मठ विद्यालय एवं सार्वजनिक स्थानों की सफाई का बीड़ा उठायेगा

23 सितंबर, 2010, अमृतपुरी
अम्मा (माता अमृतानन्दमयी देवी) ने कहा कि यदि राज्य सरकारों एवं अन्य संस्थाओं का साथ और सहयोग मिले तो माता अमृतानन्दमयी मठ विद्यालयों एवं सार्वजनिक स्थानों कि सफाई की जिम्मेदारी लेने को तैयार है। अम्मा ने कहा, “ऐसा कहा जाता है कि भारत प्रगतिशील है, उसका विकास हो रहा है। परंतु पर्यावरण और स्वास्थ्य की दृष्टि से सफाई में, हम बहुत पिछड़े हुए हैं। हमारे यहाँ की सड़कें एवं सार्वजनिक स्नानगृह एवं शौचालय इसका उदाहरण है।”

पश्चिमी देश, सडकों, सार्वजनिक स्थानों के साथ-साथ सार्वजनिक स्नानगृह और शौचालयों में उच्चकोटि की स्वच्छता रखतें हैं। इसके विपरीत भारत में  सड़कों एवं सार्वजनिक शौचालयों की स्वच्छता की स्थिति बहुत भयावह है।
सड़क के किनारे एवं सार्वजनिक रास्तों एवं फुटपाथ पर पेशाब करने और थूकने की लोगों की आदत हो गई है। कूडेदान होने के बावजूद भी, वे काई करकट एवं बचे हुए खाने को उसमें डालने के आदी नहीं हैं। वे उसे यूँ ही सड़क किनारे या फिर सड़क के बीचों-बीच फेंक देते हैं। पर्यावरण एवं स्वास्थ्यजनिक स्वच्छता प्रगति एवं सांस्कृतिक शुद्धता का एक भाग है।

इसके लिए हमें बडे पैमाने पर जागरूकता अभियान योजना बनानी होगी। हमें सार्वजनिक स्थानों बस-अड्डों और सड़क किनारों पर पर्यावरण स्वच्छता के बडे-बडे साईनबोर्ड लगाने चाहिए।

अम्मा ने इसपर भी जोर दिया कि इस अभियान की सफलता के लिए दूरदर्शन एवं समाचार पत्रों का सही मायने में साथ एवं सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकारें, विद्यालय संचालन समितियाँ और स्थानीय लोगों का सहयोग हो तो माता अमृतानन्दमयी मठ स्कूलों एवं सार्वजनिक स्थानों पर सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के लिए तैयार है।

पूरी योजनाबद्ध तरीके से और विद्यालयों एवं जनसामान्य के सहयोग से इस परियोजना को मूर्त रूप दिया जायेगा।

सर्वप्रथम केरल में यह योजना शुरू की जायेगी। उसके बाद, क्रमबद्ध रूप से भारत के अन्य राज्यों में भी इसे शुरू किया जायेगा।

प्रश्न – अम्मा, क्या जीवन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, भौतिक और आध्यात्मिक? इनमें कौन सा भाग हमें सुख देता है?

अम्मा – बच्चों, इन दो भागों को अलग देखने की जरूरत नहीं है। अंतर केवल मानसिक दृष्टिकोण में है। हमें आध्यात्मिकता समझ लेनी चाहिये और उसी के अनुसार जीवन जीना चाहिये, तभी जीवन आनंदमय होगा। आध्यात्मिकता हमें सच्चा सुखी जीवन जीना सिखाती है। मानो जीवन का भौतिक पक्ष – चावल है और आध्यात्मिक पक्ष शक्कर है। आध्यात्मिकता की मिठास खीर को मीठा बनाती है। आध्यात्मिक समझ से जीवन में मधुरता आती है।

