अमृत गंगा 25 अमृत गंगा की पच्चीसवीं कड़ी में, अम्मा ने कहा कि हालाँकि हम सबको सफ़लता और ख़ुशी की चाह होती है, लेकिन रास्ते में अड़चनें आती रहती हैं। किसी की समस्या निजी-सम्बन्धों को ले कर होती है तो किसी को आर्थिक या स्वास्थ्य-सम्बन्धी! लेकिन एक समस्या जो हम सबके लिए सामान्य है, वो […]
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अमृत गंगा 24 अमृत गंगा की चौबीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि हमें दुःखी लोगों को सांत्वना देनी चाहिए। लोग अज्ञानवश, अशिष्टतापूर्ण व्यवहार करते हैं और हमें ऐसी स्थितियों में बोध बनाये रखना चाहिए। हमें दूसरे लोगों की मनःस्थिति व आध्यत्मिक-विकास को समझना चाहिए। जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियों को साक्षी भाव से […]
अमृत गंगा 23 अमृत गंगा की तेईसवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि सब प्रकार के अनुभवों का कारण मन है। हमें अपने मन को जानना होगा। लोग हमें सराहें तो हम हर्षोल्लास से भर जाते हैं और आलोचना कर दें तो क्रोध और निराशा हमें घेर लेते हैं। जैसे संकट का भान […]
अमृत गंगा 22 अमृत गंगा की बाईसवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि सृष्टि की रचना पहले भीतर होती है, फिर बाहर! इसे स्पष्ट करने के लिए, वो उस पेंटर का उदाहरण दे रही हैं जो बाहर पेंटिंग में अभिव्यक्त करने से पहले, उसके विषय में भीतर सोचता है…उस कुम्हार का जो मिट्टी हाथ […]
अमृत गंगा 21 अमृत गंगा की इक्कीसवीं कड़ी.. अम्मा हमें शास्त्रों और आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने को प्रोत्साहित करती हैं; क्योंकि उनसे हमें शिक्षा मिलती है कि महात्माओं ने जीवन में आने वाली परिस्थितियों का कैसे सामना किया। युग कोई भी हो, हमें महाभारत और रामायण से मिलती-जुलती घटनाएं देखने को मिलती रहेंगी। जहाँ-तहाँ, […]

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