन्म-जयन्ती पर हमारे बीच आई हैं, इसके लिए मैं हृदय से आपका धन्यवाद करता हूँ। ”
Amma being introduced to UN Secretary General Antonio Guterres by PM Narendra Modi
इस सम्मलेन में अम्मा और उनके आश्रम के योगदान पर एक छोटा सा वीडियो भी दिखाया गया जिसमें अम्मा कह रही थीं कि, “जैसे सुबह उठते ही हम दाँत साफ़ करते हैं, पर्यावरण की स्वच्छता भी वैसी ही है। यह हमारे अपने स्वास्थ्य और सुख के लिए है। यदि हम किसी गंदे नाले को समुचित भाव के साथ साफ़ करें तो वो भी ईश्वर की सेवा समान है। सनातन धर्म में, स्रष्टा और सृष्टि दो अलग चीज़ें नहीं हैं। स्वच्छता का महत्व सर्वोपरि है।”