यदि तुम केवल जीवन के भौतिक पक्ष को महत्व दोगे तो दुःख ही पाओगे। जो केवल सांसारिक सुखों की कामना करते हैं, उन्हें दुःख भोगने के लिये भी तैयार रहना चाहिये। अतः जो दुःख झेलने के लिये तैयार हों उन्हें ही सांसारिक वस्तुओं के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। सांसारिक पक्ष हमेशा तुम्हें परेशान करेगा व पीड़ा देगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम संसार का पूरी तरह त्याग कर दो। अम्मा केवल यही कह रही है कि संसार में रहते हुए, आध्यात्मिकता की समझ होना आवश्यक है। तब तुम्हें सांसारिक दुःख कमजोर नहीं कर पायेंगे। क्योंकि हमारा अपना होने का दावा करने वाले संबंधी भी वास्तव में हमारे नहीं हैं। हमारा परिवार भी वास्तव में हमारा परिवार नहीं है। केवल भगवान ही हमारे अपने हैं। शेष कोई भी, कभी भी, हमारे विरुद्ध जा सकता है। लोग केवल अपने सुख के लिये हमें प्यार करते हैं। जब दुःख, बीमारी और मुसीबत आती है, तो हमें उसे अकेले ही झेलना पड़ता है। इसलिये केवल भगवान से जुड़े रहो। अगर हम संसार से जुड़ जायेंगे, तो अपनी स्वतंत्रतता फिर से पाना बहुत कठिन हो जायेगा। संसार की आसक्ति से मुक्त होने के लिये एक व्यक्ति को अनगिनत जन्म लेने पड़ते हैं।

जीवन ऐसे जीना चाहिये, जैसे अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हों। तब लोगों के मुँह फेर लेने या विरुद्ध हो जाने पर भी हम उदास नहीं होंगे। हमारी जान से भी प्यारा कोई व्यक्ति तक यदि अचानक हमारे विरुद्ध हो जाये तो भी हम नहीं टूटेंगे, निराश नहीं होंगे।
अगर तुम्हारे हाथ में चोट लगी है, तो बैठकर रोने से वह ठीक नहीं हो जायेगी। धन नष्ट होने पर या संबंधी के वियोग पर भी बैठकर रोने से कुछ नहीं होगा। रोने से कुछ भी वापस नहीं आयेगा। पर अगर हम समझ लें और स्वीकार कर लें कि आज जो हमारे साथ हैं वे कल हमें छोड भी सकते हैं, तो हम किसी के छोड जाने या विरुद्ध हो जाने पर भी अप्रभावित रह सकेंगे। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम किसी को प्यार न करें। हमें सबको प्यार करना चाहिये। परंतु हमारा प्यार निस्वार्थ, निश्छल और बिना किसी अपेक्षा के हो। इस प्रकार हम आसक्ति से पैदा होने वाले दुखों से बच सकते हैं।

सांसारिक जीवन में दुःख है। फिर भी यदि हममें आध्यात्मिक समझ हो तो हम इससे सुख पा सकते हैं। यदि हम प्रशिक्षण पाये बिना तूफानी समुद्र में कूद पडेंगे तो लहरें हमें दबा देंगी और हम डूब भी सकते हैं। पर जिन्हें समुद्र में तैरना आता है उन्हें लहरों से कोई परेशानी नहीं होगी। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिकता हमारे जीवन का आधार हो तो हम किसी भी परिस्थिति में आगे बढ़ सकते हैं।

मन का यह स्वभाव है कि वह एक वस्तु को पसंद करता है तो दूसरी से घृणा। कुछ लोगों को लगता है कि वे सिगरेट के बिना जी नहीं सकते, जब कि दूसरों को सिगरेट के धुएँ से भी परेशानी होती है। दुःख और सुख मन की उपज हैं। अगर तुम मन पर नियंत्रण करके, उसे सही मार्ग पर चला दो, तो जीवन में सुख ही सुख रहेगा। इसके लिये आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता है। उसके अनुसार जीवन यापन करने पर तुम्हें कभी दुखी नहीं होना पड़ेगा।

