Category / अमृतगंगा

अमृत गंगा 11 अमृत गंगा की ग्यारहवीं कड़ी में, अम्मा हमें बता रही हैं कि अनुभव सच्चा गुरु है। यदि हम अनुभवी लोगों के पदचिन्हों पर चलें तो हम एक ही जीवनकाल में वो पा सकते हैं, जिसे पाने में सामान्यतः सैंकड़ों जन्म लग जाते हैं। प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है […]

अमृत गंगा 10 अमृत गंगा की दसवीं कड़ी में, अम्मा कह रही हैं कि अपने में परिवर्तन लाने के लिए, हमें राह नहीं देखनी कि पहले दूसरे बदलें। बल्कि, पहले हम बदलें और दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनें। हमारा प्रत्येक सत्कर्म, प्रत्येक सुविचार कई गुणा फल देगा। जब हमारे हृदय में अरुणोदय होगा तो उसका […]

अमृत गंगा 9 अमृत गंगा की नवीं कड़ी में, अम्मा बता रही हैं कि ईश्वर कहीं दूर, बादलों के पार.. स्वर्ण-सिंहासन पर नहीं बैठा। ईश्वर हम सबके भीतर विद्यमान है। जब हम दूसरों की सहायता करते हैं तो हमारे भीतर विद्यमान परमात्मा जागृत हो उठता है। जैसे वृक्ष को बीज के बाहरी खोल को तोड़ […]

अमृत गंगा 8 अमृत गंगा की आठवीं कड़ी में, अम्मा हमें याद दिला रही हैं कि हमारी साधना का लक्ष्य अपनी खोई हुई सरलता को पाना है। सरलता, सहजता द्वारा ही हममें आत्मज्ञान जागृत होगा। अम्मा कहती हैं कि अभी हमारी सरलता, निष्कलङ्कता को अहंकार के धुएँ ने ढक रखा है और इस अहंकार का […]

अमृत गंगा 7 अमृत गंगा की सातवीं कड़ी में अम्मा हमें याद दिला रही हैं कई हमारे हाथ में कुछ है तो केवल वर्तमान क्षण। बीता हुआ कल ‘आज’ नहीं बन सकता और आने वाला कल भी आज नहीं हो सकता। अगली सांस तक हमारे हाथ में नहीं है। फल देने की शक्ति केवल ईश्वर […]