Category / अमृतगंगा

अमृत गंगा 15 अमृत गंगा की पंद्रहवीं कड़ी.. अम्मा हमें नियमित ध्यानाभ्यास और उसमें एकाग्रता की प्राप्ति हेतु प्रयत्न करते रहने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। अम्मा कहती हैं कि ध्यानाभ्यास के कुछ क्षण भी सोने, हीरे-जवाहरात समान अनमोल होते हैं। लेकिन वो हमें चेतावनी भी दे रही हैं कि हम इस सोने और […]

अमृत गंगा 14 अमृत गंगा की चौदहवीं कड़ी में, अम्मा हमें अपने प्रत्येक वचन और कर्म के प्रति सचेत रहने की याद दिला रही हैं। शब्दों में अर्थ निहित होते हैं, अतः गलत शब्द चोट पहुँचाते हैं। हमारे जीवन में दुःख आते हैं, पूर्वकृत कर्मों के फलस्वरूप! हम पूर्वजन्मों से संचित कर्म ले कर आते […]

अमृत गंगा 13 अमृत गंगा की तेरहवीं कड़ी में, अम्मा हमें निठल्ले न बैठने की याद दिला रही हैं। आलस्य हमारी दुर्वासनाओं को बढ़ाती है और व्यायाम की कमी से शरीर में पित्त और कफ़ में भी वृद्धि होती है। कर्म करते रहें तो स्वास्थ्य और उत्साह बने रहते हैं। अम्मा कहती हैं कि भले […]

अमृत गंगा 12 अमृत गंगा की बारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि प्रेम प्रत्येक वस्तु को नया, तरोताज़ा और अनोखा बना देता है। अम्मा प्रेम की वैश्विक भाषा बोलती हैं। वो कहती हैं कि दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का प्रकाश हमारे जीवन को ताज़गी, शक्ति और उत्साह से भर देता […]

अमृत गंगा 11 अमृत गंगा की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि अनुभव सच्चा गुरु है। यदि हम अनुभवी लोगों के पदचिन्हों पर चलें तो हम एक ही जीवनकाल में वो पा सकते हैं, जिसे पाने में सामान्यतः सैंकड़ों जन्म लग जाते हैं। प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है […]