हमेशा मंत्र जप करो। केवल ईश्वर चर्चा करो। समस्त स्वार्थ का त्याग करो। सब कुछ प्रभु को समर्पित कर दो। इन चार सूत्रों का पालन करने पर, हम कभी दुखी नहीं होंगे।
जब हम संसार की किसी भी वस्तु से इतनी आसानी से जुड़ सकते हैं, तो ईश्वर से क्यों नहीं? यदि हमारी ज़ुबान संसार के हर विषय पर चर्चा कर सकती है तो मंत्रजप क्यों नहीं कर सकती? यदि हम ये कर सकें, तो हम व हमारे निकटवर्ती लोग भी सुख शांति का अनुभव करेंगे। अधिकांश लोग अपनी समस्याओं पर, अपने मिलने वालों से विचार विमर्श करते हैं। इससे उनकी कोई समस्या तो हल नहीं होती बल्कि सुनने वाले भी दुखी हो जाते हैं। यह वैसा है जैसे एक छोटा साँप बड़े मेंडक को निगलने की कोशिश कर रहा हो – साँप उसे निगल नहीं पाता और मेंडक बच भी नहीं पाता।
सांसारिक होने का अर्थ है, भगवान को भूल जाना – आत्मकेन्द्रित होकर अपने सुख के अलावा और कुछ न चाहना, सुख के लिये, भौतिक वस्तुओं पर निर्भर रहना और छोटी-छोटी मौज-मस्ती के पीछे जीवन भर दुखी होते रहना। इस तरह के लोग अपनी शांति खो देते हैं और आसपास के लोगों को भी दुखी कर देते हैं। आध्यात्मिक होने का अर्थ है – निस्वार्थ होना और सबकुछ परमेश्वर को समर्पित कर देना, यह जानते हुए कि सब कुछ उसी का है। जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं, वे स्वयं आंतरिक शांति अनुभव करते हैं तथा निकतवर्ती लोगों में भी शांति का अहसास जगाते हैं।

हमेशा मंत्र जप करो। केवल ईश्वर चर्चा करो। समस्त स्वार्थ त्याग दो। सब कुछ प्रभु को समर्पित कर दो। इन चार सूत्रों का पालन करने पर, हम कभी दुःखी नहीं होंगे।

प्रश्न – वर्तमान सामाजिक समस्याओं से कैसे निपटना चाहिये?

अम्मा – वर्तमान समस्याएँ गंभीर चिंता का विषय हैं। यह जरूरी है कि हम समस्याओं का कारण जानें और फिर उनका निदान करें। परंतु ध्यान रखें कि परिवर्तन एक व्यक्ति से ही शुरू होता है। जब एक व्यक्ति सुधरता है, तो पूरे परिवार को उसका लाभ मिलता है और समाज समृद्ध होता है। अतः सबसे पहले हमें स्वयं को सुधारने का प्रयास करना चाहिये। जब हम सुधरते हैं, तो हमारे आस-पास सभी प्रभावित होते हैं। उनमें भी सकारात्मक परिवर्तन होते हैं। केवल सलाह देकर या डाँट फटकार से हम किसी को नहीं बदल सकते। हमें स्वयं एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिये। हमें सबके प्रति स्नेहिल और उदार होना चाहिये। केवल निश्छल प्रेम से ही हम दूसरों में बदलाव ला सकते हैं। हो सकता है परिवर्तन के लक्षण, तत्काल न दिखें, पर प्रयत्न नहीं छोडना चाहिये और आशा बनाये रखनी चाहिये। कम से कम हमारे प्रयत्न, हममें तो सकारात्मक परिवर्तन लायेंगे ही।
अगर हम कुत्ते की पूँछ को नली में रखकर सीधा करने का प्रयत्न करेंगे, तो पूँछ तो सीधी नहीं होगी, हाँ हमारी मांसपेशियाँ जरूर पुष्ट हो जायेंगी। परंतु जब हम स्वयं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो हम खुद तो सुधरते ही हैं, दूसरों में भी कुछ परिवर्तन तो अवश्य लाते हैं, चाहे वे प्रत्यक्ष न भी दिखें। कम से कम हमारे प्रयत्नों से समाज का और अधिक पतन होना रुक जाता है। ऐसे प्रयत्नों से ही हम समाज में कुछ सद्भाव व सामन्जस्य बनाये रख सकते हैं।

