Category / अमृतगंगा

अमृत गंगा 31 अमृत गंगा की प्रस्तुत इकतीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं कि क्षमा करना आसान तो नहीं, पर हमें कोशिश करनी चाहिए। अक्सर, हम दोनों तरफ़ की कहानी तो सुनते नहीं; दोनों को सुनने के बाद ही कुछ निर्णय लेना चाहिए। एक ही पक्ष की बात सुन कर, जल्दबाज़ी और तैश में आ […]

अमृत गंगा 30 अमृत गंगा की तीसवीं कड़ी… अम्मा यहाँ बता रही हैं कि मन विचित्र है! हम पुरानी चीज़ों से ऊब कर, नई खोजते रहते हैं। यहाँ तक कि अपने सम्बन्धों से भी ऊब जाते हैं। बस…नहीं ऊबते तो अपने विचारों से! कई लोगों को तो अपने बचपन की फ़िज़ूल की चीज़ें तक याद […]

अमृत गंगा 29 अमृत गंगा की उनतीसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि हम उन समस्याओं से चिपके रहते हैं, जिनका अस्तित्व है ही नहीं और फिर शिकायत करते हैं कि हमसे यह बोझ ढोया नहीं जाता। बोझा उठाने से पहले ही हम शिकायत करने लगते हैं कि बड़ा भारी है! चिंता करने की […]

अमृत गंगा 28 अमृत गंगा की प्रस्तुत अट्ठाईसवीं कड़ी में, हम अम्मा के शब्दों में ही अम्मा की, एक महान व्यक्ति की परिभाषा को देखें तो वो कुछ इस तरह है कि जो व्यक्ति अपने विचारों, वचनों और कर्मों के माध्यम से दूसरे कितने लोगों के जीवन पर गहरी और सुन्दर छाप छोड़ पाया है। […]

अमृत गंगा 27 अमृत गंगा की सत्ताईसवीं कड़ी में, अम्मा फिर से तनाव और चिंता की बात कर रही हैं। अम्मा कह रही हैं कि चिंता एक चोर जैसी है जो हमारा समय और विश्वास..दोनों चुरा लेती है। चिंता का कोई कारण न भी हो तो हम सोचते हैं कि कुछ बुरा हो जायेगा। पीछे […]