Category / अमृतगंगा

अमृत गंगा 10 अमृत गंगा की दसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि अपने में परिवर्तन लाने के लिए, हमें राह नहीं देखनी कि पहले दूसरे बदलें। बल्कि, पहले हम बदलें और दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनें। हमारा प्रत्येक सत्कर्म, प्रत्येक सुविचार कई गुणा फल देगा। जब हमारे हृदय में अरुणोदय होगा तो उसका […]

अमृत गंगा 9 अमृत गंगा की नवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि ईश्वर कहीं दूर, बादलों के पार.. स्वर्ण-सिंहासन पर नहीं बैठा। ईश्वर हम सबके भीतर विद्यमान है। जब हम दूसरों की सहायता करते हैं तो हमारे भीतर विद्यमान परमात्मा जागृत हो उठता है। जैसे वृक्ष को बीज के बाहरी खोल को तोड़ […]

अमृत गंगा 8 अमृत गंगा की आठवीं कड़ी में, अम्मा हमें याद दिला रही हैं कि हमारी साधना का लक्ष्य अपनी खोई हुई सरलता को पाना है। सरलता, सहजता द्वारा ही हममें आत्मज्ञान जागृत होगा। अम्मा कहती हैं कि अभी हमारी सरलता, निष्कलङ्कता को अहंकार के धुएँ ने ढक रखा है और इस अहंकार का […]

अमृत गंगा 7 अमृत गंगा की सातवीं कड़ी में अम्मा हमें याद दिला रही हैं कई हमारे हाथ में कुछ है तो केवल वर्तमान क्षण। बीता हुआ कल ‘आज’ नहीं बन सकता और आने वाला कल भी आज नहीं हो सकता। अगली सांस तक हमारे हाथ में नहीं है। फल देने की शक्ति केवल ईश्वर […]

अमृत गंगा 6 अमृत गंगा की छठी कड़ी में, अम्मा हमें हमारे भीतर छुपी अच्छाई को कर्म में ढालने को कह रही हैं। अम्मा कहती हैं कि अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने से हमें आन्तरिक शक्ति, वैराग्य और आगे बढ़ने हेतु आवश्यक प्रयास करने की प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार, हम दूसरों के लिए […]