धारा के विरुद्ध तैरता हुआ व्यक्ति, चाहे आगे न भी बढे, पर अपने प्रयत्न से वह अपनी जगह पर कायम है और बह जाने से बचा हुआ है। प्रयत्न छोड देगा तो वह डूब जायेगा। इस तरह, हमारा प्रयत्न करते रहना आवश्यक है।

तुम शंका कर सकते ह, “इस अंधियारे संसार में, एक अकेले व्यक्ति के द्वारा संघर्ष करते रहने से क्या लाभ?” हम में से हर एक के पास एक मोमबत्ती है, मन की मोमबत्ती। उसमें श्रद्धा और विश्वास की ज्योति जलाओ। यह चिंता मत करो कि इतने छोटे प्रकाश से इतनी लम्बी यात्रा कैसे पूरी होगी। एक समय में एक ही कदम बढाओ। तुम पाओगे कि सारे रास्ते में प्रत्येक कदम के लिये पर्याप्त प्रकाश है।

एक आदमी सडक के किनारे, बिल्कुल निराश दशा में खडा है। एक राह गुजरते व्यक्ति ने उसकी ओर देखा व मुस्कुरा दिया। निराश आदमी, जिसको सबने त्याग दिया था, उस मुस्कुराहट से प्रभावित हुआ। इस विचार से, कि कोई तो है जो उसकी परवाह करता है, उसमें नई शक्ति आ गई। उसे एक दोस्त की याद आई, जिससे वह एक मुद्दत से नहीं मिला था, उसने दोस्त को एक पत्र लिखा। दोस्त पत्र पाकर इतना खुश हुआ कि उसने पास खडी एक गरीब स्त्री को दस रुपये दे दिये। स्त्री ने उन रुपयों से, एक लाटरी टिकट खरीदा और महान आश्चर्य! वह लाटरी जीत गई। जब वो इनाम लेकर लौट रही थी, तो उसने एक बीमार भिखारी को फुटपाथ पर पडे देखा। उसने सोचा, ‘भगवान ने मुझ पर इतनी कृपा की है, तो मुझे भी इस गरीब की मदद करनी चाहिये।’ वह उसे अस्पताल ले गई तथा उसके इलाज का बंदोबस्त किया। जब वह भिखारी अस्पताल से छूटा, तो उसे एक कुत्ते का पिल्ला दिखा, जो भूखा व कमजोर था और ठंड में ठिठुर रहा था। वह कूँ कूँ कर रो रहा था। भिखारी को दया आ गई, उसने उस पिल्ले को उठा लिया और कपडा लपेट कर आग के पास ले गया। उसे अपने खाने में से खिलाया। प्यार और देखभाल से पिल्ला जल्दी ही ठीक हो गया और भिखारी के साथ-साथ जाने-आने लगा। रात को भिखारी ने एक मकान में शरण माँगी, तो उन्होंने पोर्च में सोने की जगह दे दी। रात में पिल्ले के भौंकने से लोग जाग गये। देखा तो घर में आग लगी है, बच्चे के बेडरूम के एकदम पास! वे अंतिम क्षणों में बच्चे को निकाल लाये और सबने मिलकर आग बुझाई। इस तरह एक अच्छे कार्य ने दूसरे कई अच्छे कार्यों को जन्म दिया। भिखारी को शरण देने से, उसके कुत्ते ने परिवार को आग से बचाया। वह बच्चा आगे चलकर संत बना। उसके सत्संग से अनगिनत लोगों ने शांति व आनंद का अनुभव पाया।

