Category / अमृतगंगा

अमृत गंगा S2-14 अमृत गँगा, सीज़न २ की चौदहवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि जागरूकता एक साधना है और यह सब समस्याओं की कुञ्जी है। जागरूकता के आने पर अज्ञान टिक नहीं सकता, अन्धकार जाता रहता है। हमें अपने विचारों, वचनों और कर्मों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। हमारी दृढ़ निष्ठा हो कि एकमेव […]

अमृत गंगा S2-13 अमृत गँगा, सीज़न २ की तेरहवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि देश और काल कर्म के सिद्धान्त में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। कर्मफल हमारा पीछा करेंगे ही। अधर्मी लोग भाग कर कहीं भी चले जाएँ, शान्ति नहीं मिलेगी! हम जो बोयेंगे, वही काटना पड़ेगा। इसीलिये अम्मा हमेशा हमें कुछ बोलने […]

अमृत गंगा S2-12 अमृत गँगा सीज़न २ की बारहवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि करुणा हमारा स्वभाव है। दूसरों की सहायता करने का भाव हम में अन्तर्निहित है, किन्तु स्वार्थ-भाव करुणा को प्रकट नहीं होने देता। हम दूसरों के दुःख को जान नहीं पाते। स्वार्थ-भाव हमारे हृदय की करुणा को मलिन कर देता […]

अमृत गंगा S2-11 अमृत गँगा, सीज़न 2 की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि हमें दूसरों पर आश्रित हुए बिना अपने भीतर ही आनन्द खोजना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि दूसरे लोग हमें कभी भी छोड़ कर जा सकते हैं। हम जान लें कि सच्चा सुख तो अपने भीतर ही पाया जा सकता […]

अमृत गंगा S2-10 अमृत गंगा, सीज़न 2 की दसवीं कड़ी में, अम्मा ने कहा कि आज प्रश्न यह नहीं कि ज़्यादा कैसे जियें, बल्कि कैसी ज़िन्दगी जियें! जब तक हमें इसका समाधान अंदर से नहीं मिलता, हमारे जीवन में तृप्ति, सन्तोष का अभाव रहेगा। हम जी रहे हैं लेकिन अंदर दुःख भरा है। हमें अपने […]