अमृत गंगा 22

अमृत गंगा की बाईसवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि सृष्टि की रचना पहले भीतर होती है, फिर बाहर! इसे स्पष्ट करने के लिए, वो उस पेंटर का उदाहरण दे रही हैं जो बाहर पेंटिंग में अभिव्यक्त करने से पहले, उसके विषय में भीतर सोचता है…उस कुम्हार का जो मिट्टी हाथ में ले कर, पहले मन ही मन रूप-आकार की अभिकल्पना कर लेता है। मन शान्त है तो सब ठीक है! हमें भी अपने विचारों पर ध्यान देना चाहिए कि वे उचित हैं या अनुचित। आत्म-परीक्षण की आदत डालने में समय लग सकता है लेकिन इसके अभ्यास से हमारा मन दुःख-मुसीबत आने पर भी संतुलित बना रहेगा।

इस कड़ी में, अम्मा की अमेरिकी यात्रा न्यू-यॉर्क में जारी है। इस कड़ी में अम्मा एक भक्तिपूर्ण भजन भी गा रही हैं, ‘नाचे तू मम मन में…’

अमृत गंगा 21

अमृत गंगा की इक्कीसवीं कड़ी.. अम्मा हमें शास्त्रों और आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने को प्रोत्साहित करती हैं; क्योंकि उनसे हमें शिक्षा मिलती है कि महात्माओं ने जीवन में आने वाली परिस्थितियों का कैसे सामना किया। युग कोई भी हो, हमें महाभारत और रामायण से मिलती-जुलती घटनाएं देखने को मिलती रहेंगी। जहाँ-तहाँ, इन ग्रंथों में वर्णित पात्रों जैसे लोग मिलेंगे। हम उनसे सीख सकते हैं कि ऐसी ही परिस्थितियों से वे महात्मा लोग कैसे उबरे। लेकिन हम कितना भी पठन-पाठन कर लें, हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम तत्त्वनिष्ठ महात्माओं या गुरुओं से आभ्यासिक शिक्षा प्राप्त करें।

इस कड़ी में, अम्मा की न्यू-यॉर्क, यू.एस.ए की यात्रा जारी है। और अम्मा इस कड़ी में गुजराती भजन गा रही हैं… ‘मीठी मधुरी’.

अमृत गंगा 20

अमृत गंगा की बीसवीं कड़ी में, अम्मा हमें चेतावनी दे रही हैं कि हमारा मन हमारे विश्वास और सामर्थ्य को अवरुद्ध करता है। मन प्रेम और क्रोध, दोनों को दृढ़तापूर्वक पकड़ कर, संसार से बंध जाता है। हमें वही भाता है, जो मन को भाता है। अगर हमें कोई अच्छा न लगे तो हम उसमें दोष ढूंढने लगते हैं। कोई अच्छा लगे तो उससे हमारा अनुराग हो जाता है। आसक्ति मन का स्वभाव ही है। मन ही हमारे सुख-दुःख का एकमात्र कारण है। यदि हम परमात्मा के शरणागत हो जाएँ तो बिना कहीं बंधे, अटके आगे बढ़ जायेंगे।

इस कड़ी में, अम्मा की US की यात्रा..शिकागो, इलेनॉइस में जारी है। यहाँ अम्मा भावपूर्वक ‘काली दुर्गे नमो नमः’ – यह भजन भी गा रही हैं।

अमृत गंगा 19

अमृत गंगा की उन्नीसवीं कड़ी में, अम्मा हमें प्रोत्साहित कर रही हैं कि हम कृष्ण और राम जैसे महात्माओं के जीवन-चरित्र को पढ़ें, सुनें ताकि हम जानें कि उन्होंने अपने जीवन में समस्याओं का सामना कैसे किया। उनकी तरह, हमें भी परमात्मा पर निर्भर रहना चाहिए। परमात्मा या सद्गुरु में हमारा विश्वास होना चाहिए। उनकी शिक्षाओं में असीम शक्ति होती है। इस विश्वास के सहारे, हम अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। यह हम में आत्मविश्वास जगा कर, हमें पूर्ण बनाता है। हमारा सम्पूर्ण जीवन विश्वास पर आधारित है।

इस कड़ी में अम्मा की डैलेस, टैक्सस (अमेरिका) की यात्रा जारी है और अम्मा एक कृष्ण-भजन, श्याम गोलोक में…भावपूर्वक गा रही हैं।

अमृत गंगा 18

अमृत गंगा की अठारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि जब चीज़ें हमारे मन मुताबिक न हों तो इसे अपने पूर्वकर्मों का फल समझना चाहिए; भाग्य को दोष नहीं देना चाहिए। रोने-धोने की बजाय हमें इसे स्वीकार करके, आगे बढ़ जाना चाहिए। अगर कोई फ़िसल कर गिर जाता है तो केवल रोते हुए वहीं बैठे रहने से वो आगे नहीं बढ़ सकेगा। यूँ सोचना चाहिए कि, “शायद मुझे और ज़्यादा सावधान बनाने के लिए यह परिस्थिति आई है।” भाग्य और कुछ नहीं, अपने ही पूर्वकर्मों का फल है। किन्तु हम कर्म के सूक्ष्म पक्षों को समझ नहीं पाते। कर्म का सिद्धान्त देश-काल द्वारा सीमित नहीं है। इसीलिये अम्मा कहती हैं कि भाग्य को दोष न दो, बल्कि प्रत्येक अनुभव को स्वीकार करो। इस कड़ी में अम्मा की अमेरिकी यात्रा सैंटा-फ़े, न्यू-मैक्सिको में जारी है।

इसी कड़ी में, आप अम्मा को एक बंगाली भजन भावपूर्वक गाते सुनेंगे..जपो नाम जपो नाम…