कहानी का विश्लेषण करें तो सब अच्छे कार्य एक व्यक्ति की मुस्कराहट से शुरू हुए। उसमें उसने कुछ भी खर्च नही किया, केवल एक राहगीर की ओर देखकर मुस्कुरा दिया। एक मुस्कान ने कितने लोगों के जीवन में प्रकाश भर दिया।

दूसरों के हित में किया गया छोटे से छोटा कार्य भी, समाज में बडा परिवर्तन ला सकता है। चाहे हमें तत्काल इसका पता न भी चले, हर भला कार्य, निश्चित रूप से अच्छा फल देता है। इसलिये हमें सुनिश्चित करना चाहिये, कि हम हर कार्य इस ढंग से करें कि वह दूसरों के लिये हितकारी हो। एक मुस्कान भी बेशकीमती है और हमें उसके लिये कुछ खर्च भी नहीं करना पडता। दुर्भाग्यवश आजकल लोग बहुधा, दूसरों का मजाक उडाते हुए हँसते हैं – हँसी ऐसी नहीं होनी चाहिये। बल्कि हमें अपनी स्वयं की गलतियों और कमजोरियों पर हँसना आना चाहिये।

कोई भी व्यक्ति, अलग थलग द्वीप नहीं है। हम सब आपस में जुडे हुए हैं जैसे एक जंजीर की कडियाँ । चाहे हमें उसका ज्ञान हो या न हो, हमारे कार्य दूसरों को प्रभावित करते हैं। एक व्यक्ति में आ रहा बदलाव, दूसरों में भी परिलक्षित होगा।

यह कहना कोई अर्थ नहीं रखता, कि पहले दूसरे सब सुधर जायें, तब मैं सुधरने का प्रयत्न करूँगा। यदि हम स्वयं बदलने को तैयार हैं, तो इसका प्रभाव व परिवर्तन, हम समाज में देख सकते हैं। यदि तुम्हें अपने में वांछित और अपेक्षित परिवर्तन न दिखें, तो हताश न हों, परिवर्तन अंदर ही अंदर हो रहा है। और हममें हो रहा कोई हितकारी परिवर्तन, निश्चय ही समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन लायेगा।

आज सभी ऊपर, अपने से उच्च दर के लोगों व जीवन शैली को देखने में ही रुचि रखते हैं। अपने से निम्न अवस्था में जीने वाले लोगों के हाल पर कोई सोचने तक को तैयार नहीं है। अम्मा को एक कहानी याद आ गई। एक धनिक के घर पर एक बेचारी, दरिद्र महिला काम किया करती थी। वह विधवा थी। उसकी एक विकलांग बेटी थी। काम पर वह अपनी इस विकलांग बेटी को भी साथ लिये जाती थी। बेटी को कहीं बिठाकर वह अपना काम किया करती थी। उस धनिक की भी एक बेटी थी। उस लडकी को उस नौकरानी की बेटी बहुत पसन्द थी। नौकरानी की बेटी आयु में उससे कम थी। वह लडकी उस बच्ची को उठाये घूमती, उसे पुचकारती, प्यार करती, उसे मिष्ठान्न खिलाती, कहानियाँ सुनाती, ….। पर उसका यह व्यवहार उसके पिताजी को बिल्कुल पसन्द नहीं था। हर दिन वे बेटी को डाँटते थे, ”तू उसके साथ मत खेला कर। उस विकलांग, गन्दे बच्ची को तू क्यों उठाये चलती है?“ उनकी बेटी मौन ही रहती। पिताजी ने सोचा कि शायद खेलने के लिये और किसे के न होने के कारण वह उस लडकी के साथ खेलती है। ऐसा सोचकर वे अपने एक मित्र की बेटी को घर लिवा लाये। उनकी बेटी उस लडकी को देखने पर मुस्कुराई, उसने उससे कुशल मंगल पूछा और फिर उस नौकरानी के बच्ची को उठाकर पुचकारने लगी। यह देखकर पिताजी ने प्रश्न किया, ”पिताजी जिस लडकी को लाये वह क्या तुम्हें पसन्द नहीं है?“ तब उस बालिका ने उत्तर दिया, ”ऐसी बात नहीं है पिताजी, आप जिस लडकी को लाये वह मुझे पसन्द है परन्तु उसे प्यार देनेवाले बहुत हैं! पर इस लडकी को मेरे सिवा अन्य कौन प्यार देगा? उसका अपना कोई नहीं है।“

