अमृत गंगा 26

अमृत गंगा की छब्बीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि उपदेश पाने के बाद भी, हम उस पर ध्यान नहीं देते। हम नाहक ही मुसीबतें खड़ी करके, उनमें फंस जाते हैं। तनाव और चिंता मुफ़्त मिलते हैं इसलिए हम उन्हें जी भर ले लेते हैं। इसके फलस्वरूप कई बीमारियाँ हो सकती हैं, लेकिन हम उस कीमत के प्रति जागरूक नहीं रहते। इस तरह, हमारा जीवन बर्बाद हो सकता है। कोई भी समस्याओं से मुक्त नहीं है। आध्यात्मिकता हमें ऐसी परिस्थितियों से निपटने या स्वीकार करने योग्य उचित मनोभाव विकसित करने में सहायता करती है।

इस कड़ी में, अम्मा की कैनेडा के टोरोंटो की यात्रा जारी है और साथ ही अम्मा का गाया भजन सुनिए…जिनकी करुणा है अपार..!

अमृत गंगा 25

अमृत गंगा की पच्चीसवीं कड़ी में, अम्मा ने कहा कि हालाँकि हम सबको सफ़लता और ख़ुशी की चाह होती है, लेकिन रास्ते में अड़चनें आती रहती हैं। किसी की समस्या निजी-सम्बन्धों को ले कर होती है तो किसी को आर्थिक या स्वास्थ्य-सम्बन्धी! लेकिन एक समस्या जो हम सबके लिए सामान्य है, वो है चिंता! हमारी सबसे बड़ी शत्रु! अगर हम चिंता का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि यह भय और कुछ कष्टकारी विचारों की पुनरावृत्ति के सिवा कुछ नहीं। इसकी बजाय, हमें अपने मन्त्र का जप करना चाहिए। अम्मा कहती हैं कि हमारी जितनी भी बाहरी समस्याएं हैं, उनके समाधान की ओर पहला कदम है चिंता पर जय पाना!

इस कड़ी में, आप देखेंगे..अम्मा की टोरोंटो, कैनेडा की यात्रा और अम्मा का गाया हुआ भजन, ‘मात भवानी महेशी अम्बे..’

अमृत गंगा 24

अमृत गंगा की चौबीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि हमें दुःखी लोगों को सांत्वना देनी चाहिए। लोग अज्ञानवश, अशिष्टतापूर्ण व्यवहार करते हैं और हमें ऐसी स्थितियों में बोध बनाये रखना चाहिए। हमें दूसरे लोगों की मनःस्थिति व आध्यत्मिक-विकास को समझना चाहिए। जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियों को साक्षी भाव से देखना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे, तैरना आता हो तो हम लहरों का आनन्द ले सकते हैं; लेकिन जिसे तैरना न आता हो, वो तो डूब सकता है। इसीलिये, जीवन में आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। यह अंधश्रद्धा का नाम नहीं बल्कि इससे तो आंतरिक अंधत्व दूर होता है। आध्यात्मिकता हमारी आधारशिला बन जानी चाहिए।

इस कड़ी में अम्मा की वाशिंग्टन डी सी, यू.एस.ए की यात्रा जारी है और इस कड़ी में अम्मा पंजाबी भजन गा रही हैं,..मैया जी मेन्नु तू…

अमृत गंगा 23

अमृत गंगा की तेईसवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि सब प्रकार के अनुभवों का कारण मन है। हमें अपने मन को जानना होगा। लोग हमें सराहें तो हम हर्षोल्लास से भर जाते हैं और आलोचना कर दें तो क्रोध और निराशा हमें घेर लेते हैं। जैसे संकट का भान होते ही, कछुआ अपने सिर को अंदर खींच लेता है, वैसे ही हमें भी संकट के आने पर अन्तर्मुखी हो कर अपनी सीमितताओं को पहचानना चाहिए। जिन लोगों ने शास्त्रों का अध्ययन किया है, उनमें वस्तुओं को उनके स्वभावानुसार, साक्षी-भाव से देखने की क्षमता होती है। हमें यह समझना होगा कि वस्तुएं सुख का स्रोत नहीं हैं। सुख-दुःख का एकमात्र कारण, मन है।

इस कड़ी में आप देखेंगे..अम्मा की बोस्टन, यू.एस की यात्रा और सुनेंगे अम्मा का गाया हुआ भजन..राधा रानी के प्यारे घनश्याम..

अमृत गंगा 22

अमृत गंगा की बाईसवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि सृष्टि की रचना पहले भीतर होती है, फिर बाहर! इसे स्पष्ट करने के लिए, वो उस पेंटर का उदाहरण दे रही हैं जो बाहर पेंटिंग में अभिव्यक्त करने से पहले, उसके विषय में भीतर सोचता है…उस कुम्हार का जो मिट्टी हाथ में ले कर, पहले मन ही मन रूप-आकार की अभिकल्पना कर लेता है। मन शान्त है तो सब ठीक है! हमें भी अपने विचारों पर ध्यान देना चाहिए कि वे उचित हैं या अनुचित। आत्म-परीक्षण की आदत डालने में समय लग सकता है लेकिन इसके अभ्यास से हमारा मन दुःख-मुसीबत आने पर भी संतुलित बना रहेगा।

इस कड़ी में, अम्मा की अमेरिकी यात्रा न्यू-यॉर्क में जारी है। इस कड़ी में अम्मा एक भक्तिपूर्ण भजन भी गा रही हैं, ‘नाचे तू मम मन में…’