अमृत गंगा 17

अमृत गंगा की सत्रहवीं कड़ी में, हम देखेंगे कि अन्य साधु-संतों की तरह, अम्मा भी निस्स्वार्थ सेवा को बहुत महत्त्व देती हैं। अम्मा कहती हैं कि यदि हम पूरे मनोयोग के साथ निस्स्वार्थ सेवा और साधना में लग जाएँ तो हम मन को निश्चित ही शुद्ध बना सकते हैं। परमात्मा पर मनन शुद्ध हृदय द्वारा ही हो सकता है! अम्मा यह भी कहती हैं कि हमें अपनी योजनाओं में खोये न रह कर, खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए। यदि लक्ष्य स्पष्ट हों तो हम अनासक्त हो कर आगे बढ़ सकते हैं।

इस कड़ी में, अम्मा हमें अपनी अमेरिकी यात्रा में, सैंटा-फ़े, न्यू-मैक्सिको लिए चल रही हैं और मुकुन्द मुरारे गोपाला.. यह भजन गा रही हैं।

अमृत गंगा 16

अमृत गंगा की सोलहवीं कड़ी.. यहाँ अम्मा अंध-संत सूरदास के विषय में बता रही हैं जिन्हें सत्य का बोध हुआ और जिन्हें भगवान कृष्ण के दर्शन अपने अन्तर्चक्षुओं से होते थे। अम्मा कहती हैं कि सूरदास जैसे भक्त समस्त जगत को ईश्वर-रूप देखते हैं। उनका अनुभव होता है कि कण-कण में परमात्मा है और परमात्मा से अलग कुछ नहीं है। ऐसे भक्त किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते और उनका सबके प्रति आदर और विनय का भाव होता है। इसीलिये, अम्मा हमें सबमें ईश्वर का दर्शन करने को कहती हैं। वही सच्ची भक्ति है।

इस कड़ी में, अम्मा अपनी अमेरिका-यात्रा को लॉस एंजेल्स, कैलिफ़ोर्निया में जारी रखते हुए.. हृदयस्पर्शी भजन गा रही हैं..देवी त्रिलोक में !

अमृत गंगा 15

अमृत गंगा की पंद्रहवीं कड़ी.. अम्मा हमें नियमित ध्यानाभ्यास और उसमें एकाग्रता की प्राप्ति हेतु प्रयत्न करते रहने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। अम्मा कहती हैं कि ध्यानाभ्यास के कुछ क्षण भी सोने, हीरे-जवाहरात समान अनमोल होते हैं। लेकिन वो हमें चेतावनी भी दे रही हैं कि हम इस सोने और हीरे को कमरे में रख कर दरवाज़ा खुला न छोड़ दें, वर्ना चोरी हो जाएगी। अतः, ध्यान से अर्जित आध्यात्मिक ऊर्जा को हमें बुद्धिमत्तापूर्वक सहेज कर रखना होगा। क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष जैसी भावनाओं में हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा व्यर्थ नष्ट हो जाती है।

इस कड़ी में, अम्मा अमेरिका के सैन-रेमॉन, कैलिफ़ोर्निया की यात्रा कर रही हैं। अम्मा इस कड़ी में भावपूर्ण गणपति भजन गा रही हैं…शंकर-नंदन पंकज-लोचन

अमृत गंगा 14

अमृत गंगा की चौदहवीं कड़ी में, अम्मा हमें अपने प्रत्येक वचन और कर्म के प्रति सचेत रहने की याद दिला रही हैं। शब्दों में अर्थ निहित होते हैं, अतः गलत शब्द चोट पहुँचाते हैं। हमारे जीवन में दुःख आते हैं, पूर्वकृत कर्मों के फलस्वरूप! हम पूर्वजन्मों से संचित कर्म ले कर आते हैं। जो अच्छे कर्मों का खाता ले कर आये हैं, वे सुख भोगेंगे और बुरे कर्म-संग्रह वाले दुःख पाएंगे। अतः, अम्मा हमें याद दिलाती हैं कि सत्कर्म करने का प्रयत्न करो।

इस कड़ी में, अम्मा की अमेरिका के सीएटल(वॉशिंगटन) यात्रा को दिखाया गया है। आप अम्मा का भगवान कृष्ण के विट्ठल रूप की स्तुति में, भावपूर्ण गाया भजन ‘विट्ठला हरि विट्ठला’ भी इस कड़ी में सुनेंगे।

अमृत गंगा 13

अमृत गंगा की तेरहवीं कड़ी में, अम्मा हमें निठल्ले न बैठने की याद दिला रही हैं। आलस्य हमारी दुर्वासनाओं को बढ़ाती है और व्यायाम की कमी से शरीर में पित्त और कफ़ में भी वृद्धि होती है। कर्म करते रहें तो स्वास्थ्य और उत्साह बने रहते हैं। अम्मा कहती हैं कि भले ही हम कोई बड़े काम न कर सकें, फिर भी छोटे-छोटे कर्म करके बड़ी उपलब्धि पा सकते हैं।

इस कड़ी में अम्मा का यू एस के सीएटल, वाशिंग्टन की यात्रा और उसके रास्ते में श्रीलंका में पहले पड़ाव को दर्शाया गया है। साथ ही उनका भावपूर्ण गाया हुआ कृष्ण-भजन, ‘रामकृष्ण गोविन्द नारायण हरि!’