Tsunami babies

बच्चों, हमारा मनोभाव भी ऐसा हो। बच्चों, गरीबों और पीडतों को तुम पूरे दिल से प्यार दो। उनके तल पर जाकर उनका उद्धार करने का श्रम करो। ईश्वर के प्रति हमारा कर्तव्य भी यही है। बच्चे शायद प्रश्न करें कि यदि निस्स्वार्थ सेवा का इतना अधिक महत्व है तो फिर ध्यान, तप, इत्यादि की आवश्यकता ही क्या है। बच्चों, एक साधारण व्यक्ति यदि बिजली के एक खंबे के समान है तो एक तपस्वी एक ट्रान्सफार्मर के समान है। तपस से महत्त शक्ति का अर्जन हो सकता है। वह उनेक धार वाली एक नदी पर बाँध बाँधकर रोकने पर एकत्रित शक्ति के समान है। तपस से अर्जित इस शक्ति को परोपकारार्थ समर्पित करने का मनोभाव भी होना चाहिये। स्वयं जलकर संसार भर को सुगंध देते अगरबत्ती की तरह उसे भी सब कुछ समर्पित करने को तैयार होना चाहिये। वैसे विशाल हृदय में ईश्वर कृपा स्वयमेव प्रवाहित होगी।

बच्चों, हमें एक करुणापूर्ण हृदय विकसित करने का श्रम करना है। पीडतों की सेवा करने की व्याकुलता हममें जगानी है। किसी भी परिस्थिति में लोक हितार्थ सेवा करने को तत्पर एक मन हमें गढना है।

कई लोग संसार को देखने वाली हमारी दो आँखों को बन्द करके तीसरी आँख को खोलने के लिये ध्यान करते हैं। यह कभी संभव न हो पायेगा। अध्यात्म के नाम पर इस संसार से आँखें मूँदे नहीं जा सकते, संसार को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दोनों आँखों को खुला रखते हुए ही सभी जीवजालों में स्वयं अपना ही दर्शन करना ही आत्मसाक्षात्कार है। सभी में स्वयं अपने ही दर्शन करते हुए, सभी की सेवा करने की व सभी से प्रेम करने का भाव हमें अर्जित करना है। उसी में आध्यात्मिक साधना की पूर्णता है।

अम्मा के भक्तों के लिये दिये गये उपदेशों मे से

बच्चों, निःस्वार्थ जन सेवा ही आत्मान्वेषण का आरंभ है। इस अन्वेषण का अंत भी उसी में है। गरीबों और पीडतों के प्रति करुणा व दया ही ईश्वर के प्रति हमारा कर्तव्य है। इस संसार में हमारा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य सहप्राणियों की मदद, सेवा करना है। ईश्वर हमसे कुछ नहीं चाहते, हमसे कुछ पाना नहीं चाहते। वे सदा पूर्ण हैं। सूर्य को हमारे दीये के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर समस्त प्रपंच के रक्षक हैं। वे प्रेम व करुणा मूर्ति हैं। हम उस प्रेम व करुणा को आत्मसात कर सकें तो ही हम विकास कर पायेंगे। एक संन्यासी बिना किसी बंधन, बिना ममता के प्रेम करना और किसी प्रतिफल की इच्छा के बिना सेवा करना सीखता है। स्वार्थ की गठरी का त्याग करके उन्हें निःस्वार्थ लोक सेवा रूपी गठरी को कंधा देना चाहिये। यदि जीवमात्र के प्रति स्नेह और सब की निष्काम भाव से सेवा करने का भाव हो तो ही हम भगवद् कृपा के पात्र बनेंगे। निष्काम सेवा से अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्धि बिना ध्यान करना गंदे बर्तन में दूध डालने के समान होगा। परन्तु अधिकांशतः हम इस सत्य को भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि पीडतों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है।

