अमृत गंगा S4-33 सीज़न 4, अमृत गंगा की तैतीसवीं कड़ी में, अम्मा कहती हैं, “व्रत और अनुष्ठान भगवान के लिए नहीं, बल्कि हमारी आत्म-शुद्धि और ईश-कृपा के लिए हैं, क्योंकि हमें भगवान की आवश्यकता है, उन्हें हमारी नहीं।” अम्मा कृष्ण भजन गाती हैं, ‘श्याम गोलोक में।’ प्रस्तुत कड़ी में, अम्मा की भारत यात्रा में – […]
अध्यतन वार्ता
- हर हाल में साधना की निरंतरता बनाए रखें
- दूसरों के प्रति विचारवान भाव रखें
- संतोष का स्रोत हृदय में है, वस्तुओं में नहीं
- उत्तम आदर्शों से जीवन को अर्थपूर्ण बनाए
- परिवर्तन संसार का स्वभाव है
- जागरुकता ही आध्यात्मिकता का सार है
- मित और हित भाषी बने
- कृपा ईश्वर का स्वरूप
- एक धैर्यवान श्रोता बने
- निःस्वार्थ कर्म तमोगुण को घटाते हैं
When Love is there, distance dosen't matter.
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