Amma consoles tsunami victims

जब हम मंदिर जाते हैं, हम भगवद् नामजप करते हुए तीन बार गर्भगृह की प्रदक्षिणा करते हैं। परन्तु जब हम मंदिर के बाहर आते हैं और वहाँ ऐसा कोई जो काम करने में असमर्थ है या कोई रुग्ण, भोजन के लिए हमारे सामने हाथ पसारता है तो हम उसे दुतकार देते हैं। बच्चों, दुखियारों के प्रति करुणा ही वास्तविक ईश्वर पूजा है। कोई व्यक्ति ईश्वर की खोज में चतुर्दिक भटक रहा था। उसे कहीं भी ईश्वर के दर्शन प्राप्त नहीं हुए। थका-हारा वह एक वृक्ष के नीचे बैठा था कि उसने एक दंपत्ति को वहाँ से गुजरते देखा, दोनो बहुत प्रसन्न लग रहे थे। उनके मुख पर आनन्द का छलकन पाने पर इस साधु को यह जानने की जिज्ञासा हुई कि वे कहाँ जा रहे हैं। वह भी उनका अनुगमन करने लगा। वे एक कॉलोनी पहुँचे। वहाँ अंधिकांश कुष्टरोगी ही थे। पति-पत्नी उन रोगियों के पास जा बैठे, उन्होंने उनके व्रणों को धोकर साफ किया, उन पर दवा लगाकर पट्टी बाँधी। जो आहार वे अपने साथ लाये थे उसे सब को परोसा। मधुर आश्वासनदायी वचनों से सभी को खुश किया। यह दुश्य देखने पर उस ईश्रान्वेषी के लिये अपने भीतर प्रस्फुटित आनन्द को नियंत्रण में रखना असंभव हो गया – वह ऊँचे स्वर में घोषित करने लगा, ”मैंने ईश्वर के दर्शन कर लिये!“ यह सुनने पर लोगों ने तो सोचा कि वह पागल हो गया है। उन्होंने पूछा, ”तुम्हारे यह ईश्वर हैं कहाँ?“ वह साधु आनन्दातिरेक में बोला, ”जहाँ करुणा है, वहाँ ईश्वर हैं।“

बच्चों, वे करुणापूर्ण हृदय में ही वास करते हैं। बच्चों, दुखियों को आश्वासन देना ध्यान से भी उच्च अवस्था है। ध्यान स्वर्णसम मूल्यवान है। पर ध्यान के साथ ही हृदय में सहजीवों के प्रति करुणा भी उभर आये तो वह सोने पर सुहागा जैसा होगा। उसका मूल्य व उसका महत्व शब्दातीत हैं। अतः बच्चों को दुखी-पीडतों की सेवा के लिये तैयार होना चाहिये।

पर उनकी मदद, उनकी सेवा करने के साथ ही हमें उन्हें संस्कार भी देना चाहिये। भूखे को रोटी देने मात्र से काम नहीं होगा, उस समय पेट भर जाय तो भी कुछ ही समय बाद फिर से भूख लगेगी। अतः उन्हें अध्यात्मिक तत्त्वों से भी अवगत कराना चाहिये। जीवन का लक्ष्य क्या है व संसार के स्वभाव के विषय में उन्हें ज्ञान देना चाहिये। यदि हम ऐसा कर पायें तो वे किसी भी परिस्थिति में संतृप्त व सुखी रहना सीख लेंगे। तभी हमारी सेवा भी पूर्ण होगी।